नई दिल्‍ली [जागरण स्‍पेशल]। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को इंदौर में दाऊदी बोहरा समुदाय के कार्यक्रम में शामिल हुए। यहां पर उन्‍होंने इस समुदाय की जमकर तारीफ भी की। इस कार्यक्रम में उनकी शिरकत को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। लेकिन हमारी खबर इसके इर्दगिर्द नहीं है। दरअसल इस कार्यक्रम में शिरकत करने के साथ ही जिसका नाम पीएम मोदी के बाद सबसे अधिक जुबान पर वह था सैयदना मुफद्दल सैफुद्दीन। लगभग सभी लोगों को इस बात की भी जानकारी जरूर होगी कि वह इस समुदाय के 53वें धर्मगुरु हैं और इंदौर में धार्मिक प्रवचन के लिए आए हैं। लेकिन इससे अधिक इनके बारे में लोग बेहद कम ही जानते हैं। हम आज आपको उनसे और इस समुदाय से जुड़ी कुछ बातों को बताने जा रहे हैं।

सैयदना मुफद्दल सैफुद्दीन पर एक नजर
दाई-अल-मुतलक यानी सैयदना दाऊदी बोहरों के सर्वोच्च आध्यात्मिक धर्मगुरू ही नहीं बल्कि समुदाय के तमाम सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक और पारमार्थिक ट्रस्टों के मुख्य ट्रस्टी भी होते हैं। इन्हीं के जरिए समुदाय की तमाम मस्जिदों, मुसाफिरखानों, शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों, दरगाहों और कब्रिस्तानों का प्रबंधन और नियंत्रण होता है। आपको बता दें कि दूसरे धर्मगुरुओं के मुकाबले सैयदना का अपने समुदाय में एक अलग ही रुतबा है। वह इस समुदाय के लिए एक शासक की तरह हैं। वह मुंबई में अपने भव्य और विशाल आवास सैफी महल में अपने परिवार के साथ रहते हैं। आपको जानकर हैरत होगी कि लेकिन यह सच है कि शासन करने के उनके तौर तरीके मध्ययुगीन राजाओं-नवाबों की तरह हैं। उनकी नियुक्ति भी योग्यता के आधार पर या लोकतांत्रिक तरीके से नहीं, बल्कि वंशवादी व्यवस्था के तहत होती है, जो कि इस्लामी उसूलों के अनुरूप नहीं हैं।

 

विदेशों में नियुक्‍त किए जाते हैं दूत

देश-विदेश में जहां-जहां भी बोहरा धर्मावलंबी रहते हैं वहां सैयदना की ओर से अपने दूत नियुक्त किए जाते हैं। इन्‍हें आमिल कहा जाता है। ये आमिल ही सैयदना के फरमान को अपने समुदाय के लोगों तक पहुंचाते हैं। स्थानीय स्तर पर सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों पर भी इन आमिलों का ही नियंत्रण रहता है। एक निश्चित अवधि के बाद इन आमिलों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर तबादला भी होता रहता है। इसके अलावा समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी वार्षिक आमदनी का एक निश्चित हिस्सा दान के रूप में देना होता है। आमिलों के माध्यम से इकट्ठा किया गया यह सारा पैसा सैयदना के खजाने में जमा होता है।

हर काम के लिए सैयदना की अनुमति जरूरी

आपको यहां पर ये भी बता देना जरूरी होगी कि समुदाय में हर सामाजिक, धार्मिक, पारिवारिक और व्यावसायिक कार्य के लिए सैयदना की अनुमति लेनी जरूरी होती है। इसके लिए बाकायदा निर्धारित शुल्क चुकाना होता है। शादी-ब्याह, बच्चे का नामकरण, विदेश यात्रा, हज, नए कारोबार की शुरुआत, मृतक परिजन का अंतिम संस्कार आदि सभी कुछ सैयदना की अनुमति से और निर्धारित शुल्क चुकाने के बाद ही संभव हो पाता है। यही नहीं, सैयदना के दीदार करने और उनका हाथ अपने सिर पर रखवाने और उनके हाथ चूमने के लिए भी इसी प्रक्रिया का पालन करना होता है।

सिर्फ सैयदना को है फरमान जारी करने का हक

सैयदना ही इस समुदाय विशेष के लिए किसी भी तरह का फरमान जारी करते हैं। यदि वह किसी अमुक व्‍यक्ति या परिवार के सामाजिक बहिष्‍कार का फरमान दे दें तो फिर वह व्यक्ति या परिवार समाज में न तो किसी शादी में शरीक हो सकता है और न ही किसी जनाजे में ही शामिल हो सकता है। बहिष्कृत परिवार में अगर किसी की मृत्यु हो जाए तो उसके शव को बोहरा समुदाय के कब्रस्तान में दफनाने भी नहीं दिया जाता।

