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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Oct 01, 2025 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

पहले रावण को जमाई मान कर करेंगे पूजा, फिर माफी मांगकर होगा वध, मंदसौर में दशहरे के अनूठी परंपरा

Published: Wed, 01 Oct 2025 06:53 PM (IST)Updated: Wed, 01 Oct 2025 07:07 PM (IST)

मंदसौर जिले में दशहरे पर अनूठी परंपरा है। खानपुरा में रावण को जमाई राजा मानकर पूजा जाता है सुबह ढोल-ढमाके ...और पढ़ें

पहले रावण को जमाई मान कर करेंगे पूजा, फिर माफी मांगकर होगा वध
पहले रावण को जमाई मान कर करेंगे पूजा, फिर माफी मांगकर होगा वध

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। मंदसौर जिले में दशहरे पर प्राचीनकाल से अनूठी परंपराएं चली आ रही हैं। देश के अधिकांश भागों में रावण के पुतले का दहन किया जाता है, लेकिन शहर के खानपुरा क्षेत्र में रावण को जमाई राजा का मान-सम्मान देकर सुबह ढोल-ढमाके के साथ पूजा की जाएगी। शाम को माफी मांगकर प्रतीकात्मक वध किया जाएगा।

इधर, जिले के ग्राम धमनार में भी रावण की प्रतिमा के सामने राम-रावण की सेना के बीच वाकयुद्ध होगा। दोनों तरफ से एक-दूसरे पर जलते हुए टोपले फेंके जाएंगे। राम की सेना में शामिल युवक रावण तक पहुंचकर नाक पर मुक्का मारकर दंभ का अंत करेंगे। मंदसौर में घनी बस्ती वाले क्षेत्र खानपुरा में लगभग 500 साल पुरानी रावण प्रतिमा को नामदेव छीपा समाज रावण बाबा मानकर पूजा-अर्चना करता आ रहा है।

मंदोदरी का मायका मंदसौर- प्रचलित मान्यता

प्रचलित मान्यता है कि रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका मंदसौर में नामदेव समाज में ही था। इसके चलते खानपुरा क्षेत्र में रावण को जमाई राजा मानकर पूजते हैं। दशहरे पर सुबह नामदेव छीपा समाज के महिला-पुरुष खानपुरा स्थित श्री बड़ा लक्ष्मीनारायण मंदिर से ढोल के साथ रावण प्रतिमा स्थल पहुंचकर पूजा-अर्चना करेंगे।

लोग रावण बाबा से पूरे क्षेत्र को बीमारी व महामारी से दूर रखने के लिए प्रार्थना करेंगे। पैर में लच्छा भी बांधेंगे। शाम को गोधुलि वेला में रावण प्रतिमा की पूजा-अर्चना कर माफी मांगकर गले में पटाखे की लड़ जलाकर प्रतीकात्मक वध करेंगे।

बुजुर्ग महिलाएं आज भी रावण की प्रतिमा के सामने से निकलते समय निकालती हैं घूंघट

रावण को जमाई राजा मानने की मान्यता के कारण ही नामदेव समाज सहित कुछ अन्य समाज की बुजुर्ग महिलाएं आज भी रावण की प्रतिमा के सामने से निकलते समय घूंघट निकालती हैं। इतिहासकार मंदोदरी के मंदसौर के रिश्ते के किसी भी तरह के साक्ष्य होने की बात से इन्कार करते रहे हैं पर रावण की प्रतिमा मंदसौर में क्यों बनी, इसके पीछे कोई उचित कारण नहीं बता पाते हैं।

बुजुर्ग मंदोदरी से शहर के रिश्ते का सबसे बड़ा प्रमाण देते हुए उलटा प्रश्न खड़ा करते हैं कि इस शहर का नाम मंदसौर क्यों हुआ? मंदोदरी के रिश्ते के कारण ही यहां का नाम मंदसौर है। हालांकि कहीं भी उल्लेख नहीं होने के कारण धार्मिक क्षेत्रों से जुड़े लोग व इतिहासकार इसे नहीं मानते हैं।

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