नैनीताल, जेएनएन। हाई कोर्ट में उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्रियों के सरकारी आवास समेत अन्य सुविधाओं के बकाया मामले में सुनवाई पूरी हो गई है। कोर्ट ने मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया है । वहीं कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री और नैनीताल सीट से वर्तमान सांसद भगत सिंह कोश्यारी द्वारा दाखिल जवाब को बेहद गंभीरता से लिया। उन्‍होंने गरीबी का हवाला देते हुए बकाया जमा करने में असमर्थता जताई है। पूर्व सीएम विजय बहुगुणा व डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक की ओर से साफ कर दिया है कि उनके द्वारा सरकार की ओर से निर्धारित किराया जमा कर दिया गया है जबकि पूर्व सीएम कोश्यारी ने धनाभाव में निर्धारित राशि जमा करने में असमर्थता जताई है। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता की ओर से दलील दी गई कि पूर्व मुख्यमंत्रियों को असंवैधानिक तरीके से आवासों का आवंटन किया गया है।

मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति रमेश चंद्र खुल्बे की खंडपीठ में देहरादून की संस्था रूरल लिटीगेशन एंड एनटाइटिलमेंट केंद्र रूलक के अध्यक्ष अवधेश कौशल ने जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान सरकार के साथ ही याचिकाकर्ता तथा पूर्व मुख्यमंत्रियों की ओर से बहस पूरी की गई। याचिका में पांच पूर्व मुख्यमंत्रियों क्रमश: भगत सिंह कोश्यारी, एनडी तिवारी, डॉ निशंक, भुवन चंद्र खंडूड़ी, विजय बहुगुणा को सरकारी आवास आवंटन को चुनौती दी गई थी। सरकार की ओर से बताया गया कि पूर्व मुख्यमंत्रियों पर 2.85 करोड़ बकाया है, जबकि याचिकाकर्ता की ओर से किराया समेत सुरक्षा, बिजली, पानी टेलीफोन समेत अन्य सुविधाओं का 13.50 करोड़ बकाया होने का उल्लेख किया गया। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता कार्तिकेय हरिगुप्ता ने बताया कि सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत सरकारी विभागों तथा जिलों से मांगी सूचना में यह जानकारी मिली है।

सांसद कोश्यारी ने पैसा नहीं होने का दिया हलफनामा

हाई कोर्ट में पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी की ओर से हलफनामा देकर कहा गया कि वह गरीब हैं, लिहाजा वह बकाया किराया वहन नहीं कर सकते। इसके बाद याचिकाकर्ता की ओर से कोश्यारी द्वारा चुनाव नामांकन पत्र के संलग्न दस्तावेज हासिल कर कोर्ट के समक्ष पेश किए गए। जिसमें साफ उल्लेख है कि उनकी होटल में हिस्सेदारी है, जमीन, एफडी, गाड़ी आदि है। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कहा कि तमाम संपत्ति के बाद कोश्यारी गरीब कैसे हो गए। मंगलवार को सुनवाई के दौरान कोश्यारी के अधिवक्ता द्वारा हलफनामे में इन बिन्दुओं का गलत होना स्वीकार किया गया।

पूर्व सीएम को सुविधाएं देने का राज्य में कोई नियम ही नहीं

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगला समेत अन्य सुविधाएं देने के मामले में सरकार राज्य का एक्ट बनाना ही भूल गई। सरकार ने उत्तर प्रदेश का एक्ट लागू करना स्वीकार किया लेकिन उसे संशोधित नहीं किया। यहां तक की कोर्ट में दिए हलफनामे में लागू एक्ट में लखनऊ का उल्लेख कर दिया, जबकि उत्तर प्रदेश के अधिनियम में साफ तौर पर अंकित किया गया था कि सुविधा सिर्फ लखनऊ में दी जा सकती है। अंतत: राज्य सरकार को यह स्वीकार करना पड़ा कि उत्तराखंड में इस संबंध में कोई अधिनियम प्रभावी नहीं है।