यहां बसे हैं इस समुदाय के लोग

भारत में दाऊदी बोहरा मुख्यत: गुजरात में सूरत, अहमदाबाद, बडोदरा, जामनगर, राजकोट, नवसारी, दाहोद, गोधरा, महाराष्ट्र में मुंबई, पुणे, नागपुर औरंगाबाद, राजस्थान में उदयपुर, भीलवाड़ा, मध्य प्रदेश में इंदौर, बुरहानपुर, उज्जैन, शाजापुर के अलावा कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरू, और हैदराबाद जैसे महानगरों में भी बसे हैं। पाकिस्तान के सिंध प्रांत के अलावा ब्रिटेन, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, दुबई, मिस्र, इराक, यमन व सऊदी अरब में भी उनकी खासी तादाद है।

बोहरा समुदाय पर एक नजर

बोहरा समुदाय मुख्यत: व्यापार करने वाला समुदाय है। 'बोहरा' गुजराती शब्द 'वहौराउ', अर्थात 'व्यापार' का अपभ्रंश है। ये मुस्ताली मत का हिस्सा हैं जो 11वीं शताब्दी में उत्तरी मिस्र से धर्म प्रचारकों के माध्यम से भारत में आया था। 1539 के बाद जब भारतीय समुदाय बड़ा हो गया तब यह मत अपना मुख्यालय यमन से भारत में सिद्धपुर ले आया। 1588 में दाऊद बिन कुतब शाह और सुलेमान के अनुयायियों के बीच विभाजन हो गया। आज सुलेमानियों के प्रमुख यमन में रहते हैं, जबकि सबसे अधिक संख्या में होने के कारण दाऊदी बोहराओं का मुख्यालय मुंबई में है।

बीस लाख से अधिक है आबादी

भारत में बोहरों की आबादी 20 लाख से ज्यादा है। इनमें 15 लाख दाऊदी बोहरा हैं। -दाऊद और सुलेमान के अनुयायियों में बंटे होने के बावजूद बोहरों के धार्मिक सिद्धांतों में खास सैद्धांतिक फर्क नहीं है। बोहरे सूफियों और मज़ारों पर खास विश्वास रखते हैं। सुन्नी बोहरा हनफ़ी इस्लामिक कानून पर अमल करते हैं, जबकि दाऊदी बोहरा समुदाय इस्माइली शिया समुदाय का उप-समुदाय है। यह अपनी प्राचीन परंपराओं से पूरी तरह जुड़ी कौम है, जिनमें सिर्फ अपने ही समाज में ही शादी करना शामिल है।

सफाई और पर्यावरण प्रेमी है बोहरा समुदाय

बोहरा समुदाय अपनी सफाई पसंदगी और पर्यावरण रक्षा की पहलों के लिए भी जाना जाता है। चैरिटेबल ट्रस्ट बुरहानी फाउंडेशन इंडिया 1992 से ही बर्बादी रोकने, रिसाइकलिंग और प्रकृति संरक्षण के लिए काम कर रहा है। यह समुदाय काफी समृद्ध, संभ्रांत और पढ़ा-लिखा समुदाय है। आपको बता दें कि दाऊदी बोहरा समुदाय इमामों को मानते हैं। उनके 21वें और अंतिम इमाम तैयब अबुल कासिम थे जिसके बाद 1132 से आध्यात्मिक गुरुओं की परंपरा शुरू हो गई जो दाई-अल- मुतलक कहलाते हैं।

मानव सभ्‍यता की पूंजी

दाऊदी बोहरा मुसलमानों की विरासत फातिमी इमामों से जुड़ी है जो पैगंबर मोहम्मद के प्रत्यक्ष वंशज हैं। 10वीं से 12वीं सदी के दौरान इस्लामी दुनिया के अधिकतर हिस्सों पर राज के दौरान ज्ञान, विज्ञान, कला, साहित्य और वास्तु में उन्होंने जो उपलब्धियां हासिल कीं आज मानव सभ्यता की पूंजी हैं। इनमें एक है काहिरा में विश्व के सबसे पुराने विश्वविद्यालयों में से एक ‘अल-अजहर’। मुंबई की 20 से ज्यादा बोहरा मस्जिदों में कई शानदार हैं जिनमें सैफी मस्जिद सबसे बड़ी है और 100 वर्ष से भी ज्यादा पुरानी है।

Posted By: Kamal Verma