Exclusive Interview: मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा, यथास्थिति का सवाल उठाने वाले खुद रहे उसका हिस्सा
सर्वानुमति की बात हमने कांग्रेस के 138 साल के इतिहास में इस परंपरा के लिहाज से की थी। अभी तक केवल चार बार नेताजी सुभाष चंद्र बोस पुरूषोत्तम दास दंडन सीताराम केसरी और सोनिया गांधी का ही वोटिंग के जरिए चुनाव हुआ।

कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ रहे वरिष्ठ पार्टी नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने खुद को पार्टी प्रतिष्ठान का उम्मीदवार और यथास्थिति का प्रतीक बताए जाने को लेकर अपने प्रतिद्वंदी शशि थरूर पर तीखा निशाना साधा है। उनका कहना है कि सोनिया गांधी का नेतृत्व यथास्थिति था तो फिर ऐसे सवाल उठाने वाले थरूर जैसे लोग भी इसका हिस्सा थे और इसके लिए वे भी जिम्मेदार हैं। अध्यक्ष चुनाव जीतने पर पार्टी में सुधारों को सबकी सहमति से आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताते हुए वे कहते हैं कि दो चुनावों में कांग्रेस के विचाराधारा की हार हुई है, किसी व्यक्ति या परिवार की नहीं। धुआंधार चुनाव प्रचार के बीच दैनिक जागरण के सहायक संपादक संजय मिश्र से मल्लिकार्जुन खड़गे ने खास बातचीत की। पेश है इसके अंश-
-कांग्रेस अध्यक्ष पद चुनाव पर केवल आपकी पार्टी ही नहीं देश के लोगों की नजरें लगी हैं ऐसे में मजबूत विपक्षी विकल्प के रूप में कांग्रेस की वापसी के लिए आपके पास कोई रूपरेखा है?
भाजपा के हाथ में सत्ता सियासत की सारी ताकत जिस तरह केंद्रित हो गई है और संविधान की अनदेखी कर चुनी हुई सरकारों को खरीद-फरोख्त व डरा-धमका कर गिराया जा रहा है। भयमुक्त व निष्पक्ष चुनाव की लोकतंत्र की संवैधानिक व्यवस्था पर प्रहार हो रहा उसमें कांग्रेस को फिर से उपर उठाना सबसे अहम है क्योंकि हमारी मजबूती में देश की मजबूती है। जहां तक पार्टी में बदलावों की बात है तो चुनाव बाद नेताओं-कार्यकर्ताओं से विचार कर उनका भरोसा हासिल करते हुए जरूरी कदम उठाएंगे। कांग्रेस की कमजोरी से ज्यादा ध्रुवीकरण के जरिए आग लगाने और धर्म के नाम पर सामाजिक विभाजन की भाजपा नीति इसकी वजह है।
बड़े-बड़े नेता हताशा, नाउम्मीदी में कांग्रेस छोड़ रहे हैं, आप कैसे अपने नेताओं-कार्यकर्ताओं को भरोसा दिलाएंगे कि उनका और कांग्रेस दोनों का भविष्य है?
जो नेता वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध होता है उसके सामने दिक्कतें आती भी हैं तो उसका सामना कर वह आगे बढ़ता है। जिसका विचारधारा में विश्वास ही नहीं है, केवल सत्ता-सियासत उसकी लालसा है, उससे आप अपेक्षा नहीं कर सकते। कांग्रेस ही नहीं कई क्षेत्रीय दलों में तमाम ऐसे लोग हैं जो कभी सांसद-विधायक तक नहीं बने मगर वैचारिक प्रतिबद्धता के चलते मरते दम तक पार्टी में रहते हैं। वसूलों पर चलने वाले लोग पार्टी नहीं छोड़ते।
कांग्रेस की चुनौती उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल, ओडिसा, आंध्रप्रदेश जैसे बड़े राज्यों में काफी विकट है, इन सूबों में उसके नेताओं की पूरी पीढ़ी ही खत्म हो गई है, ऐसे में पार्टी को पुनर्जीवन कैसे मिलेगा?
