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    पीएम मोदी के भाषण के दौरान लालकिले पर थींं दो खास बटालियन, जिनके बारे में जानना जरूरी

    By Kamal VermaEdited By:
    Updated: Thu, 16 Aug 2018 08:44 AM (IST)

    72वें स्‍वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले से दिए गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण को करोड़ों लोगों ने देखा और सुना। लोगों ने इसको काफी सराहा भी।

    पीएम मोदी के भाषण के दौरान लालकिले पर थींं दो खास बटालियन, जिनके बारे में जानना जरूरी

    नई दिल्‍ली [जागरण स्‍पेशल]। 72वें स्‍वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले से दिए गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण को करोड़ों लोगों ने देखा और सुना। लोगों ने इसको काफी सराहा भी, लेकिन इस बीच में कुछ और भी जो शायद आपसे छूट गया या फिर उस पर आपने ध्‍यान नहीं दिया। यह मौका पीएम मोदी के भाषण देने से पहले और गार्ड ऑफ ऑनर के दौरान था। आपने भले ही इस पर ध्‍यान न दिया हो लेकिन हम इसको नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस दौरान लाल किले पर दो बटालियन मौजूद थीं। इनमें से एक थी गोरखा राइफल्‍स और दूसरी थी राजपूताना राइफल्‍स। गोरखा राइफल्‍स को ब्रितानी हुकूमत का सर्वोच्‍च सैन्‍य मैडल विक्‍टोरिया क्रॉस से लेकर भारत का युद्ध में दिए जाने वाला सर्वोच्‍च पुरस्‍कार परमवीर चक्र तक मिल चुका है, वहीं राजपूताना राइफल्‍स में उनसे कहीं कम नहीं है।

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    गार्ड ऑफ ऑनर
    72वें स्‍वतंत्रता दिवस के मौके पर लालकिले पर प्रधानमंत्री के गार्ड ऑफ ऑनर दस्ते में सेना की कमान मेजर सूरज पाल ने संभाली थी। वहीं नौसेना की कमान लेफ्टिनेंट कमांडर एम.वाई.वी. तेजस तथा वायु सेना दस्ते का नेतृत्व स्क्वाड्रन लीडर प्रवीण नारायण के हाथों में थी। दिल्ली पुलिस के दस्ते का नेतृत्व एसीपी श्री जगदेव सिंह यादव ने किया था। लेकिन प्रधानमंत्री के गार्ड के लिए सेना का जो दस्ता चुना गया था वह पहली गोरखा राइफल्स की पाचवीं बटालियन से था। इस बटालियन का अपना बेहद गौरवशाली इतिहास रहा है। आज आपको इसके गौरवशाली इतिहास के बारे में हम आपको जानकारी दिए देते हैं।

    1942 में किया गठन
    दरअसल इस बटालियन का गठन 1942 में धर्मशाला में लेफ्टिनेंट कर्नल जे.एल.एफ ‘ओ’ फेरल द्वारा किया गया था। बाद में दिसंबर, 1946 में इसे निष्क्रिय कर दिया गया। फिर 1 जनवरी, 1965 को इस बटालियन का दोबारा गठन सोलन, हिमाचल प्रदेश में लेफ्टिनेंट कर्नल गोविंद शर्मा द्वारा किया गया और इस बटालियन को पहला कार्यभार नेफा (अब अरुणाचल प्रदेश) का कार्यभार सौंपा गया था।

    कई ऑपरेशन में रही है शामिल
    बटालियन ने 1971 में पूर्वी पाकिस्तान में ‘ऑपरेशन कैक्टस लिली’ में अपने शौर्य और पराक्रम का परिचय उस समय दिया, जब कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल सी. वेणुगोपाल ने संतोषपुर, उथाली, दरसाना, कुसतिया तथा हार्डिंग ब्रिज पर अपनी इकाई के साथ ताबड़तोड़ पांच हमले किए। इस अभियान के दौरान यूनिट को तीन महावीर चक्र और दो वीर चक्र प्राप्त हुए। इस यूनिट को युद्ध सम्मान दरसाना तथा थिएटर सम्मान ईस्ट पाकिस्तान दिया गया।

    सेना प्रमुख का प्रशस्ति पुरस्‍कार से सम्‍मानित
    बटालियन ने 1989 में श्रीलंका में ‘ऑपरेशन पवन’ में भाग लिया और अब बटालियन की सैनिकों की वीरता के लिए दो वीर चक्र और छह सेना पदक मिले। बटालियन ने 1997-99 तक जम्मू-कश्मीर के पंजगाम में ‘ऑपरेशन रक्षक’ के दौरान 36 खूंखार आतंकवादियों को मार गिराया और बड़ी मात्रा में हथियार और गोलाबारूद बरामद किया। यूनिट की उपलब्धियों के लिए इसे एक शौर्य चक्र तथा आठ सेना पदकों सहित 17 वीरता पुरस्कार मिले। इस यूनिट को सेना प्रमुख का यूनिट प्रशस्ति पुरस्कार प्राप्त हुआ।

