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    VP Menon Birthday: सरदार पटेल ही नहीं... इस शख्सियत ने भी देश की अखंडता को एक रखने में निभाई थी बड़ी भूमिका

    By Prince SharmaEdited By: Prince Sharma
    Updated: Sat, 30 Sep 2023 07:38 AM (IST)

    VP Menon Birthday मेनन ने 13 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़ उन कंधों को सहारा देने का निर्णय लिया. मजदूरी की और कोयला खद्दानों में भी काम किया. और फिर अपने  कठिन भरे जीवन को बेहतर मोड़ देने के लिए तंबाकू की फैकट्री में काम करने के साथ-साथ टाइपिंग सीखी और एक दिन होम डिपार्टमेंट में क्लर्क सह-टाइपिस्ट की जॉब में भर्ती हो गए…

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    VP Menon Birthday: सरदार पटेल ही नहीं... इस शख्सियत ने भी देश की अखंडता को एक रखने में निभाई थी बड़ी भूमिका

    नई दिल्ली, ऑनलाइन डेस्क। देश 565 टुकड़ों में बंट चुका होता अगर सरदार पटेल नहीं होते लेकिन इस समर्थन और सहयोग में एक शख्स का नाम और शामिल है जिनकी ज़रूरत, योगदान और सहयोग को दरकिनार नहीं किया जा सकता. मैं बात कर रहा हूं ब्रिटिश शासन में सीविल सेवक रहें वी.पी. मेनन की. जब भी देश की अखंडता और एकता की बात होगी तब सरदार पटेल के संग एक नाम खुद-ब-खुद जुड़ना चाहिए- वी पी मेनन (V.P. MENON)

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    वप्पला पांगुन्नी मेनन का जन्म केरल के पलक्कड़ जिले में साल 1893 की तारीख 30 सितंबर को हुआ. एक शख्सियत जो यूं तो सरकारी दरवाजे पर एक मामूली क्लर्क तक सीमित थी. लेकिन बुद्धि इतनी तीक्ष्ण थी कि उनके द्वारा सुझाई गईं रणनीतियां हमेशा अव्वल दर्जे की होतीं।

    यही कारण था कि उन्होंने सीधा क्लर्क से ब्रिटिश भारत के प्रशासन में एक अधिकारी की जगह बना ली थी जो बाद में वायसरायों और कद्दावर राजनीतिज्ञों के विश्वासपात्रों में गिने जाने लगे थे। पिता पेशे से एक स्कूल के हेडमास्टर थे और 12 भाई- बहनों में सबसे बड़े थे.

    कोयला खद्दानों में भी किया काम

    आर्थिक स्थिति केवल एक ही कंधे पर टिकी थी सो मेनन ने 13 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़ उन कंधों को सहारा देने का निर्णय लिया। मजदूरी की और कोयला खद्दानों में भी काम किया. और फिर अपने कठिन भरे जीवन को बेहतर मोड़ देने के लिए तंबाकू की फैकट्री में काम करने के साथ-साथ टाइपिंग सीखी और एक दिन होम डिपार्टमेंट में क्लर्क सह-टाइपिस्ट की जॉब में भर्ती हो गए और फिर यहीं से उनका राजनीतिक सफर शुरू हो जाता है...

    रजवाड़ों को मिलाने में भूमिका....

    जब देश आजाद हुआ तो देश के भीतर मौजूद 565 रियासतें भी आजाद हुई। ब्रिटिशर्स ने उन्हें यह आजादी दी हुई थी कि वे या तो भारत और पाकिस्तान में शामिल हो जाएं या खुद स्वतंत्र रह लें फैसला उनके ऊपर था। लिहाजा अधिकतर रियासतों ने अकेले और स्वतंत्र रहने का निर्णय लिया।

    रजवाड़ों को एकता के सूत्र में बांधा

    लेकिन देश के लिए यह एक गंभीर मुद्दा था क्योंकि वह अगर स्वतंत्र रहने का का ऐलान करते तो देश कईं टुकड़ों मे विभाजित हो जाता और जिस भारत का मानचित्र आज हम देख रहें हैं वह फिर कुछ और ही होता. महात्मा गांधी सरदार पटेल पर बहुत विश्वास करते थे और उन्हें पूरा भरोसा था कि यही वह शख्सियत है जो बिखरे रजवाड़ों को एकता के सूत्र में बांध सकता है।

    सरकार वल्लभभाई पटेल गांधी जी के शब्दों पर खरे उतरें और उन्होंने देसी रियासतों को एकजुट कर अखंड भारत की मिसाल पेश की. लेकिन एक ऐसे शख्स के जरिये जो दक्षिण भारत से ताल्लुक़ात रखता था और रियासतों के महाराजाओं को

    इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन-(विलय का सहमति पत्र) पर हस्ताक्षर कराने की तकनीक जानता था. उस समय उन रियासतों से भी बात करना जोखिम भरा था. जोधपुर के राजा ने तो मेनन पर बंदूक तक तान दी थी. यही नहीं जब कश्मीर के राजा हरि सिंह ने भारत में विलय होने से इनकार कर दिया तो वह मेनन ही थे जिन्होंने जैसे-तैसे कश्मीर के राजा को भारत में शामिल होने के लिए हस्ताक्षर कराए.

