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    बच्चों को उपहार में दी गई संपत्ति को रद कर सकते हैं माता-पिता, मद्रास HC का बड़ा फैसला; जानें क्या है मामला

    हाईकोर्ट ने कहा वरिष्ठ नागरिक अपने बच्चों या करीबी रिश्तेदार को गिफ्ट में दी गई संपत्ति रद कर सकते हैं। यदि वो उनकी देखभाल करने में असफल रहते हैं। न्यायमूर्ति एस एम सुब्रमण्यम और के राजशेखर की खंडपीठ ने दिवंगत एस नागलक्ष्मी की पुत्रवधू एस माला द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया। आपको आगे बताते हैं पूरा मामला क्या है।

    By Jagran News Edited By: Shubhrangi Goyal Updated: Wed, 19 Mar 2025 02:25 PM (IST)
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    मद्रास हाईकोर्ट का वरिष्ठ नागरिकों पर बड़ा फैसला

    डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। मद्रास हाईकोर्ट ने वरिष्ठ नागरिक की देखभाल को लेकर फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने कहा, वरिष्ठ नागरिक अपने बच्चों या करीबी रिश्तेदार को गिफ्ट में दी गई संपत्ति रद कर सकते हैं। यदि वो उनकी देखभाल करने में असफल रहते हैं।

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    न्यायमूर्ति एस एम सुब्रमण्यम और के राजशेखर की खंडपीठ ने दिवंगत एस नागलक्ष्मी की पुत्रवधू एस माला द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया। नागलक्ष्मी ने अपने बेटे केशवन के पक्ष में एक समझौता विलेख किया था, इस उम्मीद के साथ कि वह और उसकी बहू उसके जीवन भर उसकी देखभाल करेंगे। लेकिन वह उसकी देखभाल करने में विफल रहा।

    उसके बेटे की मृत्यु के बाद उसकी बहू ने भी उसके साथ बुरा व्यवहार किया। इसलिए, उसने आरडीओ, नागपट्टिनम से संपर्क किया।

    बेटे के भविष्य के लिए लिया था फैसला

    बयान दर्ज करने के बाद उसने प्यार और स्नेह से अपने बेटे के भविष्य के लिए विलेख लिखा था और माला के बयानों पर विचार करने के बाद, आरडीओ ने समझौता विलेख को रद्द कर दिया। इसे चुनौती देते हुए, माला ने एक याचिका दायर की और इसे खारिज कर दिया गया। माला ने फिर से याचिका दायर की।

    क्या बोला कोर्ट?

    पीठ ने कहा कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 की धारा 23(1) वरिष्ठ नागरिकों को ऐसी परिस्थितियों में सुरक्षा प्रदान करने के लिए बनाई गई है, जहां वे अपनी संपत्ति को उपहार या समझौते के माध्यम से इस उम्मीद के साथ सेटल करते हैं कि व्यक्ति उनकी बुनियादी सुविधाओं का प्रावधान करेगा।

    • पीठ ने कहा कि यदि व्यक्ति इन दायित्वों को पूरा करने में विफल रहता है, तो वरिष्ठ नागरिक के पास इसे रद करने के लिए न्यायाधिकरण से घोषणा प्राप्त करने का विकल्प होता है।
    • अदालत ने आगे कहा कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत आरडीओ के समक्ष वर्तमान मामले में स्थापित तथ्यों से पता चलता है कि संबंधित समय में बुजुर्ग महिला की उम्र 87 साल थी और उनकी बहू की तरफ से उनकी पूरी तरह उपेक्षा की जा रही थी।