जन्मदिन विशेष : धनपत राय से प्रेमचंद बनने की कहानी, पढ़ें उपन्यास सम्राट के बारे में सबकुछ
प्रेमचंद ने हिन्दी कहानी और उपन्यास की एक ऐसी परंपरा का विकास किया जिसने एक पूरी शती के साहित्य का मार्गदर्शन किया। प्रेमचंद हिन्दी सिनेमा के सबसे अधिक लोकप्रिय साहित्यकारों में से हैं। सत्यजित राय ने उनकी दो कहानियों पर यादगार फ़िल्में बनाईं।

नई दिल्ली, [स्पेशल डेस्क]। हिंदी साहित्य की बात की जाए तो 31 जुलाई का दिन इसमें खास स्थान रखता है। इसी दिन यानि 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के पास लमही गांव में हिंदी साहित्य के अनमोल रत्न धनपत राय श्रीवास्तव का जन्म हुआ था। हम सब उन्हें प्रेमचंद के नाम से जानते हैं। लोग उन्हें नवाब राय के नाम से भी जानती है। प्रख्यात उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने उन्हें उपन्यास सम्राट का नाम दिया था।
प्रेमचंद ने हिन्दी कहानी और उपन्यास की एक ऐसी परंपरा का विकास किया, जिसने एक पूरी शती के साहित्य का मार्गदर्शन किया। उनकी लेखनी इतनी समृद्ध थी कि इससे कई पीढ़ियां को प्रभावित हुईं और उन्होंने साहित्य की यथार्थवादी परंपरा की भी नींव रखी। हिन्दी साहित्य में प्रेमचंद का कद काफी ऊंचा है और उनका लेखन कार्य एक ऐसी विरासत है, जिसके बिना हिन्दी के विकास को अधूरा ही माना जाएगा। मुंशी प्रेमचंद एक संवेदनशील लेखक, सचेत नागरिक, कुशल वक्ता और बहुत ही सुलझे हुए संपादक थे।
पढ़ने का था बड़ा शौक
प्रेमचंद की माता का नाम आनन्दी देवी और पिता मुंशी अजायबराय लमही में डाकमुंशी थे। उर्दू व फारसी में उन्होंने शिक्षा शुरू की और जीवनयापन के लिए अध्यापन का कार्य भी किया। प्रेमचंद को बचपन से ही पढ़ने का शौका था। सन् 1898 में मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद प्रेमचंद स्थानीय स्कूल में टीचर बन गए। नौकरी के साथ ही उन्होंने पढ़ाई भी जारी रखी और 1910 में अंग्रेजी, दर्शन, फारसी और इतिहास विषयों के साथ इंटर पास किया। साल 1919 में बीए पास करने के बाद मुंशी प्रेमचंद शिक्षा विभाग में इंस्पेक्टर के पद पर नियुक्त हुए।
कम उम्र में हो गया माता-पिता का देहांत
मुंशी प्रेमचंद का जीवन संघर्षों से भरा रहा। जब उनकी उम्र सिर्फ सात साल की थी, उस समय उनसे मां का आंचल छिन गया और 14 साल की उम्र में सिर से पिता का साया भी उठ गया। सिर्फ 15 साल की उम्र में उनकी पहली शादी हुई, लेकिन यह असफल रही। प्रेमचंद आर्य समाज से प्रभावित थे, जो उस समय का बहुत बड़ा धार्मिक और सामाजिक आंदोलन भी हुआ करता था। उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन किया और 1906 में दूसरा विवाह अपनी प्रगतिशील परंपरा के अनुरूप बाल-विधवा शिवरानी देवी से किया। उनके तीन बच्चे हुए- श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव।
ऐसे मिला प्रेमचंद नाम
साल 1910 में उनकी रचना 'सोजे-वतन' (राष्ट्र का विलाप) के लिए हमीरपुर के जिला कलेक्टर ने उन्हें तलब किया और उन पर जनता को भड़काने का गंभीर आरोप लगाया गया। यही नहीं, सोजे-वतन की सभी प्रतियां जब्त करके नष्ट कर दी गईं। कलेक्टर ने प्रेमचंद को यह भी हिदायत दी कि अब वे कुछ भी नहीं लिखेंगे और अगर उन्होंने कुछ लिखा तो उन्हें जेल भेज दिया जाएगा। बता दें कि उस समय तक वे धनपत राय नाम से लिखते थे। उर्दू में प्रकाशित होने वाली 'ज़माना पत्रिका' के सम्पादक और उनके करीबी दोस्त मुंशी दयानारायण निगम ने उन्हें 'प्रेमचंद' नाम से लिखने की सलाह दी। इसके बाद वे प्रेमचंद के नाम से लिखने लगे। जीवन के अंतिम दिनों में प्रेमचंद गंभीर रूप से बीमार पड़ गए थे और उनका उपन्यास 'मंगलसूत्र' पूरा भी नहीं हो सका। लम्बी बीमारी के बाद 8 अक्टूबर 1936 को उनका निधन हुआ। प्रेमचंद के देहांत के बाद 'मंगलसूत्र' को उनके पुत्र अमृत ने पूरा किया।
