डॉ. अश्विनी महाजन। अर्थशास्त्री वर्ष 2018 के प्रारंभ से अब तक भारतीय रुपया 20 प्रतिशत से अधिक गिर कर बीते सप्ताह तक वह 74.72 रुपये प्रति डॉलर तक पहुंच गया था। उधर पेट्रोल डीजल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। देश का चालू खाते पर विदेशी भुगतान घाटा जो वर्ष 2017-18 में जीडीपी के 1.9 प्रतिशत ही था, चालू वित्तीय वर्ष में 2.6 प्रतिशत तक भी पहुंच सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि भारत पुन: एक बार आर्थिक संकट में घिर गया है। लेकिन ऐसी परिस्थितियां भारत के लिए कोई नई बात नहीं है। वर्ष 2011-12 और 2012-13 में चालू खाते पर विदेशी भुगतान घाटा जीडीपी के चार प्रतिशत से भी ज्यादा हो गया था। पेट्रोल डीजल की कीमतें भी काफी ऊंची थी और रुपया भी इस दौरान कमजोर हो रहा था।

जीडीपी ग्रोथ
अब सवाल यह उठता है कि क्या भारत पुन: उसी प्रकार के संकट में आ पहुंचा है, जैसे वह 2012-13 में पहुंच गया था। उस समय की आर्थिक परिस्थितियां वास्तव में गंभीर थीं। आज की परिस्थिति अलग है। पिछले एक दशक में लगभग आठ प्रतिशत औसत जीडीपी ग्रोथ के मुकाबले 2011-12 और 2012-13 में जीडीपी की वृद्धि दर क्रमश: 6.2 और 4.2 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। जबकि वर्ष 2017-18 में जीडीपी वृद्धि दर 7.3 प्रतिशत रही और 2018-19 के लिए इसके 7.8 प्रतिशत तक पहुंचने की आशा है, ऐसा अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां बता रही हैं। यही नहीं 2012 और 2013 में महंगाई दर दो अंकों में पहुंच गई थी, जो आज 3.5 प्रतिशत के आसपास है। कहा जा सकता है कि भारतीय रुपये पर संकट बरकरार है और पेट्रोल डीजल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, फिर भी भारतीय अर्थव्यवस्था एक मजबूत मुकाम पर है।

औद्योगिक और कृषि विकास
पिछले तीन-चार वर्षो में जीडीपी की वृद्धि दर ही नहीं बढ़ी है, बल्कि हर क्षेत्र में प्रगति स्पष्ट दिख रही है। वर्ष 2012-13 में औद्योगिक उत्पादन का सूचकांक 1.1 प्रतिशत बढ़ा, जबकि 2013-14 में वह 0.1 प्रतिशत घट गया। लेकिन उसके बाद उसमें लगातार वृद्धि का रुख दिखाई दे रहा है और ताजा आंकड़ों के अनुसार अगस्त 2017 और अगस्त 2018 के बीच यह 5.2 प्रतिशत बढ़ा। कृषि में भी प्रगति दिख रही है। दालों और तिलहनों के उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। शेष कृषि उत्पाद जैसे कपास, गन्ना आदि का भी उत्पादन अभूतपूर्व रूप से बढ़ा है। इसका परिणाम है कि खाद्य मुद्रा स्फीति जो नवंबर 2013 में 14.7 फीसदी तक पहुंच गई थी, वह जून 2017 तक माइनस 2.12 प्रतिशत आ गई, यानी कीमतें घटने लगी। अभी भी खाद्य मुद्रा स्फीति तीन से चार फीसद के बीच बनी हुई है। आंकड़े दिखाते हैं कि पेट्रोल डीजल की कीमतें बेशक बढ़ रही हैं, लेकिन दाल, अनाज, तेल आदि की कीमतें नियंत्रण में हैं।

