नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। बरसात के मौसम में वातावरण काफी सुहावना हो जाता है। प्रत्येक प्राणी का मन प्रफुल्लित हो उठता है। प्रकृति के देवता शिव को सावन मास अति प्रिय है, इसलिए इस मास में श्रद्धालु विशेष रूप से जलाभिषेक व अर्चना के जरिए उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं... ग्रीष्म ऋतु की तपिश और अकुलाहट के बाद मेघों से आबाद आसमान और धरती पर उमड़ती बरखा बहार जीव-जगत को प्रकृति का अनुपम उपहार है। वन-उपवन में हरियाली, फूल-फल से लदी पेड़-पौधों की डालियां, कोयल की कूक, नदी- तालाब और झरनों का कल-कल निनाद...। यह धरती के सोलह शृंगार का आभास कराता है। वास्तव में श्रावण मास आशाओं-इच्छाओं की पूर्ति का मास है।

ग्रीष्म के थपेड़े सहती प्रकृति जिस प्रकार सावन की बौछारों से अपनी प्यास बुझाती हुई असीम तृप्ति का आनंद पाती है, उसी प्रकार सावन मास प्राणियों के मन का सूनापन दूर करता है। संपूर्ण दृश्यावली मानव मन में उमंग का संचार करने के साथ-साथ प्रफुल्लित करते हुए जीवन का गीत भी सुनाती है। इसमें कवि मन गुनगुनाता है। किसान खेती में जुट जाता है और युवा नूतन कल्पनाओं में खो जाता है। इस नजारे को लेकर सभी की अपनी-अपनी सोच या धारणा हो सकती है, लेकिन इसमें कोई विभेद नहीं कि यह शिवकृपा से ही संभव हो पाता है।

वस्तुत: भगवान शिव प्रकृति के देवता हैं, इसलिए इसका असर प्रकृति पर भी दिखता है। ध्यान-साधना में उनका यही रूप निखर कर सामने आता है, जिसमें साधक उन्हें हिमालयवासी, सिर पर चंद्रमा, जटा में गंगधार, गले में सर्पमाल, तन पर मृगछाल, नख-शिख श्वेत धवल भभूत, नंदी की सवारी और चारों ओर भूत-पिशाच गणादि के साथ पाता है। तभी तो समस्त सृष्टि में विस्तारित भक्त मंडल उन्हें देवाधिदेव महादेव बनाते हैं।

धर्मशास्त्र भी विभिन्न आख्यानों से इसकी गवाही देते हैं, जिनमें उल्लेख है कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) पर जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि क्षीर सागर में चार मास (चातुर्मास) की योग निद्रा पर जाते हैं। अन्य सभी देवता भी सुविधानुसार शयन पर जाते हैं।

ऐसे समय में नेतृत्व संभालते हुए माता पार्वती संग भगवान शिव जीव जगत के पालनार्थ व लोककल्याणार्थ मृत्युलोक में आते हैं। मान्यता है कि इस अवधि में देवाधिदेव शिव ही एकमात्र ऐसे देवता हैं, जो जाग्रत अवस्था में रहते हैं। इससे भक्ति और मनोकामना पूर्ति का अनूठा संयोग बनता है। भोलेनाथ मूलत: दानी हैं और मानवजाति की अतृप्त इच्छाओं की पूर्ति करते हैं। अपने भक्तों के बीच आने का माह बाबा को प्रिय है, तो भगवती पार्वती के लिए भी मनभावन है।

वैसे भी सावन मास की उत्पत्ति श्रवण नक्षत्र से हुई है। इसका स्वामी चंद्र को माना गया है, जो भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान हैं। श्रवण नक्षत्र जल का कारक माना गया है और इस नाते भी यह भगवान शिव को अति प्रिय है। श्रावण माहात्म्य में उल्लेख है कि योगाग्नि में स्वयं को भस्म कर शरीर त्यागने से पूर्व सती ने भगवान शिव को हर जन्म में पति के रूप में पाने का संकल्प व प्रण लिया था। अपने दूसरे जन्म में देवी सती हिमालय और देवी मैना के घर में पार्वती के रूप में जन्म लेती हैं, तो युवावस्था में ही निराहार रहकर कठोर तप और साधना कर भगवान शिव को प्रसन्न करती हैं।

