मुंबई, ब्‍यूरो/एजेंसी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा है कि किसी भी देश में जनसंख्या असंतुलन उस देश के विभाजन का कारण बन सकता है। सरसंघचालक ने लगातार दूसरे वर्ष संघ की विजयदशमी रैली में जनसंख्या असंतुलन के खतरों के प्रति आगाह किया है। इस बयान पर एआइएमआइएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने नाराजगी जताई है। उन्‍होंने कहा कि जनसंख्या नियंत्रण की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि देश पहले ही प्रतिस्थापन दर हासिल कर चुका है।

ओवैसी ने उठाया सवाल

वह जनसंख्या नीति पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे थे। उन्होंने एक ट्वीट में कहा, हिंदुओं और मुसलमानों का यदि एक ही डीएनए है तो असंतुलन कहां है। जनसंख्या नियंत्रण की कोई आवश्यकता नहीं है। चिंता एक बूढ़ी होती आबादी और बेरोजगार युवाओं को लेकर है। मुसलमानों की प्रजनन दर में सबसे ज्यादा गिरावट आई है।

जनसंख्या असंतुलन एक महत्वपूर्ण विषय

भागवत ने नागपुर में दशहरा रैली को संबोधित करते हुए कहा है कि भारत को व्यापक सोच के साथ जनसंख्या नीति तैयार करनी चाहिए। यह सभी समुदायों पर समान रूप से लागू होनी चाहिए। आरएसएस प्रमुख ने कहा कि समुदाय आधारित जनसंख्या असंतुलन एक महत्वपूर्ण विषय है। इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

देश विभाजक हो सकता है जनसंख्या असंतुलन : मोहन भागवत

मोहन भागवत ने नागपुर स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मुख्यालय में संघ की परंपरागत दशहरा रैली को संबोधित करते हुए कहा कि हम जनसंख्या असंतुलन का परिणाम एक बार भुगत चुके हैं। ऐसा केवल हमारे साथ ही नहीं हुआ है। पूर्वी तिमोर, दक्षिणी सूडान और कोसोवो जैसे देश इंडोनेशिया, सूडान और सर्बिया जैसे देशों के भूभाग में जनसंख्या का संतुलन बिगड़ने का कारण बन चुके हैं।

जनसंख्या संतुलन समय की जरूरत

मोहन भागवत ने कहा- हमें समझना होगा कि जब-जब जनसांख्यिकीय असंतुलन होता है, तब-तब उस देश की भौगोलिक सीमाओं में परिवर्तन होता है। उन्होंने कहा कि जन्मदर में असमानता के साथ-साथ लोभ, लालच, जबर्दस्ती से चलने वाला मतांतरण भी जनसंख्या असंतुलन का बड़ा कारण बनता है। हमें इसका भी ध्यान रखना होगा। मोहन भागवत के अनुसार जनसंख्या नियंत्रण के साथ-साथ पांथिक आधार पर जनसंख्या संतुलन भी महत्त्व का विषय है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती।

जनसंख्या पर एक समग्र नीति बननी चाहिए

बता दें कि पिछले वर्ष भी संघ प्रमुख ने अपने विजयदशमी संबोधन में देश में बढ़ते जनसंख्या असंतुलन के खतरों का उल्लेख किया था। भागवत के अनुसार, जनसंख्या पर एक समग्र नीति बननी चाहिए और सभी पर समान रूप से लागू भी होनी चाहिए। एक बार बनने के बाद किसी को छूट नहीं मिलनी चाहिए और समाज को इसे स्वीकार भी करना चाहिए।

अल्पसंख्यक समुदाय के साथ संवाद जारी 

भागवत ने कहा कि किसी नीति का यदि लाभ होने वाला हो, तो समाज भी उसे स्वीकार करता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा पिछले कुछ समय से देश के अल्पसंख्यक समुदाय के साथ भी संवाद का कार्यक्रम चल रहा है। मोहन भागवत ने बुधवार के अपने संबोधन में इस ओर भी इशारा किया।

