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    ब्रिटेन की प्रधानमंत्री लिज ट्रस के कार्यकाल में भारत-ब्रिटेन के रिश्ते परवान चढ़ने की उम्मीद

    भारत की समस्या यह है कि सीमा पर तनाव के बाद भी व्यापार को लेकर चीन पर निर्भरता कम नहीं हो रही। भारत के लिए ब्रिटेन महत्वपूर्ण आयातक देश है। ऐसे में भारत के साथ होने वाले मुक्त व्यापार समझौते पर नई प्रधानमंत्री लिज ट्रस शीघ्र सहमति दे सकती हैं।

    By Sanjay PokhriyalEdited By: Updated: Wed, 21 Sep 2022 03:00 PM (IST)
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    प्रधानमंत्री लिज ट्रस (बाएं) के कार्यकाल में भारत-ब्रिटेन रिश्ते परवान चढ़ने की उम्मीद। फाइल

    डा. सुशील कुमार सिंह। ब्रिटेन को पछाड़ते हुए भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। भारत की जीडीपी साढ़े तीन ट्रिलियन डालर हो चुकी है। अर्थशास्त्री जिम ओ नील ने भी लिखा है कि भारत जल्द ही विश्व को सबसे अधिक प्रभावित करने वाले देशों में से एक होगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि जैसे-जैसे भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ेगी इसकी राजनीतिक, सैन्य और सांस्कृतिक शक्ति के साथ वैश्विक प्रभाव में भी परिवर्तन आएगा। इसी बीच लिज ट्रस ब्रिटेन की नई प्रधानमंत्री चुनी गई हैं। उन्होंने अपने देश को इस बात का भरोसा दिलाया है कि वह आर्थिक संकट से ब्रिटेन को बाहर निकालेंगी। लिज ट्रस जब विदेश मंत्री थीं तब भी वह भारत के प्रति सकारात्मक नजरिया रखती थीं।

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    यहां तक कि रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी भारत को लेकर सख्त टिप्पणियों से परहेज किया। भारत-ब्रिटेन संबंधों को मजबूत करने समेत रक्षा, शिक्षा, व्यापार, पर्यावरण आदि के मामले में भी उनका दृष्टिकोण समर्थन वाला ही रहा है। वैसे भी ब्रिटेन में प्रधानमंत्री कोई भी हो भारत को नजरअंदाज नहीं कर सकता। लिज ट्रस भी इस बात को जानती हैं। वैसे भी भारत और ब्रिटेन के मध्य मजबूत ऐतिहासिक संबंध रहे हैं। हाल के वर्षों में दोनों देशों के कूटनीतिक संबंधों को एक नई दिशा मिली है।

    यूरोप में व्यापार करने के लिए भारत ब्रिटेन को द्वार समझता है। लिज ट्रस कैबिनेट मंत्री के रूप में पूर्व में भारत की यात्रा कर चुकी हैं। वह मानती रही हैं कि भारत निवेश के लिए हर तरह से उपयुक्त है। भारत के लिए ब्रिटेन एक महत्वपूर्ण आयातक देश है। ऐसे में भारत के साथ होने वाले मुक्त व्यापार समझौते पर लिज ट्रस शीघ्र सहमति दे सकती हैं। गौरतलब है कि भारत और ब्रिटेन के बीच तकरीबन 23 अरब पाउंड का सालाना व्यापार होता है और ब्रिटेन को यह उम्मीद है कि मुक्त व्यापार के जरिये इसे 2030 तक दोगुना किया जा सकता है।

    ध्यातव्य हो कि भारत के साथ संबंधों को मजबूत करके ब्रिटेन हिंद प्रशांत क्षेत्र के अन्य देशों में भी अपने लिए अवसर बना सकता है। इस संबंध में दोनों देशों के बीच 2015 में एक समझौता हुआ भी है। इस क्षेत्र में दुनिया के 48 देशों की करीब 65 प्रतिशत आबादी रहती है। यहां के खनिज संसाधनों पर चीन की नजर हमेशा रही है। इसी के चलते इस क्षेत्र के देशों को अपनी सामरिक नीति के तहत वह कर्ज जाल में फंसाकर उनके बंदरगाहों पर कब्जा कर रहा है। हालांकि अन्य देश चीन की इस चाल को समझने लगे हैं। अमेरिका, आस्ट्रेलिया और जापान समेत भारत का रणनीतिक संगठन क्वाड इसी की देन है। इसके जरिये दक्षिण चीन सागर में चीन के एकाधिकार को तोड़ कर उसकी नकेल कसने में मदद मिली है। बावजूद इसके वैश्विक पटल पर कुछ भी स्थिर नहीं रहता।

    आर्थिक वर्चस्व और बाजार तक जाने की लड़ाई में कौन किस हद तक चला जाएगा इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। विदित हो कि इस वर्ष भारत और ब्रिटेन के बीच कई समझौते हुए हैं। इसमें ब्रिटेन द्वारा भारत को नए लड़ाकू विमानों और जल परिवहन की प्रौद्योगिकी एवं सुरक्षा के मसले पर भारत को सहयोग देने की बात कही गई है। तब 2030 तक दोनों देशों के द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करने का रोडमैप भी दिया गया था। वास्तव में देखा जाए तो ब्रिटेन में सत्ता परिवर्तन का भारत पर तनिक मात्र भी नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा। दरअसल भारत की असल चिंता चीन है। हालांकि यूरोपीय एवं अमेरिकी देशों एवं आस्ट्रेलिया, जापान और दक्षिण कोरिया के साथ भारत के प्रगाढ़ संबंध चीन को संतुलित करने के काम आ रहे हैं।

    भारत की समस्या यह है कि सीमा पर तनाव के बाद भी व्यापार को लेकर चीन पर निर्भरता कम नहीं हो रही। हालांकि चीन से पूरी तरह व्यापार समाप्त करना संभव भी नहीं है। भारत इसे संतुिलत करना चाहता है। इसका सबसे अच्छा उपाय है आत्मनिर्भर भारत आभियान को सफल बनाना। इसके लिए पहले मेक इन इंडिया को सफल बनाना होगा। इसमें ब्रिटिश निवेश मददगार हो सकता है। इसमें नई प्रधानमंत्री लिज ट्रस की भूमिका अहम होगी। अगर वह भारत के अपने रिश्ते को नई ऊंचाई देती हैं तो यह उनके लिए भी फायदेमंद साबित होगा। सबसे प्रमुख यह है ब्रिटेन को अपने उत्पादों के लिए एक बड़ा बाजार मिलेगा। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक भरोसेमंद आवाज मिलेगी। इससे संकट में फंसी ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को बाहर निकालने में मदद मिल सकेगी।

    [निदेशक, वाईएस रिसर्च फाउंडेशन आफ पालिसी एंड एडमिनिस्ट्रेशन]