नई दिल्ली, पीटीआइ। बैलों को वश में करने के खेल जल्लीकट्टू को अनुमति देने वाले तमिलनाडु के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि मौलिक प्रश्न यह है कि इस खेल को किसी भी प्रारूप में अनुमति दी जा सकती है या नहीं, जिसे कई लोग पशुओं के साथ क्रूरता मानते हैं। मालूम हो कि इस खेल का आयोजन राज्य में पोंगल पर्व पर किया जाता है।

आज भी होगी बहस

कई याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकीलों ने जस्टिस केएम जोसेफ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ से कहा कि पशुओं के प्रति क्रूरता की किसी भी गतिविधि को मंजूरी की अनुमति नहीं दी जा सकती। इस दौरान पीठ ने कहा, तमिलनाडु सरकार का कहना है कि ये बैल प्रशिक्षित होते हैं और उनके साथ बेहद प्रेम का व्यवहार किया जाता है। इस मामले पर बुधवार को पूरे दिन बहस हुई जो शाम 5.30 बजे तक चली। बहस गुरुवार को भी जारी रहेगी।

तमिलनाडु सरकार ने दी थी अनुमति

शीर्ष अदालत ने अपने 2014 के फैसले में कहा था कि सांडों को ‘जल्लीकट्टू’ कार्यक्रमों या बैलगाड़ी दौड़ में शामिल होने वाले जानवरों के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है और देश भर में इन उद्देश्यों के लिए उनके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया है। तमिलनाडु सरकार ने पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 में संशोधन किया था और अपने यहां ‘जल्लीकट्टू’ की अनुमति दी थी।

जानवर के प्रति है क्रूरता

न्यायमूर्ति रस्तोगी ने कहा कि समस्या यह है कि नियम किसी भी रूप में हो सकते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कभी मेल नहीं खाती। उन्होंने कहा, ‘सवाल सिर्फ इतना है कि हम जमीनी हकीकत का संज्ञान नहीं ले सकते, क्योंकि यह योजना से मेल नहीं खाती। हमें योजना की पड़ताल करनी है, न कि जमीनी हकीकत का नहीं।’ कुछ याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने कहा कि दिखावटी परिवर्तन के बावजूद सांड को सभी बेहतरीन सुरक्षा उपायों के साथ लड़ने के लिए मजबूर करना अब भी जानवर के प्रति क्रूरता है।

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Edited By: Sonu Gupta

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