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    अंतरिक्ष में रूस और अमेरिका को टक्कर देगा भारत, वर्ष 2022 का समय किया तय

    By Kamal VermaEdited By:
    Updated: Mon, 27 Aug 2018 09:58 PM (IST)

    वह दृश्य किसी को नहीं भूलता है जब केरल के थुंबा से छोड़े गए पहले रॉकेट को साइकिल पर रखकर ले जाया गया था। आज का भारत अंतरिक्ष में हासिल उपलब्धियों के बल पर अमेरिका-रूस जैसी हस्तियों को टक्कर दे रहा है।

    अंतरिक्ष में रूस और अमेरिका को टक्कर देगा भारत, वर्ष 2022 का समय किया तय

    अभिषेक कुमार सिंह। आज का भारत अंतरिक्ष में हासिल उपलब्धियों के बल पर अमेरिका-रूस जैसी हस्तियों को टक्कर दे रहा है। इस हैसियत में आने के क्रम में वह दृश्य किसी को नहीं भूलता है जब केरल के थुंबा से छोड़े गए पहले रॉकेट को साइकिल पर रखकर ले जाया गया था। इसके बाद प्रतिबंधों के बावजूद भारतीय स्पेस एजेंसी- इसरो ने चंद्रयान और मंगलयान जैसे कीर्तिमान रचने के अलावा सैकड़ों विदेशी सैटेलाइट को अपने अंतरिक्ष में भेजकर कमाई के रास्ते भी खोले हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि देश 2022 तक किसी भारतीय को अंतरिक्ष में भेजेगा। यह बेशक एक महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी। अब तक जो उपलब्धि अमेरिका, रूस और चीन ही हासिल कर पाए हैं, उस तक पहुंचने का एक अभिप्राय यह है कि इससे देश में विज्ञान और प्रौद्योगिकी क्षेत्र को लाभ मिलेगा। पर इससे बड़ी बात यह है कि भारत को स्पेस में मानव मिशन की जरूरत चीन की चुनौतियों के मद्देनजर है।

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    स्पेस में वैसे मानव मिशन के मामले में भारत के राकेश शर्मा 2 अप्रैल 1984 को सोवियत संघ के यान टी-11 के जरिये अंतरिक्ष की उड़ान भर चुके हैं। लेकिन चंद्रमा और मंगल पर मिशन भेजने के बावजूद भारत स्वदेशी प्रयासों के बल पर मानव मिशन की सफलता से अभी दूर है। ऐसा कारनामा सिर्फ तीन ही मुल्कों ने किया है। वर्ष 1961 में सोवियत संघ के यूरी गागरिन और अमेरिका के एलन बी शेपर्ड और 2003 में चीन के यांग लिवेई को अपने देश के ऐसे प्रथम नागरिक होने का गौरव मिल चुका है। सोवियत संघ यानी रूस तो अब तक स्पेस में 74 मानव मिशन भेज चुका है। अमेरिका और रूस की तुलना में भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रमों का सफर थोड़ा छोटा है। वर्ष 1969 में गठित भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने करीब पांच दशक के सफर में जो हासिल किया है, उसने विकसित देशों को भी चमत्कृत किया है। खास तौर से खर्च के मामले में। बात चाहे चंद्रयान या मंगलयान की हो या फिर सेटेलाइट प्रक्षेपण की, सीमित खर्च में सफलता की दर इसरो की अच्छी रही है। इस नजरिये से देखें तो भारत अपने मानव स्पेस मिशन से यही बात साबित करना चाहता है कि वह न केवल ऐसा करने में सक्षम है, बल्कि वह इस कामयाबी में भी मितव्ययिता की मिसाल रखना चाहता है।

    यह भी ध्यान रहे कि अंतरिक्ष में भारत के मानव मिशन के लिए तकरीबन वही कसौटियां होंगी, जो दुनिया के अन्य मुल्कों के लिए होती हैं। इसरो के मानव मिशन के लिए फिलहाल तय की गई शतोर्ं के मुताबिक इसके लिए भारतीय एस्ट्रोनॉट को कम से कम सात दिनों के लिए अंतरिक्ष में रहना होगा। इसके लिए बनाए जाने वाले अंतरिक्ष यान गगनयान में उड़ान भरने वाले अंतरिक्ष यात्री का चयन भारतीय वायुसेना द्वारा किया जाएगा और उन्हें स्पेस फ्लाइट की ट्रेनिंग विदेशों में दी जाएगी। इस अभियान की कुछ अहम शर्ते और हैं। जैसे, इस योजना को सिरे चढ़ाने से पहले मिशन में इस्तेमाल होने वाले रॉकेट जियोसिंक्रोनस सेटेलाइट लॉन्च व्हीकल मार्क-3 (जीएसएलवी-एमके-3) से कम से कम दो मानवरहित उड़ानें कराना अनिवार्य होगा। इसमें जरूरी यह है कि मार्क-3 पूरी तरह से स्वदेशी निर्माण होगा। इसरो के मुताबिक वह इसकी कुछ टेक्नोलॉजी विकसित कर चुका है। जैसे इसरो ने पहले ही क्रू मॉड्यूल और स्केप सिस्टम का परीक्षण कर लिया है। शेष तैयारियां अगले कुछ चरणों में पूरी हो जाएंगी।

