विवेक भटनागर। उर्दू शायरी के हरदिल अजीज शायर मिर्जा गालिब को आम का बड़ा शौक था। इतना कि वे अक्सर कहा करते थे - आम मीठे हों और बहुत हों। क्या मजाल कि उनके सामने कोई आम की शान में गुस्ताखी कर दे। एक किस्सा कहा जाता है कि एक दिन गालिब के एक दोस्त हकीम रजी उद्दीन खान उनके घर आए।

हकीम साहब को आम कुछ खास पसंद नहीं थे और वे जानते थे कि गालिब आमों के कितने रसिया हैं। दोनों दोस्त बरामदे में बैठकर बातें करने लगे, जहां आम के छिलके पड़े हुए थे। एक गधा वहां से गुजरा। गधे ने आम के छिलकों को सूंघा और आगे बढ़ गया। हकीम साहिब को गालिब को छेडऩे का बहाना मिल गया। वे बोले- देखिए, आम को तो गधा भी नहीं खाता। इस पर गालिब तपाक से बोले- 'बेशक गधा आम नहीं खाता।‘

आम विज्ञानी कलीमुल्लाह खान ने आम की नई-नई किस्मों को नरेंद्र मोदी या योगी आदित्यनाथ जैसे खास नामों से नवाजा हो, पर आम खास होकर भी सिर्फ आम ही है। अब बाजार ने भी आम लोगों के इसके प्रति सेंटीमेंट्स को भुना लिया है। आम का मौसम पूरे साल रहने की कोशिश बाजार कर रहा है, उसने मैंगों ड्रिंक, मैंगो लस्सी और मैंगो पल्प उतार दिए। लेकिन मजा तो सिर्फ आम के सीजन में आम खाने से ही है। आम की खुशबू का जादू लेने में है।

हर जुबां पर आम है आम का किस्सा
हर आम इंसान के जहन में कोई न कोई किस्सा आम को लेकर होगा। बचपन में पेड़ पर आम तोड़ने की कोशिश में गिरना हो या बगीचे से आम चोरी में पकड़ा जाना। चाहे दाल को स्वादिष्ट बनाने वाली खटाई की चर्चा हो, चाहे अमावट की। आम किसी न किसी रूप में जिंदगी में शामिल रहता है।

कुछ भी नहीं, तो आम को लेकर नोस्टाल्जिया तो रहता ही है कि उस जमाने में टोकरी भर आम खरीदे जाते थे, जिसे पानी से भरी बाल्टी में डाल दिया जाता था और पूरा परिवार उसके इर्दगिर्द बैठकर आमों के रस के साथ बातों का रस भी लेता था। बड़े बुजुर्ग बच्चों को हिदायत देते थे कि आम का चीप (एसिड) निकालकर खाओ, लेकिन बच्चों में इतना सब्र कहां कि आम उनके सामने हो और फौरन से पेशतर वह उनके मुंह तक न आए। उनके होठों में जख्म हो जाते थे।

आज महंगाई के जमाने में आम एक किलो खरीदे जाते हैं, उस पर भी काट कर खाने वाले आम तो बड़े शहर के लोगों को तो मिल जाते हैं, चूस कर खाने वाले रसभरे खटमिट्ठे आम नहीं मिलते। गीतकार और लखनऊविद योगेश प्रवीन कहते हैं, 'आम फलों का राजा इसीलिए है, क्योंकि इसमें स्वाद, सुगंध और सद्गुण तीनों हैं। अवध में तो ज्यादातर अरहर की दाल खाई जाती है, उसमें भी अमकली न डाली गई हो, तो दाल भी अपना स्वाद नहीं दिखाती। यहां तो कहावत भी है - दाल अरहर की, खटाई आम की, तोले भर घी, रसोई राम की।

