नई दिल्ली, फीचर डेस्क। स्वाधीनता के बाद देश को विज्ञान व तकनीक के क्षेत्र में स्वावलंबन की राह पर आगे बढ़ाने के लिए कंप्यूटर का निर्माण भी बेहद जरूरी था। जब भारत में एशिया के पहले परमाणु रिएक्टर ‘अप्सरा’ का निर्माण महान विज्ञानी डा. होमी जहांगीर भाभा के नेतृत्व में किया जा रहा था, उसी दौरान उनके नेतृत्व में ही एक अन्य टीम कंप्यूटर बनाने की तैयारी भी कर रही थी। डा. भाभा के नेतृत्व में वर्ष 1955 में पायलट मशीन का डिजाइन तैयार किया गया, लेकिन फुल स्केल वर्जन का कार्य 1959 में पूरा हुआ। इसे औपचारिक रूप से फरवरी 1960 में चालू किया गया। तब एशिया में जापान के बाद भारत दूसरा ऐसा देश था, जिसने स्वदेशी डिजिटल कंप्यूटर तैयार करने में कामयाबी हासिल की थी...

नई दिल्ली, फीचर डेस्क। वर्षों से कंप्यूटर न केवल आम भारतीयों के जीवन में, बल्कि उनके काम में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आए हैं। पिछले कुछ दशकों में विशेष रूप से भारत में कंप्यूटर प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तेजी से प्रगति हुई है। कई भारतीयों के लिए यह 1991 में सरकार द्वारा शुरू किए गए एलपीजी (उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण) सुधारों के बाद का एक स्वागत योग्य परिणाम है, लेकिन वास्तव में यह कहानी काफी पहले शुरू हो चुकी थी। सांख्यिकीविद प्रशांत चंद्र महालनोबिस को अकाल के बाद बंगाल में धान की फसल का अनुमान लगाने के लिए कहा गया था। उसी दौरान उन्होंने कंप्यूटिंग मशीनों की जरूरत महसूस की और उसे स्वदेशी तरीके से विकसित करने का फैसला किया। इस विचार के साथ उन्होंने 1932 में कलकत्ता (अब कोलकाता) में भारतीय सांख्यिकी संस्थान (आइएसआइ) की स्थापना की और पहली बार वहां मैकेनिकल डेस्क कैलकुलेटर की शुरुआत की।

स्वाधीनता के बाद अवसर: स्वतंत्रता मिलने के बाद ही उन्हें सही मायने में स्वदेशी कंप्यूटर विकसित करने की दिशा में काम करने का अवसर मिला। तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने इस परियोजना की अगुवाई करने की जिम्मेदारी अपने दो सबसे भरोसेमंद सहयोगियों डा. महालनोबिस और डा. होमी जहांगीर भाभा को दी। एनालाग कंप्यूटर विकसित करने के लिए महालनोबिस ने इलेक्ट्रानिक कंप्यूटर लैब की स्थापना की। इसके लिए उन्होंने दो प्रतिभाशाली स्नातकों- समरेंद्र कुमार मित्रा और सौमेंद्र मोहन बोस को नियुक्त किया।

यह कार्य आज आसान लग सकता है, लेकिन उस समय यह कतई आसान नहीं था। भारत में स्वदेशी तौर पर निर्मित कंप्यूटर कंपोनेट्स के अभाव और कंपोनेंट के आयात के लिए विदेशी मुद्रा की कमी के कारण कंप्यूटरों के लिए विभिन्न पुर्जों को खरीदना लगभग असंभव था। ऐसे में कंप्यूटर तैयार करने के लिए इस जोड़ी ने कबाड़खानों और युद्ध अधिशेष डिपो को खंगाला। फिर उन्होंने अपनी कार्यशाला में कंप्यूटर के लिए जरूरी कंपोनेंट्स तैयार किए। उनके अथक प्रयासों का फल तब मिला, जब भारत को आखिरकार 1953 में अपना पहला स्वदेशी एनालाग कंप्यूटर मिला।

डिजिटल कंप्यूटर ने वर्ष 1964 तक किया कार्य : वैज्ञानिक गणना के लिए विकसित पहली पीढ़ी का मेन-फ्रेम कंप्यूटर 22 फरवरी, 1960 को टाटा इंस्टीट्यूट आफ फंडामेंटल रिसर्च, मुंबई में स्थापित किया गया था। इसके कमांड 1 और 0 की सीरीज में लिखे गए थे। इसे तैयार करने के लिए तब सात लाख रुपये मंजूर किए गए थे। यह 1964 के मध्य तक चालू रहा। इससे भारत में कंप्यूटर उद्योग की स्थापना के लिए ढांचागत जरूरतों को समझने में मदद मिली।

महालनोबिस और भाभा की उत्साहपूर्ण पहल: इसके बाद स्वदेशी रूप से विकसित देश का पहला डिजिटल कंप्यूटर बनाने की पहल शुरू की गई। महालनोबिस के मार्गदर्शन में आइएसआइ ने इस दिशा में काम करने के लिए जादवपुर विश्वविद्यालय का सहयोग लिया। उसी दौरान डा. भाभा ने भी टाटा इंस्टीट्यूट आफ फंडामेंटल रिसर्च में डिजिटल कंप्यूटर के कार्य को आगे बढ़ाना शुरू किया। भाभा की टीम ने भी वर्ष 1955 में डिजिटल कंप्यूटर तैयार करने के लिए पायलट मशीन का डिजाइन तैयार कर लिया था। इसका फुल स्केल वर्जन 1959 में तैयार कर लिया गया। डिजिटल कंप्यूटर मशीन को औपचारिक रूप से फरवरी 1960 में चालू किया गया था। इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने 1962 में इसका नाम टीआइएफआरएसी (टाटा इंस्टीट्यूट आफ फंडामेंटल रिसर्च आटोमैटिक कैलकुलेटर) रखा। यह भारत का पहला स्वदेशी डिजिटल कंप्यूटर था।

Edited By: Sanjay Pokhriyal