अर्चना सिंह ठाकुर, जबलपुर। जबलपुर में स्थित त्रिपुरी का जितना धार्मिक महत्व है, उतना ही महत्व देश की आजादी के आंदोलन में भी है। कांग्रेस के 52वें अधिवेशन के लिए तिलवारा घाट के पास त्रिपुरी को चुना गया। यह पहला ऐसा अधिवेशन हुआ, जो किसी भवन के बजाय खुले स्थान में हुआ। इसकी तैयारियां कई महीने तक चली। इसके लिए पूरा एक नगर स्थापित किया गया, जिसका नाम विष्णुदत्त नगर था। एक नगर में जितनी सुख-सुविधाएं होनी चाहिए, उतनी यहां जुटाई गई। चारों युगों का साक्षी रहा त्रिपुरी देश की आजादी के लिए भी महत्वपूर्ण साबित हुआ। यहां हुए 52वें अधिवेशन से ही भारतीय राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा और दशा तय हो सकी।

त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन में नेताजी ने गांधी के अधिकृत प्रत्याशी पट्टाभि को हराया 

त्रिपुरी अधिवेशन में सुभाषचंद्र बोस की एक झलक के लिए लोग आकुल-व्याकुल थे। त्रिपुरी में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव हुआ। महात्मा गांधी के अधिकृत प्रत्याशी पट्टाभि सीतारमैया थे, जबकि उनके विरोध में नेताजी सुभाषचंद्र बोस मैदान में उतरे। गांधी जी ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि यदि पट्टाभि की पराजय हुई तो यह सिर्फ पट्टाभि की नहीं उनकी व्यक्तिगत हार होगी। अंतत: यही हुआ, पट्टाभि हार गए और नेता जी विजयी घोषित हुए।

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समूचा जबलपुर सुभाषमय हो गया था, स्ट्रेचर पर सभा स्थल तक पहुंचे नेताजी

महात्मा गांधी का दिल दुखाने वाला वक्तव्य सामने आया, जिसने सुभाषचंद्र के ह्दय को विदीर्ण कर दिया। स्ट्रेचर पर सभा स्थल तक पहुंचे सुभाषचंद्र बोस जबलपुर पहुंचने के बाद बीमार हो गए। उनके मित्र डॉ. डिसल्वा ने चेकअप कर दवाएं दीं और आराम करने की सलाह। लिहाजा सुभाष बाबू बिस्तर पर लेट गए। 52 हाथियों के जुलूस का नेतृत्व करते हुए शहर से तिलवारा तक रैली निकालने का सपना अधूरा रह गया, लेकिन समर्थकों ने 5 मार्च 1939 को सुभाष बाबू की आदमकद तस्वीर रखकर जुलूस निकाल ही दिया। रास्ते में जगह-जगह यादगार स्वागत हुआ। उस समय समूचा जबलपुर सुभाषमय हो गया था। बाद में लाख मना करने पर भी सुभाष नहीं माने और स्ट्रेचर पर सभा स्थल पहुंचकर 10 मार्च 1939 को दिल जीतने वाला भाषण दिया।

दो लाख लोग पहुंचे सुभाषचंद्र बोस को सुनने 

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र ने अपनी पुस्तक 'मेरा जिया हुआ युग' में त्रिपुरी अधिवेशन का वर्णन किया है। उन्होंने लिखा सुभाषचंद्र बोस को सुनने दो लाख लोग एकत्र हुए। यह सबसे बड़ा और ऐतिहासिक अधिवेशन रहा। शहर के इतिहासविद डॉ. आनंद सिंह राणा ने बताया कि अधिवेशन के लिए सिर्फ स्वदेशी वस्तुओं का इस्तेमाल किया गया। 6 महीने पहले से ही हो रही इस तैयारी में एक बड़े भू-भाग को अधिवेशन स्थल बनाया गया। यहां पर दर्शक निवास, कुटुंब निवास की व्यवस्था अलग-अलग की गई। विष्णुदत्त नगर में शौच, सफाई, सुरक्षा, बिजली व जल आपूर्ति का पूरा इंतजाम था। डाकघर, अस्पताल का प्रबंध विशेष रूप से किया गया। 90 हजार गैलन की क्षमता वाला विशाल जलकुंड बनाया गया। दस विशाल द्वार थे, जिनका नाम शहर के दिवंगत साहित्यकारों व स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर था। माधव राव सप्रे, ब्रजमोहन वर्मा, नाथूराम मोदी, पं. बालमुकुंद त्रिपाठी, नारायण राव आदि द्वार के नाम रखे गए।

जीवंत हैं जबलपुर केंद्रीय जेल में नेताजी की यादें 

नेताजी सुभाषचंद्र बोस केंद्रीय जेल, जबलपुर में दिवंगत नेताजी की यादें आज भी जीवंत हैं। इस जेल में नेताजी दो बार रहे। जिस वार्ड में उन्हें बंदी के रप में रखा गया था उसे सुभाष वार्ड कहा जाता है। इसमें सांस्कृतिक कार्यक्रम भी किए जाते हैं। वार्ड में नेताजी से जुड़ी कई यादें संजोकर रखी गई हैं। जेल में उनके द्वारा उपयोग किए गए बर्तन, हथकड़ी, चक्की और अन्य सामान संग्रहित है। यहां एडमिशन बंदी रजिस्टर में भी नेताजी का नाम दर्ज है। उनका लिखा पत्र फ्रेम करके सुभाष वार्ड में लगाया गया है, जो उन्होंने वियेना से सिवनी के जेलर देशपांडे को 13 अप्रैल 1933 में लिखा था।

सुभाष वार्ड में दुर्लभ चित्र

सुभाष वार्ड में नेताजी के बचपन से लेकर जवानी तक के फोटो लगे हैं। उनकी पत्नी, माता-पिता और भाई के दुर्लभ चित्र भी यहां हैं।

बंदी एडमिशन रजिस्टर में दर्ज जानकारी

प्रवेश- 22 दिसंबर 1931, स्थानांतरण- 16 जुलाई 1932 को बंबई। दोबारा प्रवेश- 18 फरवरी 1933,  स्थानांतरण- 22 फरवरी 1933 को मद्रास जेल आने पर लंबाई- 5.7 वजन- 144 पौंड (65.3 किलो) .. नेताजी सुभाषषचंद्र बोस दो बार केंद्रीय जेल में रहे।

2007 में केंद्रीय जेल का नाम नेताजी सुभाषचंद्र बोस के नाम पर

2007 में केंद्रीय जेल का नाम उनके नाम पर दर्ज किया गया। जेल में हर साल 23 जनवरी को विभिन्न कार्यक्रम कर उन्हें याद किया जाता है-गोपाल ताम्रकार, जेल अधीक्षक।

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