'लखनऊ के शायर सुहैल काकोरवी ने तो आम पर शायरी की पूरी किताब ही 'आमनामा' लिख दी, जिसे लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज किया गया। सुहैल काकोरवी अपने बचपन को याद कर के बताते हैं, 'मेरे वालिद इंग्लिश के लेक्चरर थे। मलीहाबाद के रहने वाले उनके बहुत से शागिर्द थे, जो टोकरे में आम लेकर आते थे। उसमें आम की तमाम किस्में होती थीं। उनमें तुख्मी (चूसकर खाए जाने वाले) और कलमी (काटकर खाए जाने वाले) दोनों तरह के आम होते थे। आम इतने हो जाते थे कि पूरा मुहल्ला उन आमों को खाता था'

जहां उगा, वहां का नाम पाया
लखनऊ के इतिहासकार और गीतकार योगेश प्रवीन बताते हैं, 'आम की जो मशहूर किस्मे हैं, उन्हें वहीं का नाम दे दिया गया, जहां उसका पेड़ पहली बार उगा या नजर में आया। दशहरी को यह नाम काकोरी के पास दशहरी गांव की वजह से मिला। कहा जाता है कि दशहरी आम का पेड़ सबसे पहले यहीं हुआ।

जब अवध के नवाब ने उस पेड़ के फल खाए, तो उन्होंने और भी पेड़ उगवाए।‘ दशहरी गांव के कारण उनका यही नामकरण करने के साथ-साथ नवाबों का खानदान उन पर अपना हक समझता था। इसीलिए आम के मौसम में पेड़ों को कवर कर दिया जाता था, ताकि आम चोरी न हो जाएं।

कहा जाता है कि अगर दशहरी आम किसी को तोहफे में भेजा जाता था तो उसके आर-पार छेद कर दिया जाता था, ताकि उसकी गुठली से कोई नया पेड़ न उगा ले। इतनी बंदिशों के बावजूद दशहरी ने पूरी दुनिया में सिक्का जमा लिया। इसका श्रेय जाता है मलीहाबाद के पठान जमींदार ईसा खान को, जिन्होंने नवाबों के बाग के माली को पटाकर एक पौधा हासिल कर लिया और फिर एक से दो और दो से चार... यह लाजवाब आम खास से आम हो गया और ‘आम कैपिटल’ मलीहाबाद का प्रमुख आम हो गया।

इसी तरह मलीहाबाद में ही विकसित हुई आम की लोकप्रिय नस्ल चौसा का नाम भी संडीला के पास स्थित एक गांव चौसा पर रखा गया। कहा जाता है कि वहां एक बार एक जिलेदार ने अपने दौरे के दौरान गांव के एक पेड़ का आम खाया। लजीज स्वाद और जुदा खुशबू के कारण उसे यह आम बहुत पसंद आया। उसने इसकी खबर संडीला के नवाब को दी और नवाब ने चौसा की नस्ल को फैलाने का काम किया।

लोकप्रिय लंगड़ा आम का प्रादुर्भाव बनारस से बताया जाता है। कहा जाता है बनारस के एक शिव मंदिर में एक साधु आम का पौधा लेकर आया था। उसे वहां के पुजारी को देकर उनकी सेवा करने को कहा। पुजारी ने उसे मंदिर के पीछे लगा दिया। पेड़ बड़ा हुआ तो उस पर बड़े मीठे और रसीले अलग तरह के आम लगे। पुजारी के पास आने वाले श्रद्धालुओं से इसकी शोहरत फैलती गई।

चूंकि मंदिर का पुजारी पैर से दिव्यांग था, इसलिए इस आम को भी लंगड़ा कहा जाने लगा। हालांकि कुछ लोग लंगड़ा की उत्पत्ति इलाहाबाद से भी मानते हैं। इसी तरह बिहार में भागलपुर के एक गांव में फजली नाम की एक महिला के घर पैदा हुए आम की एक किस्म का नाम फजली पड़ गया।

