जयप्रकाश रंजन, नई दिल्ली। पीएनबी को हजारों करोड़ की चपत लगाने वाले नीरव मोदी के मददगार बैंक के अंदर ही बैठे थे। सच तो यह है कि सात साल से चल रही इस घपलेबाजी में शामिल नीरव के मददगार बैंक शाखा के अंदर ही एक गुप्त शाखा चला रहे थे, जिसकी जानकारी केवल उन्हीं लोगों को थी। इसी लिए स्विफ्ट जैसे सिस्टम का सहारा लिया गया, ताकि बैंक प्रबंधन को भी इसकी भनक न मिले।

इस शाखा के कुछ कर्मचारी नीरव मोदी समूह की कई कंपनियों सोलर एक्सपो‌र्ट्स, स्टेलर डायमंड्स आदि के पक्ष में एलओयू (लेटर ऑफ अंडरटेकिंग) जारी कर रहे थे। एलओयू का मतलब यह है कि गारंटी का एक ऐसा पत्र जिसके जरिए ग्राहक किसी दूसरे बैंक से कर्ज ले सके। इन सभी कंपनियों का उक्त शाखा में सिर्फ चालू खाता था और उन्हें फंड उपलब्ध कराने की कोई सुविधा नहीं मिली थी। यहां से जारी होने वाले एलओयू की जानकारी बैंक के उच्च स्तर के अधिकारियों तक को नहीं थी। बैंकिंग उद्योग के लोगों का कहना है कि अगर ऐसा हुआ है तो सबसे बड़ी लापरवाही शाखा प्रबंधक और क्षेत्रीय प्रबंधक के तौर पर हुई है।

दरअसल, यह पूरा खेल बैंकिंग सिस्टम में चल रहे एक पृथक सॉफ्टवेयर सिस्टम के जरिए हुआ। घोटाले में लिप्त कर्मचारी नीरव मोदी को एलओयू जारी करने के लिए स्विफ्ट सिस्टम का इस्तेमाल करते थे। आमतौर पर सोसाइटी फॉर व‌र्ल्डवाइड इंटरबैंक फाइनेंशियल टेलीकम्यूनिकेशन नामक इस सिस्टम का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बैंकिंग ट्रांजैक्शन व मैसेजिंग के लिए होता है। पीएनबी की मुंबई शाखा के ये कर्मचारी नीरव मोदी के एलओयू जारी करने का काम भी इसी सिस्टम पर कर रहे थे।

यहां उल्लेखनीय बात यह है कि स्विफ्ट तकनीक से होने वाले इस लेन-देन की गड़बड़ी पर किसी की भी नजर नहीं गई, जबकि एलओयू जारी करने की भी एक प्रक्ति्रया होती है जिसके लिए उच्च अधिकारियों से मंजूरी लेनी होती है। साथ ही स्विफ्ट के तहत जिस राशि की लेन देन की जाती है उसे बैंकों के कोर बैंकिंग सिस्टम (सीबीएस) से मिलान करवाया जाता है। जबकि यहां पर जो ट्रांजैक्शन स्विफ्ट के जरिए हुए उनका सीबीएस में कोई जिक्त्र नहीं है।

इस पूरे क्रम में विदेश स्थित बैंकों की उन शाखाओं के स्तर पर भी लापरवाही बरती गई है जिन्हें एक ही कारोबारी के लिए लगातार कई वर्षों से एक ही शाखा से अरबों रुपये के एलओयू प्राप्त हो रहे थे। नियमों के मुताबिक, उन बैंकों के अधिकारियों को इसकी रिपोर्ट पीएनबी के उक्त शाखा प्रबंधक के साथ ही अपने मुख्यालय को भी करनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके चलते विदेश स्थित इन बैंकों के कर्मचारियों की भूमिका भी संदेहास्पद होती है।

By Tilak Raj