राजकोषीय संतुलन
महंगाई में कमी केवल औद्योगिक व कृषि उत्पादन बढ़ने से ही नहीं, बल्कि राजकोषीय संतुलन से भी संभव हुई है। वर्ष 2011-12 में राजकोषीय घाटा जीडीपी के 5.7 प्रतिशत के बराबर था। उसके मुकाबले 2017-18 में राजकोषीय घाटा जीडीपी के मात्र 3.5 प्रतिशत तक पहुंच गया है। एक तरफ तेजी से बढ़ती जीडीपी और दूसरी तरफ राजकोषीय घाटे में आ रही कमी ने मांग और पूर्ति में एक बेहतर संतुलन स्थापित किया है जिससे पेट्रोल डीजल में महंगाई के बावजूद शेष मंहगाई थमी हुई है। अर्थव्यवस्था में संकट तब माना जाता है जब देश में बिजनेस के लिए अनुकूल माहौल नहीं होता, उत्पादन व आमदनी में ठहराव आ जाता है, महंगाई बढ़ती है या विदेशी भुगतान में संकट होता है। दुनिया के कई मुल्क इस समय विदेशी कर्ज के संकट में हैं, पर भारत का विदेशी मुद्रा भंडार पिछले चार सालों में 25 फीसद तक बढ़ चुका है। औद्योगिक उत्पादन बढ़ रहा है, खाद्यान्न भंडार भरे हुए हैं और देश भारी मात्र में कृषि वस्तुओं का निर्यात भी कर रहा है।

संकट जैसे कोई हालात नहीं
सरकार का बजट पूरी तरह से नियंत्रण में है और प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष कर समेत केंद्र व राज्य सरकारों का राजस्व बढ़ रहा है। हालांकि पिछले कुछ समय से अंतरराष्ट्रीय कारणों से देश में डॉलर की मांग बढ़ने से रुपये पर दबाव आ रहा है, लेकिन इसमें संकट जैसे कोई हालात नहीं। डॉलर की मांग बढ़ने के दो कारण दिखाई देते हैं। पहला तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृद्धि होना। दूसरा अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दर में वृद्धि करने के कारण विदेशी संस्थागत निवेशक अपना पैसा भारतीय बाजारों से निकालकर ले जा रहे हैं। यही नहीं ट्रंप सरकार ने आय और कंपनी आय कर दोनों बहुत कम कर दिए हैं। इस कारण से भी कुछ निवेशक अमेरिका में निवेश कर रहे हैं। लेकिन इन कारणों का असर बहुत लंबे समय तक रहने वाला नहीं है। बीते 10 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल के वायदा बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई और ऐसा लगता है कि अब तेल की कीमतें गिरावट का रुख लेंगी।

कैसे सुधरेंगे हालात
चूंकि यह संकट अल्पकालिक है इसलिए नीति नियंताओं को धैर्य से काम करना होगा। रुपये में गिरावट रोकने के लिए रिजर्व बैंक विदेशी विनिमय बाजार में हस्तक्षेप करे यह उचित नीति होगी। यही नहीं विदेशी व्यापार घाटे को भी जल्द पाटने की जरूरत है, उसके लिए गैरजरूरी वस्तुओं के आयातों को टैरिफ बढ़ाकर थामा जा सकता है। अन्य देश जो भारत में बाजार पर कब्जा जमाने के लिए अपना माल यहां डंप कर रहे हैं, उनके खिलाफ एंटी डंपिंग ड्यूटी लगाना भी उचित हो सकता है। विदेशी संस्थागत निवेशकों को भी अनुशासित करने की जरूरत है। उनके निवेशों पर ‘लॉक इन पीरियड’ लगाना और उनके द्वारा रकम को देश से ले जाने से रोकने के लिए ‘टोबिन टैक्स’ लगाना भी सही नीति होगी।

कर की व्यवस्था
कई देशों में इस प्रकार के कर की व्यवस्था है, जिसके अनुसार विदेशी निवेशकों पर तब लगाया जाता है, जब वह अपना निवेश बाहर ले जाने के लिए देश की करेंसी को डॉलर में परिवर्तित करते हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था जिसमें सभी क्षेत्रों में जीडीपी बढ़ रही है और सभी आर्थिक संकेतक सही दिशा में हैं, डॉलर की मांग में अल्पकालिक वृद्धि किसी बड़े संकट का संकेत नहीं देती, लेकिन परिस्थितियों का बेहतर ढंग से प्रबंधन भी जरूरी है।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर हैं)

Posted By: Kamal Verma

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