आम के आम, गुठलियों के दाम
यह कहावत यूं ही नहीं है। आम के पेड़ का सिर्फ फल ही नहीं, उसकी हर चीज काम आती है। आम की गुठलियों का, छाल का, पत्ती की कोपलों का आयुर्वेद में बड़ा महत्व है। गांव में तो किसी बच्चे को दस्त होने पर प्राथमिक उपचार में दादी-नानी आम की गुठली को घिसकर चटा दिया करती थीं।

हमारे बचपन में गांव के बच्चों के लिए आम की गुठली एक खिलौना भी बन जाती थी। लोग आम खाकर जहां-तहां गुठलियां फेंक दिया करते थे, उस जगह पौधे उगने लगते थे। उन पौधों को उखाड़ कर उसकी गुठली का कड़ा हिस्सा निकालकर गिरी को हम बच्चे ईंट पर घिस लेते थे और बन जाता था हमारा मुफ्त का बाजा। घिसे हुए हिस्से से फूंक मारने पर वह पिपिहरी की तरह बजता था।

किसी को लू न लग जाए, इसलिए आम का पना पीकर घर से निकलने की हिदायत दी जाती थी। आयुर्वेद में तो आम के पेड़ की जड़ से लेकर उसकी कोपल तक उसके हर अंग का इस्तेमाल होता है। किसी के घर में शादी-ब्याह हो, तो वंदनवार आम की पत्तियों की ही शुभ मानी जाती है।

शादी में यज्ञ-हवन आदि होना हो, तो पंडित जी सबसे पहले आम की लकडिय़ां और पत्ती ही मंगाते हैं। कहा जाता है कि आम का तने की लकड़ी इतनी घनी और ठोस होती है कि इसके फर्नीचर बड़े टिकाऊ होते हैं।

आम का अचार तो जिक्र छिड़ते ही मुंह में पानी ला देता है, अमावट का खट्टामीठा स्वाद बचपन से लेकर आज तक किसकी जुबान पर आज भी नहीं बैठा है। आज के बच्चे मैंगो शेक, मैंगोड्रिंक्स, स्‍क्‍वैश, जैम, जैली आदि के दीवाने हैं। आम इतना गुणकारी है कि इसमें अधिकांश विटामिन और खनिज पाए जाते हैं।

आम का नजराना
योगेश प्रवीन ने बताया कि, 'अवध में जो आम आए, कहा जाता है कि उन्हें जानकी जी अपने मायके से उपहार में लाई थीं। यही कारण है कि नवाबी युग में भी आम को शादी-ब्याह में या किसी उत्सव में नजराने के रूप में भेजा जाता था। उन्हें बांस की टोकरी में सजा कर उस पर चांदी का वर्क लपेट उपहार में दिया जाता था। यह परंपरा आज भी नवाबी खानदानों में है। आम कैपिटल के लोगों की तो पूरी अर्थव्यवस्था, शादी-ब्याह, उत्सव, खरीदादारी और तमाम खुशियां, सब कुछ दशहरी आम की फसल पर ही आधारित है।

आम के रसिया शायर
मिर्जा असद उल्लाह खान गालिब तो आम के प्रसिद्ध रसिया शायर के रूप में जाने जाते हैं। इतने कि उन्होंने अपनी शायरी में आम को 32 शेर समर्पित किए हैं। जैसे - बारे आमों का कुछ बयां हो जाए, खामा नख्ले-रतब फिशां हो जाए। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि आम के पेड़ का साया खुदा के साए की तरह है- साया इसका हुमां का साया है, खल्क पर वो खुदा का साया है। 

गालिब की तरह अकबर इलाहाबादी को भी आम बहुत पसंद थे। यहां तक कि उन्होंने अपने

दोस्त मुंशी निसार हुसैन को चिट्ठी लिखकर आम मंगाए थे- नामा न कोई यार का पैगाम भेजिए, इस फस्ल में जो भेजिए तो बस आम भेजिए। 

