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    44 साल बाद दिखा धारीदार लकड़बग्घा

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    Updated: Sat, 02 Feb 2013 06:53 PM (IST)

    हल्द्वानी, [कमलेश पांडेय]। उत्तर भारत में 44 साल बाद तराई के जंगलों में धारीदार लकड़बग्घा [स्ट्रीपड हाइना] नजर आने से वन्य जीव प्रेमी उत्साहित हैं। इस प्रजाति की मौजूदगी के प्रमाण नई बनी सेंचुरी नंधौर वैली में मिले हैं। सेंचुरी में लगाए गए कैमरों में धारीदार लकड़बग्घा की तस्वीरें कैद हुई हैं। वन्य जीव विशेषज्ञों के अनुसार लकड़बग्घों की यह प्रजाति सन 1

    हल्द्वानी, [कमलेश पांडेय]। उत्तर भारत में 44 साल बाद तराई के जंगलों में धारीदार लकड़बग्घा [स्ट्रीपड हाइना] नजर आने से वन्य जीव प्रेमी उत्साहित हैं। इस प्रजाति की मौजूदगी के प्रमाण नई बनी सेंचुरी नंधौर वैली में मिले हैं। सेंचुरी में लगाए गए कैमरों में धारीदार लकड़बग्घा की तस्वीरें कैद हुई हैं। वन्य जीव विशेषज्ञों के अनुसार लकड़बग्घों की यह प्रजाति सन 1978 में नेपाल से लगने वाली उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले सीमा पर अंतिम बार देखा गया था।

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    संरक्षित श्रेणी के इस जीव की मौजूदगी जंगल के लिए सुखद मानी जाती है। जंगल को साफ रखने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ये प्राणी सड़े-गले जानवरों का मांस चट कर जाते हैं। आमतौर पर लकड़बग्घे खुद शिकार नहीं करते, बल्कि दूसरे जीवों के छोड़े गए शिकार खाकर काम चलाते हैं। करीब पांच वर्ष पूर्व उत्तराखंड में ही राजाजी नेशनल पार्क के चिल्ला रेंज में इनकी गुफा [मांद] देखी गई थी, लेकिन तस्वीर न मिल पाने से अधिकारिक रूप में इस प्रजाति की मौजूदगी सरकारी दस्तावेजों में दर्ज नहीं हो पाई। कुमाऊं पश्चिमी वृत्त के वन संरक्षक समीर सिन्हा बताते हैं कि धारीदार लकड़बग्घा उत्तर भारत में हिमालय की तराई से लेकर उत्तर-प्रदेश और बिहार से लगी नेपाल सीमा तक पाए जाते थे। उन्होंने बताया कि धारीदार लकड़बग्घों की संख्या सिमटने का मुख्य कारण मानवीय दखल भी रहा है।

    पालतू मवेशियों को दर्द निवारक के रूप में डायक्लोफेनिक दवा दी जाती हैं। मवेशियों की मौत होने पर ग्रामीण इन्हें जंगल की सीमा में फेंक देते हैं। इन मवेशियों का मांस खाना भी लकड़बग्घों को भारी पड़ा। और वे धीरे-धीरे करके मरने लगे।

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