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    मुख्‍यमंत्री बनते ही शिवराज चौहान ने रचा इतिहास, जानें MP के इस कॉमन मैन के बारे में सबकुछ

    By Vijay KumarEdited By:
    Updated: Mon, 23 Mar 2020 09:20 PM (IST)

    shivraj singh chauhan profile मध्यप्रदेश के इतिहास में पहला मौका है जब कोई चौथी बार CM बना है। शिवराज के अलावा अर्जुन सिंह और श्यामाचरण शुक्ल तीन-तीन बार बने।

    मुख्‍यमंत्री बनते ही शिवराज चौहान ने रचा इतिहास, जानें MP के इस कॉमन मैन के बारे में सबकुछ

    भोपाल, जेएनएन। Shivraj Singh Chauhan Profile कोरोना वायरस के खबरों के बीच मध्‍यप्रदेश की सियासत से बड़ी खबर आ रही है। शिवराज सिंह चौहान मध्‍यप्रदेश के मुख्‍यमंत्री बन गए हैं। चौथी बार उन्‍होंने मुख्‍यमंत्री पद की शपथ ली।

    गौरतलब है कि 20 मार्च को कमलनाथ के इस्तीफे के बाद सीएम पद की दौड़ में शिवराज ही सबसे मजबूत दावेदार थे। पार्टी का एक खेमा भी मौजूदा विधानसभा में संख्या गणित को देखते हुए अभी फिलहाल शिवराज सिंह चौहान को ही कमान देने का दबाव बना रहा था। शिवराज सिंह 2005 से 2018 तक लगातार 13 साल सीएम रह चुके हैं। इस दौरान उन्होंने तीन बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उनके फिर सीएम बनने पर मध्यप्रदेश के इतिहास में पहला मौका होगा, जब कोई चौथी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेगा। शिवराज के अलावा अब तक अर्जुन सिंह और श्यामाचरण शुक्ल तीन-तीन बार सीएम रहे हैं।

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    जीवन परिचय

    शिवराज सिंह चौहान किराड़ राजपूत परिवार से आते हैं। उनका जन्‍म 5 मार्च, 1959 को सीहोर जिले के जैत गांव में किसान परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम प्रेम सिंह चौहान और उनकी मां का नाम सुंदर बाई चौहान है। 1992 में उनका विवाह साधना सिंह से हुआ था और वे दो बेटों- कार्तिकेय सिंह चौहान और कुणाल सिंह चौहान के पिता हैं। शिवराज भोपाल के बरकतुल्ला यूनिवर्सिटी से एमए में दर्शनशास्त्र से गोल्ड मेडलिस्ट हैं।

    छात्र जीवन से राजनीति से जुड़े

    शिवराज सिंह चौहान छात्र जीवन से ही राजनीति से जुड़े रहे हैं। वह 1975 में मॉडल स्कूल स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष चुने गए थे। 1975-76 में इमरजेंसी के खिलाफ अंडग्राउंड आंदोलन में हिस्सा लिया। 1976-77 में आपातकाल के दौरान वे जेल भी गए। वर्ष 1977 से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सक्रिय कार्यकर्ता रहे हैं। साथ ही लम्बे समय तक पार्टी की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से भी जुड़े रहे। 

    राजनीतिक करियर

    शिवराज सिंह पहली बार 1990 में बुधनी सीट से मध्य प्रदेश विधानसभा के लिए चुने गए और 1991 में पहली बार विदिशा सीट से लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। वे चार बार लोकसभा के लिए चुने गए और वे लोकसभा तथा संसद की कई समितियों में भी रहे। चौहान 2000 से 2003 तक भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और भाजपा के राष्ट्रीय सचिव भी रहे। दिसंबर, 2003 में भाजपा ने विधानसभा चुनावों में अपूर्व सफलता पाई थी और उस समय उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ा था लेकिन वे राघौगढ़ विधानसभा चुनाव क्षेत्र से चुनाव हार गए थे। 

    29 नवंबर, 2005 को जब वे भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष थे तब उन्हें बाबूलाल गौर के स्थान पर राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया था। उसके बाद वे 2006 में वे बुधनी से 36,000 वोट से चुनाव जीते। बुधनी उनके गृह जिले सीहौर जिले में पड़ता है। 2008 के विधानसभा चुनाव में वे फिर यहीं से 41,000 वोट से जीते। इस चुनाव में बीजेपी को लगातार बहुमत मिली और वे दूसरी बार 12 दिसंबर 2008 को प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। 2013 के विधानसभा चुनाव में वे दो सीटों से चुनाव लड़े। बुधनी से 1,28,730 वोटों से और विदिशा से 73,783 से चुनाव जीते। इस तरह वे तीसरी बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।

    चुनाव हारते ही बने थे कॉमन मैन ऑफ मध्यप्रदेश 

    मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सरकार जाने के बाद अपना ट्विटर प्रोफाइल बदल लिया था। मध्यप्रदेश में 13 साल तक मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान ने हार के बाद अपने ट्विटर हैंडल पर कॉमन मैन ऑफ मध्यप्रदेश लिखा। यानी मध्यप्रदेश का आम नागरिक। एमपी में भाजपा के चुनाव हारने के बाद अटकलें लगाई जा रही थीं कि शिवराज अब केंद्र में जा सकते हैं। यह भी कहा जा रहा था कि शिवराज 2019 में लोकसभा चुनाव लड़ सकते हैं। शिवराज ने इस्तीफा देने के तुरंत बाद  ट्विटर प्रोफाइल पर लिखा था, 'एक्स चीफ मिनिस्टर ऑफ मध्यप्रदेश, इंडिया' लेकिन कुछ ही घंटों के बाद शिवराज ने इसे बदलकर 'द कॉमन मैन ऑफ मध्यप्रदेश' कर दिया।  

    अपनी हार के बाद उन्होने ट्वीट करके कहा कि मध्यप्रदेश मेरा मंदिर हैं, और यहां की जनता मेरी भगवान। मेरे घर के दरवाजे, आज भी प्रदेश के हर नागरिक के लिए हमेशा खुले हैं, वो बिना कोई हिचकिचाहट मेरे पास आ सकते हैं और मैं हमेशा की तरह उनकी यथासंभव मदद करता रहूंगा। मध्यप्रदेश में खास बात ये रही कि भाजपा सीटों के लिहाज से भले पिछड़ गई हो लेकिन वोट शेयर के मामले में कांग्रेस से आगे निकल गई। भाजपा को 41 तो कांग्रेस को 40.9 फीसदी वोट मिले हैं।