मशहूर क्रांतिकारी शायरों में जोश मलीहाबादी तो आमों के दरख्तों के बीच ही पले-बढ़े थे। लेकिन भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद वे पाकिस्तान चले गए। उन्हें रोकने की नेहरू की बात को भी उन्होंने ठुकरा दिया, लेकिन पाकिस्तान जाने के बाद उन्हें बड़ा अफसोस हुआ। उम्र भर वे इसी अफसोस में जीते रहे और आमों के बीच बसे मलीहाबाद को याद करते रहे। उन्होंने अपनी आत्मकथा 'यादों की बारात’ में आमों को

याद किया। उन्होंने लिखा - आम के बागों में जब बरसात होगी, पुरखरोश मेरी फुरकत में लहू रोएगी। 

शायर अब्बास ताबिश कहते हैं- मौसम तुम्हारे साथ का जाने किधर गया, तुम आए और बौर न आया दरख्त पर।

वहीं कद्र काकोरवी के जहन से आम के बागों की यादें नहीं गईं - आम के बागों में वो पीना-पिलाना याद है, मुद्दतें गुजरी हैं, लेकिन वो जमाना याद है। 

लखनऊ में ब्रिटिश काल के आखिरी दौर के हिंदी-अवधी के कवि पुष्पेंदु जैन लखनवी सफेदा आम के रसिया थे। अपनी कविता में उन्होंने सफेदा को बाकी आमों से श्रेष्ठ सिद्ध कर दिया था -

  • लखनऊ का सफेदा और लंगड़ा बनारस का, यही दो आम जग में उत्तम कहायो है।
  • लखनऊ के बादशाह दूध से सिचायो वाको, वाही के वंशज सफेदा नाम पायो है।
  • या से लडऩ को बनारस से धायो एक, बीच में ही टूटी टांग लंगड़ा कहायो है।
  • कहैं 'पुष्पेंदु’ वाने जतन अनेक कीने, तबहूं सफेदे की नजाकत न पायो है।

गुलजार ने तो एक कविता में आम के दरख्त के बहाने जिन्दगी का पूरा फलसफा ही कह

डाला है- 'मोड़ पर देखा है वो बूढ़ा इक आम का पेड़ कभी मेरा वाकिफ है, बहुत सालों से मैं

जानता हूं’

हंसी-मज़ाक का सबब बना लंगड़ा
योगेश प्रवीन बताते हैं, 'ज्यादातर बादशाह और नवाब आम के शौकीन रहे हैं, लेकिन तैमूर लंग के जमाने में लंगड़ा आम पर प्रतिबंध था। कहा जाता है कि तैमूर ने अपने महल ही नहीं, बल्कि पूरे राज में लंगड़ा आम न लाने की हिदायत दी हुई थी। सिर्फ आम ही नहीं, `लंगड़ा` शब्द कहने में भी कनीजें हिचका करती थीं। तभी तो

हास्य-व्यंग्य के शायर जरीफ लखनवी ने लिखा - 'तैमूर ने कस्दन कभी लंगड़ा न मंगाया, लंगड़े के कभी सामने लंगड़ा नहीं आया।‘

लंगड़ा आम को लेकर हास्य-व्यंग्य के शायरों ने खूब चुटकी ली है। मशहूर शायर सागर खय्यामी ने कहा- आम तेरी ये खुशनसीबी है, वरना लंगड़े पे कौन मरता है।

अकबर इलाहाबादी कैसे चुप रह सकते थे। उन्होंने फरमाया - असर ये तेरे अन्फ़ासे मसीहाई का है अकबर, इलाहाबाद से लंगड़ा चला लाहौर तक पहुंचा।

मोदी, योगी किस्मों का जादू
मलीहाबाद के आम विशेषज्ञ हाजी कलीमुल्लाह खान ने बड़ी-बड़ी शख्सीयतों के नाम पर आम की नई नई किस्में विकसित की हैं, जिनमें प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर नमो आम है, तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम पर योगी आम भी। पद्मश्री कलीमुल्लाह का कहना है कि 'नरेंद्र मोदी ने दुनिया में भाईचारे की मिठास पैदा की है, इसलिए उनके नाम को समर्पित नमो आम इसी मिठास को याद दिलाएगा।

