1000 पत्र लिखे तब मिली हिंदी के अंकों को किताबों में जगह, जानिए न्यायालय तक की पूरी लड़ाई
छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों की किताबों में लिखे जा रहे अंकों को देवनागरी लिपि में लिखवाने के लिए उन्होंने केंद्र और राज्य सरकार को एक हजार पत्र लिखे।
संदीप तिवारी, रायपुर। कलम बनी तलवार मेरी, मैं नहीं किसी से डरता हूं। परिणामों की परवाह नहीं, घर फूंक तमाशा करता हूं। अग्निपथ का पथिक मैं, पग अंगारे धरता हूं। देश, धर्म और समाज हित, कवि कर्म मैं करता हूं। यह कहना है छत्तीसगढ़ के जशपुर निवासी आयुर्वेद चिकित्सक डॉ. रविंद्र कुमार वर्मा का। वे दो दशक से हिंदी के सम्मान के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। उनके संघर्ष का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों की किताबों में लिखे जा रहे अंकों को देवनागरी लिपि में लिखवाने के लिए उन्होंने केंद्र और राज्य सरकार को एक हजार पत्र लिखे।
इसका नतीजा यह हुआ कि पहली से पांचवीं कक्षा तक की प्रारंभिक शिक्षा में पिछले सत्र से देवनागरी लिपि में अंकों को छापा जा रहा दी। सरकार ने डॉ. वर्मा को पत्र लिखकर इसकी सूचना भी दी। 1994 में किताबों से हिंदी के अंक गायब कर दिए गए थे।
डॉ.वर्मा बताते है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब पहली बार प्रधानमंत्री बने थे तो उन्होंने पत्र लिखकर नोटों पर देवनागरी लिपि का इस्तेमाल करने की मांग की थी। नोटबंदी के बाद जो नए रुपये आए, इनमें हिंदी के अंक तो इस्तेमाल हुए, लेकिन अभी तक हिंदी के अंकों में क्रमांक नहीं आए हैं। पत्र का जवाब मिला था कि मामला अभी प्रक्रिया में है।
संयुक्त राष्ट्र तक पहुंचा रहे आवाज
उन्होंने भारत सरकार के माध्यम से पत्र लिखकर संयुक्त राष्ट्र में भी हिंदी लिपि और अंकों को आधिकारिक भाषा घोषित करने की मांग की है। विदेश मंत्रालय की ओर से डॉ.वर्मा को जवाब मिला है कि हिंदी के अंकों को बचाने की उनकी पहल की भारत सरकार कद्र करती है। न्यायालय का खटखटाया दरवाजा डॉ.वर्मा ने छत्तीसगढ़ में 40 हिंदी माध्यम के विद्यालयों को उत्कृष्ट अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों में परिवर्तित करने का विरोध किया है। इसके लिए उन्होंने न्यायालय में जनहित याचिका दायर की है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में हिंदी के अंकों को पढ़ाने और अंग्रेजी माध्यम में हो रहे बदलाव को लेकर उनकी एक जनहित याचिका पहले से ही न्यायालय में लंबित है।
ऐसे की शुरआत
डॉ. वर्मा बताते हैं कि एक हिंदी पत्रिका जो कि 1947 से दिल्ली से प्रकाशित हो रही थी, उसे वे लगातार पढ़ रहे थे। साल 2000 में पत्रिका ने देवनागरी अंकों की बजाय अरेबियन अंक प्रकाशित करना शुरू कर दिया। उन्हें बुरा लगा और तभी उन्होंने अंक भारती संस्था खोली। अंक भारती के नाम से एक पत्रिका का प्रकाशन भी किया। इसमें हिंदी के देवनागरी अंकों का ही इस्तेमाल किया जा रहा है।
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