    इसरो ने मंगलयान के अलावा अपने रॉकेटों में भारी विदेशी उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित करके जो प्रतिष्ठा हासिल की है, उसे देखते हुए गगनयान से किसी भारतीय को स्पेस में भेजने का उसका सपना नामुमकिन नहीं लगता है। फिर भी यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि चंद्रयान और मंगलयान के बाद इसरो को इस नई कसौटी पर खरा उतरने की कितनी जरूरत है। इस सवाल के परिप्रेक्ष्य में दुनिया में स्पेस टूरिज्म और अंतरिक्ष के संसाधनों के दोहन को लेकर हो रही पहलकदमियों पर नजर डालना जरूरी है। वर्जिन गैलेक्टिक, ब्लू ओरिजिन, जी-फोर्स वन, ब्लून, ल्यूशिन-76 एमडीके, स्पेस एडवेंचर, प्रोजेक्ट एम-55 एक्स समेत कई निजी कंपनियां इस कोशिश में हैं कि स्पेस टूरिज्म के सपने को साकार करते हुए लोगों को अंतरिक्ष भ्रमण कराया जा सके। अमेरिकी स्पेस संगठन ‘नासा’ भी दो व्यावसायिक स्पेस ट्रैवल पार्टनर कंपनियों के साथ मिलकर लोगों को स्पेस की सैर कराने के उद्देश्य के साथ काम कर रही हैं। इनमें से एक है एलन मस्क की कंपनी ‘स्पेसएक्स’ और दूसरी विमानन कंपनी ‘बोइंग’।

    इन कंपनियों ने स्पेसएक्स ड्रैगन कैप्सूल और बोइंग के सीएसटी-100 स्टारलाइनर यान में कुछ सीटें निजी यात्रियों को बेचने के लिए सुरक्षित रखी हैं। अगर नासा उन्हें इसकी इजाजत देती है, तो यान की सात में से एक सीट किसी निजी पर्यटक को बेची जाएगी। हालांकि स्पेस टूरिज्म की एक सांकेतिक शुरुआत 30 अप्रैल, 2001 को ही हो चुकी है, जब अमेरिकी पर्यटक डेनिस टीटो को रूस ने सोयूज रॉकेट के सहारे इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन तक भेजा। बाद में यह सिलसिला थमा गया। आगामी वर्षो में इसके (स्पेस टूरिज्म के) बेहद आम हो जाने का अनुमान है। ऐसे में भारत यदि मानव मिशन पर आगे बढ़ने की बात कर रहा है, इसका एक मकसद स्पेस टूरिज्म से देश के लिए पूंजी जुटाना भी हो सकता है। इसी तरह एक मामला अंतरिक्ष की खोज और उसके (संसाधनों के) दोहन का है। अमेरिका और रूस के बाद चीन इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। वह मानव मिशन को स्पेस में भेज चुका है और जल्द ही चंद्रमा पर ऐसा मिशन भेजने की उसकी योजना है। इससे आगे चलकर चंद्रमा के खनिजों के दोहन की बात भी उसके जेहन में है।

    साथ ही, अपने रॉकेटों से विदेशी सेटेलाइटों के प्रक्षेपण के बाजार में भी वह सेंध लगाना चाहता है ताकि इस मामले में भारत के इसरो की बढ़त और कमाई को कम किया जा सके। स्पेस मार्केट में दबदबे के लिए जरूरी है कि कोई देश चांद या अंतरिक्ष के मानव मिशनों से अपनी योग्यता व क्षमता लगातार साबित करे। भारत के लिए यह राहत की बात है कि पिछले कुछ अरसे में इसरो ने तमाम कामयाबियों से अपनी क्षमता दुनिया के सामने रखी है। इससे पूरे स्पेस मार्केट में खलबली तक है। असल में, आइटी और बीपीओ इंडस्ट्री के बाद अंतरिक्ष परिवहन ऐसे तीसरे क्षेत्र के रूप में उभरा है, जिसमें भारत को पश्चिमी देशों की आउटसोसिर्ंग से अच्छी-खासी कमाई हो रही है। माना जाता है कि इसरो से उपग्रहों का प्रक्षेपण करवाने की लागत अन्य देशों के मुकाबले 30-35 प्रतिशत कम है। एशियन साइंटिस्ट मैगजीन के अनुसार पिछले चार-पांच वषों में ही 15 विदेशी उपग्रहों को पीएसएलवी से प्रक्षेपित करके इसरो ने 54 लाख डॉलर की कमाई की है। भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए विदेशी सेटेलाइटों को अपने रॉकेटों से अंतरिक्ष में भेजने का उपक्रम असल में पैसा जुटाने का एक जरिया है।

    आज स्थिति यह है कि कई यूरोपीय देश भारतीय रॉकेट से अपने उपग्रह स्पेस में भेजना पसंद करते हैं। इसकी वजह शुद्ध रूप से आर्थिक है। भारतीय रॉकेटों के जरिये उपग्रह भेजना सस्ता पड़ता है। भारतीय रॉकेटों की सफलता दर भी काफी ऊंची है। पिछले कई वर्षो से पीएसएलवी रॉकेट कई विदेशी सेटेलाइटों को अंतरिक्ष की कक्षा में सफलतापूर्वक भेज चुके हैं। अंतरिक्ष अभियानों में जो देश इस संदर्भ में भारत का मजाक उड़ाते थे, आज वही देश अपने उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने के लिए भारतीय रॉकेटों का सहारा ले रहे हैं। आज भारत अगर इससे आगे बढ़ते हुए स्पेस में मानव मिशन की बात कर रहा है, तो उसका यह नजरिया देश को अंतरिक्ष में लंबे समय तक मजबूत खिलाड़ी के रूप में स्थापित करने का है ताकि देश की भावी पीढ़ी को ज्ञान से लेकर रोजगार तक में उसका फायदा मिल सके।

    (लेखक एफआइएस ग्लोबल से संबद्ध हैं)