कलीमुल्लाह बताते हैं कि उन्हें दूसरे देशों ने अपने देश में आम की किस्मे विकसित करने के लिए बड़े-बड़े प्रलोभन दिए, लेकिन देश की मिट्टी से उन्हें इतना लगाव था कि उन्होंने आम पर यही रहकर काम किया। यह तो सभी लोग जानते हैं कि कलीमुल्लाह आमों के जादूगर हैं। मलीहाबाद को ‘आम कैपिटल’ बनाने में उनका योगदान है। उन्होंने एक ही पेड़ पर 300 से ज्यादा किस्म के आम पैदा करके अनूठा कारनामा कर दिखाया था। सचिन तेंदुलकर और एपीजे अब्दुल कलाम के नामों पर भी वे आम की किस्मों का नाम रख चुके हैं।

आमनामा: रिकॉर्ड होल्डर किताब
आज के शायर सुहैल काकोरवी गालिब के बड़े प्रशंसकों में हैं और उनकी तरह ही आम के शौकीन भी। उन्होंने आम पर शायरी की किताब लिखी 'आमनामा', जिसे लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में कविता में किसी फल पर लिखी पहली किताब के रूप में स्थान मिला। इस किताब में उन्होंने आम की करीब 100 किस्मों का जिक्र किया है। इसकी खासियत यह है कि हर इसके कलाम के हर शेर में आम शब्द जरूर आया है। इसमें उन्होंने न सिर्फ अपने दोस्तों का जिक्र किया है, बल्कि कई मशहूर हस्तियों का जिक्र आम की खासियत के साथ किया है।

सुहैल काकोरवी बताते हैं, 'अमीनाबाद में दशहरी हाउस है, जहां हर साल आम पार्टी हुआ करती थी। एक बार उर्दू के समालोचक प्रोफेसर शारिब रुदौलवी को मैंने देखा कि एक कार्यक्रम में आम लेकर बैठे थे और पीछे बैनर पर लिखा था - आम और गालिब।‘ तब मैंने शेर कहा - पहले कहते थे आम और गालिब। अब कहा जाए आम और शारिब। शायर बशीर फारूकी साहब ने कहा कि आम के इस सिलसिले को बढ़ाइए। बढ़ते-बढ़ते ‘आमनामा’ को साहित्य में बड़ा सम्मान मिला। रिकॉर्ड बना।

आम है विशुद्ध भारतीय
आम पूरी तरह भारतीय मूल का है। कहा जाता है कि चौथी-पांचवी सदी में बौद्ध धर्म प्रचारकों के साथ भारत से आम मलेशिया और पूर्वी एशिया के देशों तक पहुंचा। पारसी लोग 10वीं सदी में इसे पूर्वी अफ्रीका ले गए। पुर्तगाली 16वीं सदी में इसे ब्राजील ले गए, वहां से यह वेस्टइंडीज और मैक्सिको पहुंच गया। अमेरिका आम के मामले में पिछड़ा हुआ है।

वहां आम वर्ष 1861 में पहली बार उगाया गया। भारत आज भी आम की पैदावार सबसे ज्यादा है। भारत के बाद क्रमश: चीन, मैक्सिको, थाइलैंड और पाकिस्तान का नाम आता है। यूरोप में सबसे अधिक आम स्पेन में होता है, जिसका आम तीखी खुशबू लिए होता है।

आम का राजा कौन?
फलों का राजा तो आम ही है, लेकिन आम का राजा कौन? सच बात तो यह है कि उत्तर प्रदेश वालों के लिए दशहरी आम का राजा है, तो मुंबई वालों के लिए अलफांसो। बेंगलुरु वाले बंगनपल्ली के स्वाद पर मरते हैं, तो पश्चिम बंगाल के लोग मालदा को खास बताते हैं।

