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    हैदराबाद मुक्ति दिवस बन सकता है तेलंगाना की सियासत का केंद्र बिंदु, TRS और AIMIM में बढ़ी छटपटाहट

    आयोजन में भी खींचतान दिखेगी क्योंकि केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने 17 सितंबर के मुख्य कार्यक्रम में तेलंगाना के मुख्यमंत्री के साथ साथ कर्नाटक और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को भी बुलाया है जिसमें केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह मुख्य अतिथि होंगे।

    By Arun Kumar SinghEdited By: Updated: Thu, 15 Sep 2022 07:11 PM (IST)
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    केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, के चंद्रशेखर राव और ओवैसी।

    आशुतोष झा, नई दिल्ली। हैदराबाद में शनिवार यानी 17 सितंबर से आयोजित होने वाले हैदराबाद मुक्ति दिवस पर सबकी नजरें टिक गई हैं। दरअसल, यह माना जा रहा है कि साल भर चलने वाला यह कार्यक्रम अगले विधानसभा और लोकसभा चुनाव की दशा दिशा में भी परिवर्तन ला सकता है।

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    आयोजन को लेकर टीआरएस में ज्यादा बेचैनी

    शायद यही कारण है कि स्वतंत्रता से जुड़ने वाले इस ऐतिहासिक सांस्कृतिक कार्यक्रम को लेकर भी तेलंगाना की सत्तारूढ़ पार्टी टीआरएस और उससे नेता के चंद्रशेखर राव व एमआइएम नेता असदुद्दीन ओवैसी दूर-दूर भागना तो चाह रहे हैं लेकिन भाग नहीं पा रहे। टीआरएस में ज्यादा बेचैनी है।

    भाजपा की चुनावी रणनीति का एक अहम हिस्सा है राष्‍ट्रवाद

    केंद्र सरकार स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मना रही है और इसी क्रम में हैदराबाद मुक्ति दिवस एक अहम पड़ाव है। हालांकि केंद्र की ओर से इसे राजनीति से परे बताया जा रहा है लेकिन इसमें शक नहीं कि इसका असर सियासी भी होगा। राष्ट्रवाद भाजपा की चुनावी रणनीति का एक अहम हिस्सा है। हर राज्य में भाजपा किसी ऐतिहासिक घटना या व्यक्तित्व की छवि के साथ ही प्रवेश करती है जिसका असर पूरे राज्य पर हो। संभव है कि हैदराबाद और निजाम का ऐतिहासिक पहलू तेलंगाना में कुछ उसी तरह काम करे।

    विलय को लेकर जनता पर किए गए थे अत्‍याचार

    तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने पुलिस एक्शन के जरिए हैदराबाद को निजाम और उसके अत्याचारी रजाकारों से मुक्त कराकर भारत में विलय कराया था। जो कार्यक्रम है, उसके तहत अलग अलग माध्यमों से यह भी याद दिलाया जाएगा कि किस तरह उस समय की जनता अत्याचार सहा था। यही पहलू टीआरएस नेता और मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव और ओवैसी को डरा रहा है।

    चंद्रशेखर राव से पूछे जा सकते हैं सवाल

    गौरतलब है कि तेलंगाना में अल्पसंख्यक समुदाय लगभग 25 फीसद है। चंद्रशेखर राव की चुनावी जीत में ओवैसी की भूमिका भी मानी जाती है। रजाकारों के अत्याचार की याद ताजा हुई तो एक बड़ा वर्ग चुनाव में अलग हो सकता है और चंद्रशेखर राव से सवाल भी पूछे जा सकते हैं।

    टीआरएस और एमआइएम ने की अलग आयोजन की तैयारी

    दरअसल, तेलंगाना गठन से पहले राव की ओर से ही हैदराबाद मुक्ति दिवस मनाने की बात की जाती रही थी। उनकी ओर से तत्कालीन कांग्रेस सरकार पर दबाव भी बनाया जाता था। लेकिन सत्ता में आने के बाद से उन्होंने इसे टाल दिया। अब जबकि भाजपा की केंद्र सरकार ने हैदराबाद मुक्ति दिवस के आयोजन का निर्णय लिया है तो पहली बार टीआरएस और एमआइएम ने सरकार से अलग हैदराबाद विलय दिवस के आयोजन की तैयारी कर ली।

    राष्‍ट्रीय आयोजन में तेलंगाना के मुख्यमंत्री के शामिल होने की संभावना कम

    आयोजन में भी खींचतान दिखेगी क्योंकि केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने 17 सितंबर के मुख्य कार्यक्रम में तेलंगाना के मुख्यमंत्री के साथ साथ कर्नाटक और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को भी बुलाया है, जिसमें केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह मुख्य अतिथि होंगे।

    तेलंगाना के मुख्यमंत्री इसमें शामिल होंगे, इसकी संभावना तो कम है लेकिन यह सवाल फिर से उनके आमने सामने घूमेगा कि जब कर्नाटक और महाराष्ट्र अरसे से इसे मुक्ति दिवस के रूप में मनाता है तो तेलंगाना सरकार की क्या मजबूरी है। वर्तमान कर्नाटक और महाराष्ट्र का कुछ हिस्सा उस वक्त हैदराबाद निजाम के अधीन आता था। इस बार तेलंगाना कांग्रेस भी हैदराबाद मुक्ति दिवस में शामिल होगी जबकि चंद्रशेखर राव और ओवैसी अलग मंच पर होंगे।

    ओवैसी के दादा को सौंपा गया था निजाम के अत्याचारी रजाकार का उत्‍तराधिकार

    ऐसा बताया जाता है कि निजाम के अत्याचारी रजाकार कासिम रिजवी ने पाकिस्तान जाने से पहले उत्तराधिकार अब्दुल वाहिद ओवैसी को सौंप दिया था जो असदुद्दीन ओवैसी के दादा थे। जाहिर तौर पर अगर उस वक्त को याद दिलाया जाएगा तो ओवैसी के सियासी आधार पर फर्क पड़े न पड़े, चंद्रशेखर राव के लिए परेशानी खड़ी होगी।

    तेलंगाना में 2023 में होने हैं विधानसभा चुनाव

    यह भी ध्यान रहे कि विधानसभा चुनाव 2023 के नवंबर दिसंबर में संभावित है और हैदराबाद मुक्ति दिवस का आयोजन 17 सितंबर 2023 तक राज्य के अलग-अलग हिस्सों में चलना है। इसका राजनीति पर कितना असर होगा यह तो वक्त बताएगा लेकिन दो वर्ष पहले ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनाव में भी भाजपा ने दम लगाया था और बड़ी संख्या में वार्ड जीतने में कामयाब रही थी। हाल में कुछ महीने में राष्ट्रीय कार्यकारिणी का आयोजन भी हैदराबाद में ही किया था और वहा हैदराबाद का नाम बदलकर भाग्यनगर करने की भी बात हुई थी।