वह माह सावन ही था, जिसमें पार्वती भगवान शिव को प्रसन्न कर उनसे विवाह करती हैं। ऐसे में इस माह को विशेष रूप से भक्तों के लिए फलदायी माना जाने लगा। शास्त्रों-पुराणों पर गौर करें, तो भगवान शिव नारी सशक्तीकरण के प्रेरक-देव नजर आएंगे। सती के योगशक्ति से भस्म होने के बाद उनका रौद्र रूप इसका गवाह है, तो उनकी अद्र्धनारीश्वर छवि इसकी प्रतीक है। कुंवारी कन्याएं पूरे सावन माह हर सोमवार को शिव के समान स्त्री का सम्मान करने वाले पति की कामना से व्रत और जलाभिषेक करती हैं। जलाभिषेक के बारे में पौराणिक कथा है कि समुद्र मंथन के दौरान भगवान शिव ने जगत कल्याण के लिए समुद्र से अमृत के साथ निकले विष का पान कर लिया था।

इससे उनका कंठ नीला पड़ गया और उनका नाम नीलकंठ हुआ। ऐसा माना जाता है जिस माह में महादेव ने विषपान किया था, वह सावन माह ही था। विषपान से भगवान शिव के तन का ताप बढ़ने लगा, जिसे शांत करने के लिए देवों ने शीतलता प्रदान की, लेकिन इससे भी शिव की तपन शांत नहीं हुई। स्वयं आशुतोष भगवान शिव ने शीतलता पाने के लिए चंद्रमा को अपने सिर पर धारण किया, जिससे उन्हें शीतलता मिली।

वहीं देवराज इंद्र ने आदिदेव के ताप को शांत करने के लिए घनघोर वर्षा की, जिससे भगवान शिव को शांति और शीतलता मिल सके। इसी घटना के बाद से सावन के महीने में शिव जी को प्रसन्न व शीतलता प्रदान करने के लिए जलाभिषेक किया जाता है। इसीलिए काशी समेत देश के सभी ज्योतिर्लिंगों में सावनपर्यंत भक्तगण जलाभिषेक करते हैं। इस माह में प्रकृति भी विष की उष्णता शांत करने के लिए जलाभिषेक करती है।

अलग-अलग तीर्थों में विभिन्न जल धाराओं का महत्व होने के कारण शिवजी की प्रसन्नता के लिए कालांतर में कांवड़ यात्राओं का प्रचलन हुआ। इस पौराणिक व सामाजिक विधान के आरंभ को लेकर मतांतर भी हैं। मान्यता है कि इसकी शुरुआत शिवभक्त रावण ने की। कुछ लोग इसका आरंभ श्रवण कुमार से तो कई परशुराम से भी मानते हैं।

कहा जाता है परशुराम ने कांवड़ में गढ़ मुक्तेश्वर (ब्रज घाट) से जल लाकर बागपत (उत्तर प्रदेश) के पास स्थित पुरा महादेव में प्राचीन शिवलिंग का जलाभिषेक किया था। आज भी लोग मनोकामना पूर्ति के लिए उस परंपरा का पालन करते हैं। उत्तर भारत के गंगातटीय शहरों में कांवड़ का विशेष महत्व है। इनका मुकाम बैजनाथ धाम हुआ करता है। पूर्व में कांवड़ यात्री गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ से जल लाते थे और प्रसाद के साथ जल देते थे।

अब श्रद्धालु गंगाजी या मुख्य तीर्थों के पास प्रवाहमान जलधारा से जल लेकर सावन में जलाभिषेक विधान पूरे करते हैं और चारों दिशाएं ‘हर हर बम बम’ व ‘हर हर महादेव’ के उद्घोष से गूंज उठती हैं। बाबा भोलेनाथ को औघड़दानी भी कहा जाता है। इसके पीछे मान्यता है कि वे सिर्फ एक लोटा पानी और बेलपत्र से ही प्रसन्न हो जाते हैं और भावों में बहते हुए भक्तों को हर कामना पूरी होने का वरदान दे जाते हैं। उन्हें भांग-धतूरा भी प्रिय है।

दरअसल, यह उनका प्रकृति प्रेम के साथ ही समभाव का संदेश भी है, जो वह संपूर्ण जीव जगत के प्रति दिखाते हैं और उपेक्षितों के प्रति भी सम्मान रखने का भाव जगाते हैं। ऐसे में भक्तगण उनके पूजन-अनुष्ठान विधान में इसका उपयोग करते हैं। कालांतर में अभिषेक के लिए भावना के अनुसार दूध, तेल, पंचगव्य, शहद आदि को शामिल किया गया। इस माह में शिवालयों व घरों में षोडशोपचार, लघुरुद्र, महारुद्र या अतिरुद्र पाठ, सावन माहात्म्य व शिवमहापुराण श्रवण का भी विधान है।  

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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