यूपी का दशहरी: उत्तर प्रदेश में दशहरी का बोलबाला है। उन्नत किस्म में रेशे नहीं होते। इसके बाद नंबर आता है लंगड़ा आम का, जो रेशेदार होता है, यह अपनी खास मिठास के लिए जाना जाता है। इस आम की गुठली छोटी और गूदा भरपूर होता है। वहीं चौसा, जब आम के सीजन के अंत में बाकी आम मिलने लगभग बंद हो जाते हैं, तब आता है। इसके रेशामुक्त गूदा और मिठास के तो क्या कहने।

महाराष्ट्र का अलफांसो: एलीट क्लास का आम अल्फांसो देश का सबसे चर्चित आम है। अनोखे मिठास, स्वाद और सुगंध वाला यह आम पकने के एक हफ्ते तक खराब नहीं होता। इसीलिए अल्फांसो सब से ज्यादा निर्यात किया जाता है। हां, आम लोग यह आम नहीं खा पाते, क्योंकि इसका दाम ही हजारों रुपये दर्जन होता है।

पश्चिम बंगाल का मालदा और हिमसागर: पश्चिम बंगाल में हिमसागर आम बहुत लोकप्रिय है। वहीं मालदा आम की खुशबू और मिठास के दीवाने देश-विदेश तक फैले हुए हैं। पूरे देश में और बाहर के मुल्कों में इसके बड़े कद्रदान हैं।

बिहार का जर्दालू: बिहार के भागलपुर में होने वाले जर्दालू आम का स्वाद ही निराला है। यह आम आम जनता के साथ राजनेताओं के लिए भी खास रहा है। कहा जाता है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हर साल सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से लेकर राष्ट्रपति तक विशिष्ट लोगों को जर्दालू आम भेंट करते हैं।

दक्षिण भारत का बंगनपल्ली:  आंध्र प्रदेश के कुरनूर जिले में बंगनपल्ली के शाही परिवार ने इस आम का परिचय कराया था। इस आम से तमिल स्टाइल में कढ़ी भी बनाई जाती है। इस आम के दीवानों का मन तो इसका छिलका भी खा जाने का करता है।

गोवा के मनकुरद और मुसरद: गोवा में होने वाले मनकुरद, मुसरद, नीलम और बाल आंबू जैसे आम यहां के लोगों को खास पसंद हैं। ये अप्रैल में ही बाजार में आ जाते हैं। गोवा के लोग मनकुरद आम से तमाम तरह की डिशेज बनाते हैं।

बागपत का आम, जिस पर पाकिस्तान जताता है हक
बागपत का रतौल आम काफी लोकप्रिय है, जिसकी उत्पत्ति वहां के रतौल गांव से मानी जाती है। कहा जाता है कि पाकिस्तान में यह आम खूब उगाया और खाया जाता है, लेकिन पाकिस्तान यह मानने को तैयार नहीं होता कि यह मूल रूप से हिंदुस्तान का आम है।

इस बात का पता तब चला, जब 1981 में पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल जिया उल हक ने भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पाकिस्तान के खास आम बताकर आम भेंट किए। इंदिरा गांधी को आम बहुत पसंद आए। उन्होंने आमों की बड़ी तारीफ की। यह खबर फैलने के बाद बागपत जिले के रतौल गांव के लोगों ने इंदिरा से मुलाकात कर उन्हें बताया कि यह आम उनके गांव का है।

बंटवारे में उनके पिता के बड़े भाई पाकिस्तान जाते वक्त रतौल आम की किस्म भी साथ ले गए थे, जिसे उन्होंने मुल्तान में उगाया। लेकिन यह बात पाकिस्तान मानने को तैयार नहीं होता कि रतौल आम भारत का है।

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Posted By: Nitin Arora