नई दिल्ली। 'तीन तलाक' को लेकर चल रही बहस के बीच एक बार फिर से शाहबानो मामले की भी आवाज सुनाई देने लगी है। शाहबानो का मामला भारतीय कानून के इतिहास का सबसे चर्चित हिस्सा माना गया है। आजाद भारत के इतिहसा में शाहबानो के मामले ने राजनीति में जितनी उथल-पुथल मचाई आज तक शायद किसी दूसरा कोई मामला नहीं उठा सका।

इस मामले में आए कोर्ट के फैसले और इसके बाद शुरू हुई राजनीतिक उथल-पुथल के बीच तत्कालीन सरकार के से कुछ नेताओं की नाराजगी भी किसी से छिपी नहीं। ऐसे ही एक नेता आरिफ मोहम्मद खान भी थे। खान उस वक्त केंद्र सरकार में मंत्री थे, जब राजीव गांधी ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड बिल को सदन से मंजूरी दिलाई थी।

खान ने उस वक्त राजीव गांधी सरकार की इस कदम के लिए कड़ी आलोचना भी की थी। एक अंग्रेजी अखबार में छपे इंटरव्यू में खान ने बताया कि शाहबानो मामले में राजीव गांधी सरकार के घुटने टेकने से वह काफी नाराज थे। इस नाराजगी को उन्होंने अपने भाषण में जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस और सरकार को इतना कोसने के बाद उनका पार्टी या सरकार में बने रहने का कोई अर्थ नहीं था, लिहाजा उन्होंने दोनों ही से बाहर जाने का निर्णय लिया।

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उन्होंने बताया कि जब उन्होंने पार्टी और सरकार से अपना इस्तीफा दिया उस वक्त राजीव गांधी ने उनसे उनका फैसला बदलने की भावुक अपील भी की थी, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया। उनका कहना था कि सरकार अपना काम कर रही है उन्हें अपना काम करने दिया जाए।

हालांकि उन्होंने यह भी कहा है कि उनके इस्तीफा देने से राजीव गांधी काफी दुखी थे। उनकी आंखों में यह साफतौर पर देखा जा सकता था। दरअसल, खान शाहबानो मामले में आए कोर्ट के निर्णय के समर्थक थे। उनका कहना था कि शाहबानो को कोर्ट के मुताबिक ही न्याय मिलना चाहिए। लेकिन उस वक्त बहुमत में आयी कांग्रेस की सरकार ने कोर्ट के निर्णय को ही नहीं बदला बल्कि कट्टरवादी सोच रखने वाले मुस्लिम समाज के सामने घुटने भी टेक दिए थे।

आरिफ खान हमेशा से ही मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को गलत बताते रहे हैं। वह इसको मुस्लिम महिलाओं के प्रति भेदभाव करने वाला बताता रहा है। उनका कहना था कि इस मसले में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने राजीव गांधी को मुस्लिम समाज के चक्कर में न आने की सलाह दी थी। इसके अलावा कुछ और भी थे जो नरसिंह राव की आवाज बोल रहे थे। हालांकि खान ने राजीव गांधी को बेहद अच्छा इंसान भी बताया है।

क्या था शाहबानो मामला

शाहबानो एक 62 वर्षीय मुसलमान महिला और पांच बच्चों की मां थी, जिन्हें 1975 में उनके पति ने तालाक दे दिया था। मुस्लिम पारिवारिक कानून के अनुसार पति पत्नी की मर्जी के खिलाफ ऐसा कर सकता है। अपनी और अपने बच्चों की जीविका का कोई साधन न होने के कारण शाह बानो पति से गुजारा लेने के लिये अदालत पहुचीं। उच्चतम न्यायालय ने अपराध दंड संहिता की धारा 125 के अंतर्गत निर्णय लिया जो हर किसी पर लागू होता है चाहे वो किसी भी धर्म, जाति या संप्रदाय का हो। न्यायालय ने निर्देश दिया कि शाह बानो को निर्वाह-व्यय के समान जीविका दी जाय।

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भारत के रूढ़िवादी मुसलमानों के अनुसार यह निर्णय उनकी संस्कृति और विधानों पर अनाधिकार हस्तक्षेप था। इससे उन्हें असुरक्षित अनुभव हुआ और उन्होंने इसका जमकर विरोध किया। कोर्ट के फैसले के खिलाफ कुछ लोगों ने मिलकर ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड नाम की एक संस्था बनाकर सभी प्रमुख शहरों में आंदोलन की धमकी दी।

आखिरकार 1986 में राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम धर्मगुरुओं के दबाव में आकर मुस्लिम महिला अधिनियम, 1986 पारित करा दिया। उनकी मांगें मानते हुए राजीव गांधी ने इसे धर्म-निरपेक्षता के उदाहरण के स्वरूप में प्रस्तुत किया। हालांकि बिल पारित होने के बाद हिंदूवादी संगठनों ने राजीव गांधी पर मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप लगाया था।

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कानून के वर्णित प्रयोजन के अनुसार जब एक मुसलमान तालाकशुदा महिला इद्दत के समय के बाद अपना गुजारा नहीं कर सकती है तो न्यायालय उन संबंधियों को उसे गुजारा देने का आदेश दे सकता है जो मुसलमान कानून के अनुसार उसकी संपत्ति के उत्तराधिकारी हैं। लेकिन अगर ऐसे संबंधी नहीं हैं अथवा वे गुज़ारा देने की हालत में नहीं हैं - तो न्यायालय प्रदेश वक्फ बोर्ड को गुज़ारा देने का आदेश देगा। इस प्रकार से पति के गुज़ारा देने का उत्तरदायित्व इद्दत के समय के लिये सीमित कर दिया गया।

Posted By: Kamal Verma

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