त्रिलोचन शास्त्री। उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा में 2022 में विधानसभा चुनाव होने हैं। राजनीतिक दलों ने अपना प्रचार अभियान शुरू कर दिया है। इन अभियानों का एक अहम पहलू है मतदाताओं को कई चीजें मुफ्त में देने का वादा। यह ट्रेंड साल-दर-साल बढ़ता जा रहा है। ये मुफ्तखोरी वाले वादे कई सवाल पैदा करते हैं। इनके लिए पैसा कहां से आएगा? क्या राज्य सरकारों के पास पर्याप्त फंड है? क्या इससे राज्य और उसके लोगों को फायदा होगा? राज्यों का बजट घाटे में जा रहा है और टैक्स बढ़ते जा रहे हैं। इसके बावजूद चुनाव अभियानों में सभी राजनीतिक दल मुफ्त बिजली, महिलाओं को पेंशन, फोन-लैपटाप बांटने, नकद देने जैसे अनगिनत वादे करते हैं। कोई नहीं जानता कि इन वादों के लिए पैसा कहां से आएगा?

उत्तर प्रदेश की बात करें, तो यहां राजस्व प्राप्ति की तुलना में सरकार का खर्च 90,730 करोड़ रुपये ज्यादा है। पिछले साल यह घाटा 80,850 करोड़ रुपये रहा था। घाटा हर साल बढ़ रहा है। सरकार द्वारा भरे जाने वाले ब्याज का स्तर 82,400 करोड़ रुपये पर पहुंच गया है। अगर उत्तर प्रदेश में खर्च का आकलन करें, तो वेतन, पेंशन एवं ब्याज भुगतान पर कुल खर्च 2.56 लाख करोड़ रुपये है। यह राज्य के कुल बजट के करीब आधे के बराबर है। पंजाब की स्थिति भी कमोबेश ऐसी ही है। हालांकि पंजाब अपेक्षाकृत बहुत छोटा है, इसलिए देखने में आंकड़े उत्तर प्रदेश से बहुत कम नजर आते हैं?

सवाल यह है कि सरकारों के लिए फंड जुटाने के स्रोत क्या हैं? उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और मणिपुर बड़े पैमाने पर केंद्र सरकार के फंड पर निर्भर करते हैं। गोवा एवं पंजाब को भी केंद्र से फंड मिलता है, लेकिन उनके फंड का बड़ा हिस्सा राज्य के भीतर से ही आता है। इनमें सभी लोगों और कंपनियों द्वारा भरा जाने वाला टैक्स शामिल है। हर राज्य में बजट में जितना राजस्व जुटाने की योजना होती है, असल राजस्व उससे कम आता है और घाटा बजट अनुमान से ज्यादा रहता है।

दुर्भाग्य से केंद्र सरकार भी घाटे में चल रही है। कर्ज के ब्याज पर भुगतान जीडीपी के करीब 90 फीसद पर पहुंच गया है। केंद्र सरकार राज्यों को जितना फंड देने पर सहमति जताती है, उससे कम ही राजस्व देने में सक्षम हो पाती है। घाटा बढ़ता है, इसलिए सरकारें टैक्स बढ़ाती हैं। उदाहरण के तौर पर, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें कम होने पर भी भारत में लोग पेट्रोल पर कम से कम 40 फीसद और डीजल पर 55 फीसद टैक्स दे रहे हैं।

केंद्र सरकार का जोर निजीकरण करने और फायदे वाली सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों, एयरपोर्ट को बेचने, रिजर्व बैंक से लाभांश बढ़ाने जैसे कदमों पर है। लेकिन राज्य सरकारों के पास यह विकल्प भी नहीं होता है। इन वादों को पूरा करने के अलावा राजनीतिक दल मतदाताओं को उपहार, पैसा और शराब बांटने में भी सार्वजनिक संपत्ति का उपयोग करते हैं।

ऐसे हालात क्यों?: राजनीतिक दल चुनाव जीतना चाहते हैं, इसलिए वादे करते हैं और उपहार बांटते हैं। मतदाता भी इसका हिस्सा हैं। लोग इन वादों के पीछे भागते हैं। राजनीतिक दलों को लगता है कि अगर उन्होंने वादा नहीं किया, तो कोई दूसरा दल ऐसे वादे कर मतदाताओं को अपने पक्ष में कर लेगा।

समाधान क्या है?: जब लोग शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, परिवहन, बिजली और पानी की अच्छी सुविधाओं को समझने लगेंगे, तो यह समस्या खत्म होने लगेगी। विकसित देशों में ऐसे मुफ्त वाले वादों की जरूरत नहीं होती। भारत में भी कुछ संपन्न राज्यों में इनकी जरूरत नहीं दिखती।

क्या मतदाताओं के लिए ये वादे अच्छे हैं?: चुनावी सरगर्मियों के बीच यह बात सच लगती है, लेकिन बाद में जब खराब सरकारी सेवाओं का सामना करना पड़ता है, तब असल में मतदाता ही हारता है। जीतने के बाद राजनीतिक दल और चुनाव में खर्च हुए पैसे की वसूली पर फोकस करते हैं। अच्छा प्रशासन बस वादे में रह गया है। ऐसे मामले भी बढ़ रहे हैं कि बड़ी-बड़ी स्कीम का एलान कर दिया जाए, बेशक बाद में उनका क्रियान्वयन हो या न हो।

देश की सभी राज्य सरकारें अपने नागरिकों को अच्छी सेवा दें। उन्हें हर तरह की अच्छी सुविधा मिले, इसके लिए उनमें बदलाव बहुत आसान नहीं है। फिलहाल मुफ्त बिजली, पानी का वादा करने और उपहार व नकदी बांटने वाले राजनीतिक दलों से निपटने का कोई कानूनी तरीका नहीं है। मतदाता के तौर पर हमें सोचना होगा कि हम अच्छा काम करने वाली सरकार चाहते हैं या मुफ्त के उपहार। मतदाताओं की जागरूकता के साथ ही ऐसे मसलों के समाधान की उम्मीद है।

[चेयरमैन, एडीआर एवं प्रोफेसर, आइआइएम बेंगलोर]

Edited By: Sanjay Pokhriyal