नई दिल्ली, जागरण स्पेशल। 20वीं सदी में फिर भी गांव के लोग देश-दुनिया में अपनी छाप छोड़ रहे हैं, लेकिन आज से करीब 60-70 साल पहले गांव के लोग गांव से भी बाहर जाने के लिए 100 बार सोचते थे। गांव का हर एक शख्स खेती में व्यस्त रहता था। खेलने के नाम पर छोटे-मोटे खेल हुआ करते थे। ऐसे में अगर किसी के अंदर कोई प्रतिभा छिपी होती तो वो बाहर नहीं निकल पाती थी। 

भारत के इसी समाज में उस दौर में भी गांव में कुछ ऐसे लोग थे जो अपने जुनून की वजह से देश-दुनिया में पहचाने जाने लगे। उन्हीं में से एक नाम है खशाबा दादासाहेब जाधव, जिन्हें हम केडी जाधव के नाम से जानते हैं। केडी जाधव यूं तो महाराष्ट्र के छोटे से गांव गोलेश्वर में जन्मे थे, लेकिन उन्होंने कुश्ती में अपना जौहर दिखाते हुए भारत को पहला व्यक्तिगत ओलंपिक मेडल दिलाया था।

पाॅकेट डायनमो के नाम से मशहूर रहे केडी जाधव को बचपन से ही कुश्ती का शौक था। यही वजह रही कि उन्होंने रेसलिंग की दुनिया में कदम रखा और फिर भारत का नाम रोशन किया। केडी जाधव का सपना था कि वो ओलंपिक में मेडल जीतकर लाएं। हालांकि, पहली बार वे भारत के लिए पदक लाने में नाकाम रहे, लेकिन हिम्मत और मेहनत के बूते उन्होंने अगले ही ओलंपिक में पद हासिल कर लिया। 

केडी जाधव ने फ्री रेसलिंग का कड़ा अभ्यास किया और 1948 में हुए लंदन ओलंपिक में भाग लेने का मन बनाया, लेकिन केडी जाधव के पास उस समय तंगी थी। इसलिए उनका लंदन जाकर ओलंपिक मेडल जीतने का सपना टूट ही रहा था कि उनके हौसले को देखते हुए कोल्हापुर के महाराजा ने केडी जाधव की मदद की और उन्हें लंदन भेजा। हालांकि, रेसलर केडी जाधव को वहां निराशा हाथ लगी और वे खाली हाथ लौट आए। 

हार गए, लेकिन हिम्मत नहीं हारी

केडी जाधव अपने पहले ओलंपिक में रेसलिंग भले ही हारकर आए थे, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी थी। एक बार फिर से लगातार चार साल तक अभ्यास कर अगले ओलंपिक की तैयारी की। आखिरकार वो घड़ी आ ही गई, जब कोई भारतीय 1952 में फिनलैंड की धरती पर हेलसिंकी ओलंपिक में इतिहास रचने वाला था। गरीब परिवार से होने के कारण एक बार फिर केडी जाधव के पैर डगमगाए, लेकिन इस बार राज्य सरकार ने सहायता की।

महाराष्ट्र सरकार ने केडी जाधव को फिनलैंड जाने और ओलंपिक में भाग लेने के लिए 4000 रुपये की आर्थिक मदद की, लेकिन ये राशि कम थी। इसलिए केडी जाधव ने परिवार से सलाह की और अपना आशियाना यानी घर गिरवी रख दिया, क्योंकि उनका लक्ष्य अब देश के लिए मेडल जीतना था। केडी जाधव ने गोल्ड मेडल के लिए दांव लगाया, लेकिन ब्रॉन्ज मेडल से संतोष करना पड़ा।

बताया जाता है कि केडी जाधव गोल्ड मेडल जीत भी सकते थे, लेकिन वहां पर मैट सर्फेस पर वे एडजस्ट नहीं कर पाए और हार गए। हालांकि, केडी जाधव के लिए ये ओलंपिक पदक भी अपने आप में इतिहास था, क्योंकि इससे पहले 50 साल से ज्यादा के समय में कभी भी किसी एक व्यक्ति ने भारत की ओर से कोई मेडल नहीं जीता था।  

फिर मिला असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर का औहदा

भारत लौटने के बाद केडी जाधव का भव्य स्वागत हुआ। केडी जाधव के पुत्र रंजीत जाधव ने एक बार दूरदर्शन न्यूज चैनल को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि दादासाहेब का स्वागत 101 बैलगाड़ियों की जोड़ियों से किया गया था। भारत आते ही जाधव ने सबसे पहले अपना घर छुड़ाया। वहीं सरकार की ओर से भी उन्हें मदद की गई।

केडी जाधव को मुंबई पुलिस में सब इंस्पेक्टर की नौकरी मिली, जहां उन्होंने काफी अच्छा काम किया। शायद इसीलिए वह 1982 में 6 महीने के लिए असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर की कमान मिली। हालांकि, इस दौरान भी वह अपनी कुश्ती को बरकरार रखे हुए थे, लेकिन 14 अगस्त 1984 में एक सड़क दुर्घटना में केडी जाधव गंभीर रूप से घायल हो गए और फिर वे हमेशा के लिए दुनिया को अलविदा कह गए।

Posted By: Vikash Gaur