हिंदू समाज खड़ा करना समय की जरूरत

उन्होंने कहा कि तथाकथित अल्पसंख्यकों में बिना कारण एक हौवा खड़ा किया जाता है कि उन्हें हमसे (संघ से) या संगठित हिंदू समाज से खतरा है। ऐसा न कभी हुआ है, न होगा। ऐसा स्वभाव न हिंदू का रहा है, न संघ का रहा है। न ही संघ का ऐसा इतिहास रहा है। 'न भय देत काहू को, न भय जानत आप' ऐसा हिंदू समाज खड़ा करना ही समय की आवश्यकता है। यह किसी के विरुद्ध नहीं है। संघ पूरी दृढ़ता से आपसी भाईचारे, भद्रता और शांति के पक्ष में खड़ा है।

कन्हैयालाल हत्याकांड का भी जिक्र

संघ प्रमुख ने बताया कि खुद पर हिंदू समाज या संघ से भय की आशंकाओं को लेकर तथाकथित अल्पसंख्यकों के कुछ सज्जन पिछले दिनों उनसे मिलने आए थे। संघ के अधिकारियों से उनका संवाद हुआ है। यह आगे भी होता रहेगा। मोहन भागवत ने उदयपुर में हुए कन्हैयालाल हत्याकांड का भी जिक्र किया।

उदयपुर में दिल दहला देने वाली घटना

उन्होंने कहा कि उदयपुर में एक बहुत ही जघन्य और दिल दहला देने वाली घटना घटी। जिससे सारा समाज स्तब्ध रह गया। इस घटना के बाद मुस्लिम समाज के भी कुछ प्रमुख लोगों ने अपना निषेध व्यक्त किया। यह निषेध अपवाद बनकर नहीं रह जाना चाहिए। अपितु अधिकांश मुस्लिम समाज का यह स्वभाव बनना चाहिए। ऐसी घटनाओं के मूल में पूरा समाज नहीं होता।

संविधान की मर्यादा में रहकर व्‍यक्‍त करें निषेध

संघ प्रमुख ने कहा कि इन घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो, हमें यह ख्याल रखना चाहिए। हिंदू समाज का एक बड़ा वर्ग, ऐसी घटना होने पर यदि आरोपित हिंदू तो भी खुलकर उसका निषेध करता है। उकसाना कोई भी और कैसा भी हो, कानून और संविधान की मर्यादा में रहकर सदैव सबको उसके प्रति अपना निषेध व्यक्त करना चाहिए।

सनातन संस्कृति विनम्रता का भाव देती है : संतोष

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विजयदशमी कार्यक्रम में इस बार मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं पर्वतारोही पद्मश्री संतोष यादव ने मोहन भागवत के संबोधन से पहले बोलते हुए कहा कि सनातन संस्कृति विनम्रता का भाव देती है। सनातन संस्कृति को जीने वाला सृजन के भाव से जीता है, नष्ट करने के भाव से नहीं। उन्होंने कहा कि कई बार दूर से देखकर हम किसी चीज के प्रति गलत धारणा बना लेते हैं। ऐसी ही गलत धारणा कुछ लोगों ने संघ के प्रति बना रखी है।

सनातन संस्कृति में समस्त समस्याओं का हल

उन्होंने कहा- मैं मानव समाज से अनुरोध करना चाहूंगी कि वे आएं और इनके कार्यकलापों को देखें। तब इनके बारे में कोई धारणा बनाएं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक एवं प्रचारक सनातक संस्कृति के प्रचारक हैं। हम सब भारतवासियों की जिम्मेदारी बनती है कि पहले हम खुद यह संस्कृति अपनाएं, फिर इसके प्रचार-प्रसार में जुटें क्योंकि विश्व की समस्त समस्याओं का हल इस सनातन संस्कृति में ही है।  

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Edited By: Krishna Bihari Singh

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