मैं अकेला सब कुछ नहीं कर सकता। लोकतंत्र में कोई मैं ही सब बदल दूंगा की बात करता है तो यह ढोंग है। इन राज्यों में हमारे लिए चुनौती है। हमारी कमजोरी को लेकर पार्टी में हर व्यक्ति को दर्द है। यहां पार्टी को मजबूत बनाने का रास्ता हम सामूहिक विचार-विमर्श से ही निकालेंगे।
कांग्रेस अध्यक्ष पद चुनाव में आपकी सर्वानुमति के प्रस्ताव पर शशि थरूर तैयार नहीं हुए थे, ऐसे में यह चुनाव पार्टी के बिखराव को रोकने में कैसे कारगर होगा?
चुनाव पार्टी को एकजुट रखने के लिए ही हो रहा है। सर्वानुमति की बात हमने कांग्रेस के 138 साल के इतिहास में इस परंपरा के लिहाज से की थी। अभी तक केवल चार बार नेताजी सुभाष चंद्र बोस, पुरूषोत्तम दास दंडन, सीताराम केसरी और सोनिया गांधी का ही वोटिंग के जरिए चुनाव हुआ। आम सहमति नहीं हुई तो पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं-कार्यकर्ताओं के कहने पर मैं उनकी तरफ से चुनाव लड़ रहा हूं।
आपके प्रतिद्वंदी थरूर तो आपको पार्टी प्रतिष्ठान का उम्मीदवार बताते हुए आपके जीतने पर संगठन में यथास्थिति बने रहने की बात कह रहे, क्या उनकी बात सही नहीं?
सोनिया-राहुल गांधी ने 22 साल तक कांग्रेस का नेतृत्व किया और उसमें दो बार पार्टी लगातार केंद्र की सत्ता में रही तो क्या यह यथास्थिति था। अगर था तो ऐसी बात बोलने वाले लोग इस निर्णय का हिस्सा रहे। सोनियाजी और राहुलजी के नेतृत्व में हम एक-एक चुनाव हार गए तो सब कुछ खराब हो गया। यह हुआ तो फिर आपकी भी जवाबदेही है, आप भी हिस्सेदार हो इसमें। गांधी परिवार का या प्रतिष्ठान का उम्मीदवार कहना गलत है। मैं सबका उम्मीदवार हूं, सबने आकर मुझसे चुनाव लड़ने को कहा। जहां तक गांधी परिवार की बात है तो उनका समर्थन और आशीर्वाद स्वाभाविक रूप से लूंगा क्योंकि दो दशक से अधिक के उनके अनुभवों का पार्टी को फायदा मिलेगा।
लंबे अर्से बाद नेतृत्व गांधी परिवार के पास नहीं होगा, आप अध्यक्ष बनते हैं तो क्या पार्टी में परिवार के लिए कोई भूमिका रहेगी?
गांधी परिवार अलग नहीं कांग्रेस का हिस्सा है। उनकी वजह से पार्टी में बहुत से बदलाव आए। सोनिया गांधी ने मुश्किल स्थितियों में पार्टी संभाली और 10 साल तक पार्टी को सत्ता में रखते हुए खुद नहीं अपने नेताओं को पद पर बिठाया यह क्या कोई छोटा योगदान है। हम भाजपा से वैचारिक लड़ाई लड़ रहे हैं और हमारी विचाराधारा की हार हुई है, किसी व्यक्ति या परिवार की नहीं। हम एक होकर भाजपा से लड़ेंगे। यह चुनाव घर का है और हर घर में मतांतर होता है पर आखिर में सब मिलकर काम करेंगे।
भाजपा आपके मुखौटा व रबर स्टांप अध्यक्ष बनने का तंज कस रही, इस आक्षेप से कैसे निपटेंगे?
भाजपा अपने अंदर झांके वह कैसे अध्यक्ष बनाते हैं। भाजपा में तो डेढ आदमी ही अध्यक्ष तय कर देते हैं, उनका कभी कोई चुनाव हुआ क्या? चुनाव करने वाले डेलिगेट की उनकी कोई लिस्ट है। हमारे चुनाव को तो पूरा देश देख रहा है।
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