    यूएन के मिशन में बजाया डंका
    इस बटालियन को सूडान में संयुक्त राष्ट्र मिशन में काम करने का अवसर मिला। मार्च, 2008 से मई, 2009 तक सूडान में इस यूनिट ने अनेक मानवीय कार्यों में हिस्सा लिया और इसे फोर्स कमांडर के यूनिट प्रशस्ति से सम्मानित किया गया। असम में ऑपरेशन राइनो के दौरान बटालियन ने 15 कट्टर उग्रवादियों को मार गिराया और उनके पास से बड़ी मात्रा हथियार और गोलाबारूद बरामद किया। यूनिट को उल्लेखनीय प्रदर्शन के लिए जनरल ऑफिसर कमांडिंग इन चीफ (पूर्वी कमान) का प्रशस्ति प्राप्त हुआ। इस यूनिट ने ब्रिटेन में 2007 में आयोजित आर्मी कैम्ब्रियन पेट्रोल चैम्पियनशिप में भारतीय सेना का नेतृत्व किया और इसे स्वर्ण पदक प्राप्त हुआ। यह बटालियन अभी राष्ट्रपति के रस्मी सेना गार्ड का कर्तव्य निभा रही है।

    राजपूताना राइफल्‍स
    राष्‍ट्रीय ध्‍वज गार्ड के लिए सेना की टुकड़ी राजपूताना राइफल्स की 11वीं बटालियन से ली जाती रही है। इस ब‍टालियन का भी अपना गौरवशाली इतिहास रहा है। इस बटालियन की संस्‍थापना लेफ्टिनेंट कर्नल रिसाल सिंह (बाद में मेजर जनरल के रूप में सेवानिवृत्त) द्वारा 1 अक्‍टूबर, 1964 में राजपूत एवं जाट के एक निर्धारित वर्ग संघटन के साथ दिल्‍ली कैंट में की गई थी।

    देश और विदेश में दिखाया अदम्‍य साहस
    ‘वीर भोग्‍या वसुंधरा’ के ध्‍येय जिसका अर्थ होता है, ‘बहादुर ही पृथ्‍वी के उत्तराधिकारी बनेंगे’, के साथ इस बटालियन ने भारतीय सेना के सभी प्रमुख ऑपरेशनों जिनमें 1971 का भारत-पाक युद्ध, ‘ऑपरेशन ऑर्किड’, ‘ऑपरेशन पवन (श्रीलंका)’, ‘ऑपरेशन रक्षक-1 (पंजाब)', ‘ऑपरेशन रक्षक (जम्मू-कश्मीर)’, ‘ऑपरेशन मेघदूत’, ‘ऑपरेशन विजय’, ‘ऑपरेशन पराक्रम’, ‘ऑपरेशन फाल्कन’, ‘ऑपरेशन राइनो’, ‘यूएनएमआईएस (सुडान)’ शामिल है, में भाग लिया था। यह बटालियन अशोक चक्र, एक कीर्ति चक्र, छह शौर्य चक्र, एक शौर्य चक्र बार, चार वीर चक्र, 28 सेना पदक, एक विशिष्‍ट सेवा पदक और सैन्य कमांडरों द्वारा कई प्रशस्ति पत्रों के साथ एक बेहद अलंकृत है।

    यूएन मिशन पर बटालियन
    इस बटालियन को 1994 में ‘ऑपरेशन रक्षक (जम्‍मू-कश्‍मीर)’ एवं 1999 में एक बार फिर ‘ऑपरेशन मेघदूत’ एवं ‘ऑपरेशन विजय’ में इसके शानदार प्रदर्शन के लिए चीफ ऑफ आर्मी स्‍टॉफ यूनिट साइटेशन से पुरस्‍कृत किया गया। वे 1994 में जम्‍मू-कश्मीर राज्‍यपाल के साइटेशन, 2011 में सुडान में संयुक्‍त राष्‍ट्र मिशन में फोर्स कमांडर के साइटेशन तथा 1994 एवं 2018 में नॉदर्न आर्मी कमांडर साइटेशन के गौरवशाली प्राप्‍तकर्ता भी रहे हैं।

    कैप्‍टन हनीफुद्दीन की शहादत
    जम्‍मू–कश्‍मीर में टरटोक सब सेक्‍टर का नाम बटालियन के कैप्‍टन हनीफुद्दीन के बहादुरीपूर्ण कार्य के बाद बदलकर सब सेक्‍ट हनीफ कर दिया गया था। उन्‍होंने ‘ऑपरेशन विजय’ के दौरान लद्दाख क्षेत्र की बर्फीली ऊंचाई पर अपनी जान की कुर्बानी दी थी। कैप्‍टन हनीफुद्दीन को मरणोपरांत वीर चक्र से सम्‍मानित किया गया। इस यूनिट का युद्धघोष ‘राजा रामचन्‍द्र की जय’ है।

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