डा. विकास सिंह। दीपावली समृद्धि का पर्व है। इस मौके पर हमें राष्ट्र के रूप में सभी नागरिकों की समृद्धि पर विचार करना चाहिए। राष्ट्र तभी समृद्ध कहा जा सकता है, जब अंतिम छोर पर खड़ा व्यक्ति भी उस समृद्धि को अनुभव कर सके। भारतीय अर्थव्यवस्था को मोटे तौर पर अभावों का पिरामिड कहा जाता रहा है। यहां कुछ लोगों के पास सब कुछ है और अन्य के पास कुछ भी नहीं। अब धीरे-धीरे इस व्यवस्था में बदलाव हो रहा है। हम समावेशी विकास की ओर बढ़ रहे हैं। इस क्रम में यह भी जरूरी है कि व्यापक समृद्धि के लिए अगले 10 साल हम 10 प्रतिशत या इससे ज्यादा की विकास दर कायम रखें। इस विकास के दम पर ही हम उस पिरामिड को समतल कर सकेंगे और सब तक समृद्धि पहुंचा पाऐंगे। इसके लिए विकास के माडल में कई आमूलचूल बदलाव भी करने होंगे।

हमें मजबूत और संरचनात्मक सुधारों की जरूरत है। विकास दर को बढ़ाने के लिए कई तरह के अन्य कदम भी उठाने होंगे। हमारे यहां प्रशासनिक एवं न्यायिक स्तर पर भी सुधार की दरकार है। विकास में इनकी भूमिका भी अहम है। भारत के पास निवेश की ऐसी कई संभावनाएं हैं, जिनसे विकास को गति मिल सकती है। यहां की अर्थव्यवस्था उपभोग आधारित है। हमें कर घटाने होंगे और लोगों की जेब में खर्च के लिए ज्यादा पैसा छोड़ना होगा। इससे मांग में 20 प्रतिशत तक की अतिरिक्त बढ़त देखी जा सकती है, जो अंतत: विकास की वाहक बनेगी। करीब 50 एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग) 65 प्रतिशत अर्थव्यवस्था को चलाते हैं और 80 प्रतिशत श्रम को रोजगार दिया हुआ है। मांग बढ़ने से एमएसएमई को लाभ होता है। ऐसे में विकास के पथ पर बढ़ने और रोजगार सृजन के लिए एमएसएमई के अनुकूल माहौल देना भी जरूरी है। कारोबार मांग के आधार पर बढ़ते हैं। सरकार को खर्च बढ़ाने और निवेश को प्रोत्साहित करने पर जोर देना चाहिए। सरकार कदम बढ़ाएगी तो निजी क्षेत्र भी आगे आएगा।

अप्रत्याशित रूप से कम लागत में उत्पाद एवं सेवाएं दे पाना हमारी क्षमता है। अगर हम उत्पादकता बढ़ाने पर भी जोर दे पाएं तो वैल्यू चेन में काफी आगे निकल सकते हैं, जिससे विकास को गति मिलेगी। इन्फार्मेशन टेक्नोलाजी और टेली कम्युनिकेशन से भी अवसर बढ़ाने और आर्थिक परिदृश्य को बदलने में मदद मिली है। मेडिकल, टूरिज्म, रिटेल, शिक्षा जैसे सेवा क्षेत्रों ने टेलीकाम और आइटी के दम पर कई गुना वृद्धि दर्ज की है। भारत अभी दुनिया का कारखाना बनने से भले ही दूर हो, लेकिन यहां असेंबल एंड हब के जरिये दुनियाभर की कंपनियों को आकर्षित करने की क्षमता है। इससे 10 साल में 10 करोड़ रोजगार के अवसर बन सकते हैं। जिस तरह से गांवों में सड़क से हमने ग्रामीण भारत को मजबूती दी है, उसी तरह गांव की महिलाओं के हाथ में मोबाइल की पहुंच ने भी सशक्तीकरण में कम योगदान नहीं दिया है। इसी तरह स्वच्छ भारत, आयुष्मान भारत आदि जैसे अभियान भी कई गुना परिणाम देने वाले हैं। जन-धन, आधार और मोबाइल की तिकड़ी ने सरकारी योजनाओं में लीकेज को रोका है और अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के लिए पूरा लाभ सुनिश्चित किया है। 10 प्रतिशत की विकास दर भले ही ज्यादा लगे, लेकिन इतिहास बताता है कि हमारे लिए यह संभव है।

सबको मुख्यधारा में लाने की जरूरत : भारत में 500 बड़ी कंपनियां ही वैश्विक पहचान वाली हैं और प्रतिस्पर्धी हैं। हमें इन 500 बड़ी कंपनियों से कड़ी जोड़ने के लिए कम से कम 20 हजार मध्यम आकार की कंपनियों की जरूरत है, जबकि अभी इनकी संख्या 5,000 से भी कम है। एमएसएमई में भी हमारे पास करीब एक लाख बड़ी कंपनियां होनी चाहिए। हमारे पास युवा और कुशल मानवश्रम है। इसका पूरा लाभ उठाना होगा। विकास को सामाजिक दृष्टि से भी देखना होगा। यदि हम हर नागरिक को सम्मान का जीवन और रोजगार नहीं दे पाए, तो विकास निर्थक है। सतत विकास ही रोजगार सृजन का माध्यम बन सकता है। इसी के दम पर हर व्यक्ति को गरीबी की रेखा से ऊपर लाना संभव है। हमें यह समझना होगा कि 21वीं सदी का भारत 20वीं सदी की व्यवस्था से नहीं चल सकता है। इसलिए देश को सख्त सुधारों की दरकार है।

[मैनेजमेंट गुरु और वित्तीय एवं समग्र विकास के विशेषज्ञ]

Edited By: Sanjay Pokhriyal