    कबाइलियों ने कश्मीर पर किया तो भेजी सेना

    जब पाकिस्तानी कबाइलियों ने कश्मीर पर हमला किया तो मेनन ने कश्मीर में भारतीय सेना भिजवाने से पहले राजा से इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन पर हस्ताक्षर कराए. तभी भारतीय सेना कश्मीर की मदद करने के लिए राजी हुई. हालांकि इसके बाद कश्मीर का भाग्य जनमत संग्रह पर टिका था. पर वह तत्कालीन हालात को देखते हुए हो न सका. लेकिन अगर मेनन कश्मीर में भारतीय सेना भेजने के लिए त्वरित दिल्ली सूचना नहीं देते तो आज भारत का नक्शा कुछ अलग होता.

    ‘माउंटबेटन प्लान’ में बड़ी भूमिका...

    माउंटबेटन प्लान के अंतर्गत ही देश को दो टुकड़ों में बांटा गया था. जब जिन्ना पाकिस्तान मांगने पर अड़ गए तो तब बंटवारा ही एक रास्ता बचा था और वीपी मेनन ने भी इस योजना को हरी झंडी दिखाई. इतिहासकारों की माने तो वीपी मेनन की संविधान, राज्य और संप्रभुता जैसे मुद्दों पर अच्छी खासी पकड़ थी और इसलिए ब्रिटिश अफ़सर विशेष रूप से इस योजना को लेकर उनके सुझावों को काफी तवज्जो दे रहे थे.

    मेनन को याद करते हुए ‘माउंटबेटन एंड पार्टिशन ऑफ इंडिया’ में लार्ड माउंटबेटन ने बताया कि बतौर भारतीय वायसराय वे अपने क़रीबी स्टाफ से मिले जिनमें मेनन मुख्य थे. तब उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि मेनन एक वरिष्ठ अधिकारी हैं और वे काफी सूझ-बूझ और सोच समझ कर फैसले लेते हैं.

    जब माउंटबेटन मेनन से मिले तो उन्हें यकीन हो गया कि मेनन ही वे अधिकारी हैं जिनकी काबिलियत से भारत को विभाजित किया जा सकता है. इसके बाद तो माउंटबेटन हर कदम मेनन से पूछ कर रख रहे थे. साल 1946 में वायसराय ने उनकी दक्षता को मद्देनजर रखते हुए उन्हें पॉलिटिकल रिफॉर्म्स कमिशनर तक के पद पर नियुक्त कर दिया था.

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    वीपी मेनन वायसराय लिनलिंथगॉ के भी चहेते और विश्वासपात्र थे. लिनलिंथगॉ भारत के सबसे लंबे समय तक वायसराय रहे उन्हें वीपी मेनन पर इतना भरोसा था कि वह खुफिया सूचानाओं का जिक्र भी उनसे कर देते थे. उनकी आधिकारिक यात्रा से लेकर इंग्लैंड में गोलमेज कॉनफ्रेंस टेबल तक मेनन की मौजूदगी हुआ करती थी.

    सरदार पटेल और वी.पी. मेनन...

    सरदार पटेल और वी.पी. मेनन के विचार एक-दूसरे से बेहद मेल खाते थे. और यही कारण था कि पटेल मेनन पर आंख मूंदे विश्वास करते थे. कभी-कभार अफसरों के निर्देशों को नजरअंदाज कर मेनन कोई उचित कदम उठाते तो सरदार पटेल उनका पूराा समर्थन करते. वहीं नेहरू समेत कईं बड़ें नेता अंग्रेजी नौकरीशाही पर ज्यादा विश्वास नहीं करते थे लेकिन मेनन के साथ ऐसा नहीं था. पटेल और मेनन ही थे जिन्होंने देसी रियासतों को एकजुट करने में एक साथ बड़ी भूमिका अदा की और उन्हें मनवाने के हर पहलू पर विचार किया ताकि देश का नक्शा टुकड़ों में विभाजित न हो. उन्होंने नेहरू और पटेल के संग मिल सन् 1947 के पाक युद्ध में कबाइलियों से निपटने के लिए योजना बनाने में भी साथ दिया था.

    72 वर्ष की उम्र में ली अंतिम सांस

    आजादी के बाद वी.पी. मेनन उड़िसा राज्य के राज्यपाल रहे और इसी तरह से वी.पी मेनन नाम धीरे-धीरे कुहासे में वस्तु की तरह छिपता चला गया. साल 1966 में स्वतंत्र पार्टी की स्थापना में भूमिका अदा करने के बाद उसी साल की 31 दिसंबर को 72 साल की उम्र में वीपी मेनन ने बेंगलुरु में अपनी अंतिम सांस ली. यह थोड़ी हैरत भरी बात है कि देश हित में इतनी अग्रणी और बड़ी भूमिका अदा करने वाले का नाम आज इतिहास में ही कहीं गुम हो गया है.

    किताबें

    • द स्टोरी ऑफ दी इन्टीग्रेशन ऑफ दी इंडियन स्टेट्स्-1956।
    • द ट्रांसफर ऑफ पॉवर इन इंडिया-1957।

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