जानिए क्‍या है नियम

दरअसल, 1981 में उत्तर प्रदेश में बने अधिनियम में साफ उल्लेख था कि मुख्यमंत्री, मंत्रियों को पद पर बने रहने तक सरकारी आवास मुफ्त मिलेगा। पद से हटने के 15 दिन में उन्हें आवास खाली करना होगा। 1997 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इस नियम में बदलाव कर कहा कि अब पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन सरकारी आवास आवंटित किया जाएगा। एक्ट में यह भी उल्लेख था कि आवास सिर्फ लखनऊ में ही दिया जाएगा, बाहर नहीं। नौ नवंबर 2000 को उत्तराखंड बनने के बाद यह नियम यहां अप्रभावी हो गया। राज्य सरकार ने उत्तर प्रदेश के एक्ट को उत्तराखंड के लिए मोडिफाई तो नहीं किया, मगर कोर्ट में बताया कि सरकार ने 2004 में लोकसेवकों को प्रतिमाह एक हजार रुपये किराये पर आवास देने के रूल्स बनाए थे। इसमें कहा गया है कि ट्रांसफर होने के बाद अधिकतम तीन माह तक लोकसेवक आवंटित आवास में रह सकते हैं, फिर हर हाल में खाली करना होगा। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता कार्तिकेय हरिगुप्ता के अनुसार यह रूल्स सरकारी लोकसेवकों के लिए है, यह पूर्व मुख्यमंत्रियों पर लागू नहीं हो सकता।

बाजार दर में किसी ने जमा नहीं किया बकाया

भले ही पूर्व सीएम डॉ. निशंक व विजय बहुगुणा ने किराया जमा करने की बात कही हो, मगर यह किराया बाजार दर के हिसाब से नहीं जमा किया गया है। पिछले दिनों इस मामले में दाखिल हलफनामे में सरकार घिर गई थी। पहले शपथ पत्र में सरकार ने हाई कोर्ट को बताया कि राज्य कैबिनेट ने पूर्व मुख्यमंत्रियों पर बकाया माफ करने का निर्णय लिया है, जब याचिकाकर्ता के अधिवक्ता की दलील पर कोर्ट ने कैबिनेट निर्णय की प्रति मांगी तो पता चला कि कैबिनेट ने हाई कोर्ट से किराया माफ करने की प्रार्थना का उल्लेख किया था। इसके लिए सरकार ने गलती स्वीकारी।

यूपी के रूल्स को सुप्रीम कोर्ट ने ठहराया असंवैधानिक

सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में उत्तर प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्रियों को आवासीय व अन्य सुविधाएं देने के लिए 1997 में लागू अधिनियम को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया था। अधिवक्ता कार्तिकेय हरिगुप्ता गुप्ता का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश पूरे राज्य में लागू होता है। साथ ही सवाल उठाया कि सरकार ने हलफनामे में यह नहीं बताया कि पूर्व मुख्यमंत्रियों द्वारा जनहित में किए गए कार्य कैसे अमूल्य सेवा का हिस्सा बन गए। राज्य 48 हजार करोड़ के वित्तीय घाटे में है और तेल नहीं होने की वजह से एंबुलेंस खड़ी हैं, ऐसे में पूर्व सीएम से पूरी वसूली की जानी चाहिए।

तो कोश्यारी की संपत्ति की होगी जांच

हाई कोर्ट में कहा गया कि पूर्व मुख्यमंत्री कोश्यारी की वित्तीय स्थिति की जांच कराई जाए। साथ ही यह पता लगाने को कहा है कि उनके द्वारा कोर्ट में दाखिल शपथ पत्र गलत तो नहीं है। वहीं सरकार की ओर से साफ किया गया है कि पूर्व मुख्यमंत्रियों द्वारा राज्य की अमूल्य सेवा की गई है।

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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