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अब मछलियां भी मिलेंगी आर्गेनिक, केंद्र सरकार ने तय किए कड़े मानक

By Arvind SharmaEdited By: Garima Singh
Published: Wed, 04 Nov 2026 10:31 PM (IST)

केंद्रीय सरकार ने सिक्किम के सोरेंग में देश के पहले जैविक मत्स्य पालन क्लस्टर के लिए एसओपी जारी की है।

सिक्किम के सोरेंग में देश का पहला जैविक मत्स्य पालन क्लस्टर

सिक्किम के सोरेंग में देश का पहला जैविक मत्स्य पालन क्लस्टर

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अरविंद शर्मा, नई दिल्ली। जैविक खेती की जब चर्चा होती है तो अनाज, फल और सब्जियां ही जेहन में आती हैं, लेकिन अब मछली को भी जैविक पहचान देने की तैयारी है। सिक्किम के सोरेंग में देश का पहला जैविक मत्स्य पालन क्लस्टर बना है। उसके प्रमाणीकरण के लिए केंद्र सरकार ने एसओपी जारी कर दी है।

इसका उद्देश्य जैविक मछली के लिए बेहतर मूल्य वाले बाजारों तक पहुंच बनाना है। हालांकि, किसानों के सामने असली चुनौती जैविक चारा उपलब्ध कराने, प्रमाणन की लागत घटाने और सामान्य मछली के मुकाबले बेहतर कीमत हासिल करने की होगी।

देश का पहला जैविक मत्स्य पालन क्लस्टर

एसओपी के मुताबिक मछली पालकों को बीज, चारा, तालाब में इस्तेमाल सामग्री, बीमारी और उपचार, उत्पादन का पूरा रिकार्ड रखना होगा। केवल दावे के आधार पर मछली को जैविक नहीं माना जाएगा। जांच के बाद ही प्रमाणपत्र मिलेगा।

जैविक मछली पालन के लिए केवल साफ पानी और रसायन मुक्त तालाब पर्याप्त नहीं हैं। ऐसे तालाब का चयन करना होगा, जहां आसपास के उद्योगों, नालों और खेतों से प्रदूषित पानी या जहरीले रसायन नहीं पहुंचते हों। पानी में घुली आक्सीजन, तापमान और अमोनिया की नियमित जांच जरूरी होगी।

तालाब की सफाई और कीटाणु नियंत्रण के लिए भी केवल स्वीकृत जैविक पदार्थों का इस्तेमाल किया जा सकेगा। मछली के बीज प्रमाणित जैविक स्रोत से लेने होंगे और स्थानीय प्रजातियों को तरजीह देनी होगी। जेनेटिक बदलाव से तैयार बीज प्रतिबंधित होंगे। बीज के स्रोत, उत्पादन और उसके उपचार का पूरा ब्योरा रखना होगा।

केंद्र ने जैविक मछली पालन के लिए एसओपी जारी की

मछलियों के प्राकृतिक भोजन की उपलब्धता बढ़ाने के लिए छोटे जलीय पौधों के साथ गोबर, मुर्गी की खाद और वर्मी कंपोस्ट का इस्तेमाल किया जा सकेगा। ये भी सारे जैविक स्रोतों से होने चाहिए।

मछलियों की संख्या भी तालाब की प्राकृतिक क्षमता के मुताबिक रखनी होगी। एसओपी में एक हेक्टेयर में अधिकतम चार हजार फिंगरलिंग और किसी भी समय तीन टन से अधिक मछली बायोमास नहीं रखने का प्रविधान है।

मछलियों को अतिरिक्त भोजन देने की जरूरत पड़ने पर प्रमाणित जैविक फीड का इस्तेमाल करना होगा। किसान खुद भी चारा तैयार कर सकते हैं, लेकिन उसमें जैविक स्रोतों से प्राप्त सामग्री ही होनी चाहिए। आनुवांशिक संशोधन से बनी सामग्री, ग्रोथ प्रमोटर और सिंथेटिक अमीनो एसिड के इस्तेमाल पर रोक होगी।

बीमारियों की रोकथाम के लिए नियमित निगरानी

बीमारियों की रोकथाम के लिए पानी की गुणवत्ता, तालाब की सफाई और मछलियों के स्वास्थ्य पर नियमित निगरानी रखनी होगी। एंटीबायोटिक और हानिकारक रसायनों का इस्तेमाल प्रतिबंधित होगा। उपचार के लिए तय मानकों के तहत हर्बल और होम्योपैथिक दवाओं का इस्तेमाल किया जा सकेगा।

तालाब को अनुकूल बनाने के लिए निर्धारित अवधि पूरी करनी होगी। पानी निकालकर साफ किए जा सकने वाले तालाब में एक फसल ही ली जा सकेगी। खाली छोड़े गए तालाब के लिए 12 महीने और जिन्हें खाली नहीं किया जा सकता, उनके लिए 24 महीने की अवधि तय की गई है। जैविक और सामान्य मछलियों को अलग रखना अनिवार्य होगा।

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