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    पश्चिम एशिया और खाड़ी देशों की यात्रा में पीएम मोदी के लिए अहम पड़ाव था फलस्तीन

    By Kamal VermaEdited By:
    Updated: Tue, 13 Feb 2018 10:36 AM (IST)

    मोदी की हालिया यात्रा में फलस्तीन कहीं अधिक महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि इजरायल के साथ उसका छत्तीस का आंकड़ा है, जबकि भारत के साथ उसकी कहीं अधिक नजदीकी।

    पश्चिम एशिया और खाड़ी देशों की यात्रा में पीएम मोदी के लिए अहम पड़ाव था फलस्तीन

    नई दिल्ली [सुशील कुमार सिंह]। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संयुक्त अरब अमीरात और फलस्तीन समेत ओमान की हालिया यात्रा में फलस्तीन कहीं अधिक महत्वपूर्ण इसलिए है, क्योंकि इजरायल के साथ उसका छत्तीस का आंकड़ा है, जबकि भारत के साथ उसकी कहीं अधिक नजदीकी। हालांकि इजरायल से पहले भारत से प्रगाढ़ता के मामले में फलस्तीन का ही नाम आता है। फलस्तीनी लोगों के साथ भारत की एकात्मता है। फलस्तीन के मसले पर स्वाधीनता संग्राम के दिनों में महात्मा गांधी द्वारा भी आवाज उठाई गई थी। देखा जाय तो फलस्तीन के साथ मित्रता और वैदेशिक नीति समय की कसौटी पर हमेशा आजमाई जाती रही और खरी भी रही है। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय दौरे होते रहे हैं। पूर्व राष्ट्रपति यासिर अराफात ने तो भारत का कई बार दौरा किया, जबकि मौजूदा राष्ट्रपति महमूद अब्बास 2005 से अब तक चार बार भारत का दौरा कर चुके हैं।

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    खाड़ी और पश्चिमी देशों की पांचवीं यात्रा

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2015 के बाद से खाड़ी और पश्चिमी देशों में यह उनकी पांचवीं यात्रा है, जबकि संयुक्त अरब अमीरात की यह दूसरी यात्रा अपनी चार दिवसीय यात्र के दौरान बीते 10 फरवरी को फलस्तीन पहुंचे प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत और फलस्तीन का संबंध समय की कसौटी पर खरा उतरा है और फलस्तीन हमारी विदेश नीति में हमेशा शीर्ष पर रहा है। फलस्तीनी राष्ट्रपति ने भी माना है कि भारत के प्रयासों पर उसे भरोसा है। भारत बहुपक्षीय मंचों पर फलस्तीन के मसले के लिए समर्थन जुटाने में सदैव भूमिका निभाई है। जैसे-इजरायल द्वारा विभाजन की दीवार का निर्माण किए जाने के विरुद्ध भारत ने अक्टूबर 2003 में यूएन के संकल्प के समर्थन में मतदान किया था। फलस्तीन को यूनेस्को के पूर्णकालिक सदस्य के रूप में स्वीकार करने को लेकर मतदान किया था। जुलाई 2014 में भी संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में फलस्तीन के पक्ष में भारत द्वारा किया गया वोट उसके साथ ऐतिहासिक संबंध का ही उदाहरण पेश करता है।

    फलस्तीन पर बांडुंग घोषणा का समर्थन

    साल 2015 के अप्रैल माह में एशिया-अफ्रीका शिखर बैठक में फलस्तीन पर बांडुंग घोषणा का समर्थन भारत ने किया, जबकि सितंबर 2015 में संयुक्त राष्ट्र परिषद में फलस्तीन के ध्वज को लगाने का समर्थन भारत द्वारा किया जाना संबंधों की पराकाष्ठा ही कही जाएगी। दशकों से फलस्तीन से गाढ़ी दोस्ती के बीच मोदी का इजरायल जाना एक साहसिक कदम था। गौरतलब है कि साल 2017 की 4 से 6 जुलाई के बीच जब मोदी इजरायल के दौरे पर थे तब देश के भीतर इस बात की चर्चा जोरों पर थी कि वे फलस्तीन क्यों नहीं जा रहे और यह भी चिंता थी कि इजरायल से संबंध के चक्कर में फलस्तीन से कोई ऊंच-नीच न हो जाय, पर कूटनीति के मामले में अव्वल स्थान घेर चुके नरेंद्र मोदी इस मामले में भी खरे उतरे। गौरतलब है कि इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इसी साल जनवरी में भारत का 6 दिवसीय दौरा कर चुके हैं।

    खाड़ी देशों में स्थिति बेहतरीन करना चाहता है भारत

    विशेषज्ञ मानते हैं कि मोदी की रामल्ला यात्र भारत-इजरायल के मजबूत होते रिश्तों के बीच फलस्तीन को सहज करने वाला पुरस्कार है। ऐसा प्रतीत होता है कि भारत, फलस्तीन और इजराइल के बीच आ रहा है, पर असलियत यह है कि भारत अपने कूटनीतिक फलक और बदलती दुनिया के मिजाज को समझते हुए पश्चिम एशिया तथा खाड़ी देशों में स्थिति बेहतरीन करना चाहता है। खाड़ी क्षेत्र आर्थिक और रणनीतिक वजहों से बेहद महत्वपूर्ण बन चुका है। यहां रहने वाले भारतीयों की संख्या भी 90 लाख हो चुकी है। इनसे देश का मुद्रा भंडार बढ़ रहा है। भारत की कुल ऊर्जा जरूरतों का 60 फीसद इन क्षेत्रों से पूरा हो रहा है। फिलहाल मोदी की तीन देशों की यात्र कूटनीतिक दृष्टि से कहीं अधिक प्रभावशाली करार दी जा सकती है। चीन और पाकिस्तान से लगातार अनबन हो रहे रिश्ते के बीच पश्चिम एशिया और खाड़ी देशों में भारत की यह ताजा कूटनीतिक पहल निजी तौर पर जाहिर है लाभकारी रहेगी।

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