अरविंद पांडेय, नई दिल्ली। बचपन की छाप कितनी गहरी होती है, इसका अंदाजा केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के व्यक्तित्व से लगाया जा सकता है। पिता उस केसरी अखबार में काम करते थे, जिसे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बाल गंगाधर तिलक ने स्थापित किया था। बदलते वक्त के साथ अखबार का प्रारूप जरूर बदला, लेकिन सोच बहुत नहीं बदली थी। पिता के साथ घर आने वाले दोस्तों की बातचीत भी वर्तमान और भविष्य पर होती थी। घर पर ही तीन-चार अखबार आते थे और जावड़ेकर हर पन्ना पलटते थे। कभी कभार वह अपने पिता के साथ पत्रवार्ता में भी चले जाया करते थे और यह देखते थे कि किस तरह नेता उलझने वाले सवालों पर भी बच कर निकल जाते हैं। मधुरता से बात की जाए तो किस तरह विवादों से बचा जा सकता है। बचपन की वह सीख प्रकाश जावड़ेकर के लंबे राजनीतिक जीवन की सबसे प्रबल पहचान बन गई। एक दशक से ज्यादा वक्त तक राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के प्रवक्ता रहते हुए और फिर केंद्र सरकार में रहते हुए वह ऐसे बिरले नेताओं में शुमार हैं, जिन्हें कभी किसी बयान को वापस नहीं लेना पड़ा। खुद पर संयम और सबको साधकर रखना उनकी बड़ी खूबी है।

राजनीतिक विरासत के रूप में जावड़ेकर के पास कुछ नहीं था, लेकिन खुलकर अपने विचारों को सामने रखने की कला ने धीरे-धीरे उन्हें एक नेता के रूप में गढ़ना शुरू कर दिया। बात 1974 की है। पुणे विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले जावड़ेकर ने जयप्रकाश नारायण के विचारों से प्रभावित होकर विश्वविद्यालय प्रशासन से उन्हें डीलिट की उपाधि देने की मांग की, जिसे कुलपति ने ठुकरा दिया। तब उन्होंने साथियों के साथ मिलकर इसे लेकर बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया। इसी बीच जयप्रकाश नारायण का शिवाजी नगर स्टेशन पर आना हुआ। करीब बीस हजार छात्रों को साथ लेकर जावड़ेकर स्टेशन पहुंचे और उनका स्वागत किया और उन्हें छात्रों की ओर से डीलिट की उपाधि दी। छात्रों के बीच वह एक नेता के रूप में स्थापित हो गए थे।

एक मध्यम वर्ग से आए व्यक्ति के लिए नौकरी बड़ी चीज होती है। जावड़ेकर को भी बैंक में अच्छी नौकरी मिल गई थी। लेकिन तत्कालीन राजनीति में चल रहे उथल-पुथल ने उन्हें अंदर से उद्वेलित कर रखा था। आपातकाल के दौरान जब लोगों को जबरिया पकड़कर जेल में डाला जा रहा था, उस समय जावड़ेकर ने इसके खिलाफ सत्याग्रह शुरू किया। विश्वविद्यालय और सभी कॉलेजों में यह आंदोलन तेजी से चलने लगा। इस बीच उन्हें भी गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। करीब 16 महीने जेल में रहे। जेल में रहते हुए भी उन्होंने लोगों को जागरूक करने का काम किया। 'निर्भय' नाम की एक पत्रिका निकाली। जिसमें जेल के अंदर और बाहर के समाचार दिए जाते थे। समाचार जुटाने का जरिया रोज मुलाकात के लिए आने वाले लोग होते थे। जो हर दिन की जानकारी उन्हें देकर जाते थे। बाद में वही जानकारी पत्रिका में छापी जाती थी और जेल के अंदर कई स्थानों पर लगाई जाती थी। जेल में रहते हुए उनकी मुलाकात बालासाहब देवरस से भी हुई। वह कुछ साथियों के साथ रोज जेल में उनसे मिलने जाते थे। उनके पत्रों को पढ़ते थे। बाद में बालासाहब देवरस से चर्चा कर उनके जवाब भी लिखते थे। पत्रों को लिखने का काम उनका एक साथी करता था, जिसकी लेखनी अच्छी थी। यह क्रम जेल में रहने के दौरान पूरे समय चला। बाद में जेल से निकलने के बाद भी उनकी बालासाहब से नजदीकियां बनी रहीं। मन में पूरी तरह राजनीति में प्रवेश का संकल्प बढ़ने लगा था। उनका यह फैसला कठिन था, लेकिन पत्नी प्राची जावड़ेकर के साथ चर्चा की और यह तय हुआ कि कोई एक घर चलाएगा और दूसरा राजनीति में आएगा। पत्नी ने घर संभालने का फैसला लिया। आखिर में 1981 में जावड़ेकर भाजपा के साथ पूर्णकालिक के रूप में जुड़ गए। दरअसल, भाजपा से जुड़ने का यह वक्त भी जावड़ेकर की प्रकृति बयां करता है। उस वक्त भाजपा उठान पर नहीं थी। बाद के कई अवसरों पर भी यह दिखा कि जावड़ेकर उन व्यक्तियों में नहीं हैं, जो कुछ पाने की योजना के साथ फैसला करें। घर में पत्रकार पिता और शिक्षिका माता की ओर से दिया गया संयम का मंत्र अब तक उनके व्यक्तित्व में दिखता है।

बात 2002 की है। महाराष्ट्र की राजनीति में सक्रिय प्रकाश जावड़ेकर विधानसभा का चुनाव हार गए थे। वह राजनीति के कठिन मुहाने पर खड़े थे, तभी अचानक एक दिन भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण अडवाणी का फोन आया। उन्होंने जावड़ेकर को दिल्ली में पार्टी के लिए काम करने का प्रस्ताव दिया। बगैर समय गंवाए जावड़ेकर ने हां कर दी। पार्टी में कई अन्य जिम्मेदारियों के साथ-साथ प्रवक्ता की जिम्मेदारी दी गई, जिसे उन्होंने बखूबी निभाया। भाजपा में प्रवक्ता के रूप में उनका सबसे लंबा कार्यकाल रहा है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में लगातार दूसरी बार शामिल जावड़ेकर ने यह सिद्ध कर दिया है कि संयम, निष्ठा और कर्तव्यपरायणता की पूछ हमेशा होती है।

Posted By: Shashank Pandey

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