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    पत्नी के हाथ के छालों ने लोहा ढ़ालने वाले दिल को पिघलाया और जुगाड़ से बनाई यह मशीन

    By Dhyanendra SinghEdited By:
    Updated: Mon, 28 Sep 2020 07:29 PM (IST)

    पत्नी के हाथों में पड़े छालों ने शंकर को इस बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया और फिर हथौड़ी चलाने का समाधान निकालते हुए उन्होंने अपनी कार्यकुशलता के बल पर यह शानदार मशीन खुद ही तैयार की।

    शंकर ने जुगाड़ से हेमर मशीन बनाई है।

    कोरिया, जेएनएन। लोहे को गलाकर उसे कूट कर एक अलग शक्ल में ढालने की कला अपने आप में नायाब है। यह इंसानी सथ्यता की सबसे पुरातन कलाओं में से एक है। आज के दौर में यह कारीगरी और इससे जुड़े कारिगर अभावों का जीवन गुजार रहे हैं। जीतोड़ शारीरिक मेहनत और कम उसके अनुपात में कम आमदनी वाले इस कारोबार को कुछ लोग पुश्तैनी तौर पर आज भी विरासत के रूप में सम्हाले हुए हैं। उन्हीं में से एक हैं छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के पटना के रहने वाले शंकर विश्वकर्मा। शंकर के साथ उनकी पत्नी रीता भी इस काम में उनका हाथ बंटाती हैं। शंकर अपने हाथ से बनाई गई लोहे की एक सात फीट ऊंची मशीन की मदद से लोहे को पीटने का काम करते हैं। आम तौर लोहे को ढ़ालने की प्रक्रिया में दो लोगों की मूल रूप से जरूरत होती है। एक पिघलाने और दूसरा ढ़ालने का काम करता है। इस दौरान गर्म लोहे को हथौड़ी की मदद से कूटना पड़ता है। शंकर बताते हैं कि उनकी पत्नी ने उनकी मदद के लिए हथोड़ी चलाई, लेकिन उसके हाथों में छाले पड़ गए। पत्नी के हाथों में पड़े छालों ने शंकर को इस बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया और फिर हथौड़ी चलाने का समाधान निकालते हुए उन्होंने अपनी कार्यकुशलता के बल पर यह शानदार मशीन खुद ही तैयार की।

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    हैमर मशीन बनाने के बाद काम में आई तेजी

    बचपन से पुश्तैनी लुहारी का काम कर रहे पटना के शंकर विश्वकर्मा ने बताया कि वे पत्नी रीता के साथ मिलकर अपने पूर्वजों के इस कारोबार को आगे बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन पूंजी नहीं होने के कारण वह ढंग से दो टाईम का भोजन भी जुगाड़ नहीं कर पा रहे हैं। शंकर ने बताया कि मैं अपने तीनों बच्चों को अच्छी पढ़ाई कराना चाहता था मगर पैसा न होने के कारण उसके दो बेटे 12 वीं व 10 वीं तक ही पढ़ाई कर पाए। इसके बाद उन्हें काम में पिता का हाथ बंटाना पड़ रहा है। उनकी बेटी अभी कक्षा 11 वीं में पढ़ाई कर रही है। शंकर और उनकी पत्नी रीता कृषि संबंधी उपकरण जैसे फावड़ा, कोड़ी, कुदाल, हंसिया, नागर लोहा आदि का निर्मांण अपनी इस छोटी सी कर्मशाला में करते हैं जो कुछ बांस की खपच्चियों, बोर और तिरपाल से बनी है। हैमर मशीन बनने के बाद अब उनके काम में तेजी आई है।

    हथौड़ा चलाने का काम हुआ खत्म

    शंकर ने जुगाड़ से हेमर मशीन बना दी है जिसमें कबाड़ से गाड़ी का पट्टा, घिसा हुआ फटा टायर, निहाई, जुगाड़ का मुसरा व रेम लगाया गया है। इसमें 2 एचपी का एक पुराना मोटर लगा है, जो इस हैमर को चलाता है। जिससे अब हथौड़ा चलाने का काम खत्म हो गया है, शंकर का सपना है कि वह पैसा कमाकर अपने बच्चों को अच्छी पढ़ाई करा पाए और सीधे कंपनी से माल लाकर खुद बनाए और बेचे पर पूंजी के अभाव में कुछ कर नहीं पा रहा है। एक दो बार ऋण लेने के लिए बैंक का चक्कर काटा मगर उसको कुछ समझ में नहीं आया। अभी रोजाना सौ से दो सौ रुपये तक कमा पा रहे हैं। लोहा जिससे जैसे तैसे दाल रोटी चल रही है।