अभाव में जलती रही शिक्षा की लौ
गरीबी से लड़ते हुए प्रेमचंद ने अपनी पढ़ाई किसी तरह मैट्रिक तक पहुंचाई। बचपन में उनको गांव से दूर वाराणसी पढ़ने के लिए नंगे पांव जाना पड़ता था। इसी बीच उनके पिता का निधन हो गया। प्रेमचन्द को पढ़ने का शौक था, आगे चलकर वह वकील बनना चाहते थे, लेकिन गरीबी ने बहुत परेशान किया। स्कूल आने-जाने के झंझट से बचने के लिए एक वकील के यहां ट्यूशन पकड़ लिया और उसी के घर में एक कमरा लेकर रहने लगे। ट्यूशन के पांच रुपये में से तीन रुपये घर वालों को देने के बाद वह दो रुपये से अपनी जिंदगी आगे बढ़ाते रहे।
ऐसा था प्रेमचंद का व्यक्तित्व
अभावों के बावजूद प्रेमचंद सदा मस्त रहने वाले सादे और सरल जीवन के मालिक थे। जीवनभर वह विषमताओं और कटुताओं से खेलते रहे। इस खेल को उन्होंने बाजी मान लिया, जिसको वे हमेशा जीतना चाहते थे। कहा तो यह भी जाता है कि वह हंसोड़ प्रकृति के मालिक थे। उनके हृदय में दोस्तों के लिए उदार भाव था, उनके हृदय में गरीबों व पीड़ितों के लिए भरपूर सहानुभूति थी। वह हमेशा साधारण गंवई लिबास में रहते थे। जीवन का अधिकांश भाग उन्होंने गांव में ही गुजारा। वह आडम्बर और दिखावे से मीलों दूर रहते थे। तमाम महापुरुषों की तरह अपना काम स्वयं करना पसंद करते थे।
साहित्यिक जीवन
प्रेमचंद उनका साहित्यिक नाम था और बहुत वर्षों बाद उन्होंने यह नाम अपनाया था। जब उन्होंने सरकारी सेवा करते हुए कहानी लिखना शुरू किया, तब उन्होंने नवाब राय नाम अपनाया। बहुत से मित्र उन्हें हमेशा नवाब के नाम से ही सम्बोधित करते रहे। उनके पहले कहानी-संग्रह 'सोज़े वतन' ज़ब्त होने के बाद उन्हें नवाब राय नाम छोड़ना पड़ा। इसके बाद का उनका अधिकतर साहित्य प्रेमचंद के नाम से ही प्रकाशित हुआ। प्रेमचंद की पहली साहित्यिक कृति एक अविवाहित मामा से सम्बंधित प्रसहन था। मामा का प्रेम एक छोटी जाति की स्त्री से हो गया था। वे प्रेमचंद को उपन्यासों पर समय बर्बाद करने के लिए डांटते रहते थे। मामा की प्रेम-कथा को नाटक का रूप देकर प्रेमचंद ने उनसे बदला लिया। हालांकि यह पहली रचना उपलब्ध नहीं है, क्योंकि उनके मामा ने गुस्सा होकर इसकी पांडुलिपि को जला दिया था। प्रेमचंद ने भारतीय साहित्य और उपन्यास विधा को एक नई ऊंचाई दी। वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार थे। प्रेमचंद की रचनाओं में तत्कालीन इतिहास की भी झलक मिलती है। उन्होंने अपनी रचनाओं में जन साधारण की भावनाओं, तत्कालीन परिस्थितियों और उनकी समस्याओं का मार्मिक चित्रण किया है। अपनी कहानियों से प्रेमचंद मानव-स्वभाव की आधारभूत महत्ता पर बल देते हैं।
प्रेमचंद का स्वर्णिम युग
सन् 1931 की शुरुआत में 'गबन' प्रकाशित हुआ। 16 अप्रैल, 1931 को प्रेमचंद ने अपनी एक और महान रचना, 'कर्मभूमि' की शुरुआत की। यह अगस्त, 1932 में प्रकाशित हुई। प्रेमचंद की चिट्ठियों के अनुसार सन् 1932 में ही वह अपने अन्तिम महान उपन्यास, 'गोदान' लिखने में लग गए थे। हालांकि 'हंस' और 'जागरण' से सम्बंधित अनेक कठिनाइयों के कारण इसका प्रकाशन जून, 1936 में ही सम्भव हो सका। अपनी अंतिम बीमारी के दिनों में उन्होंने एक और उपन्यास, 'मंगलसूत्र' लिखना शुरू किया था, लेकिन अकाल मृत्यु के कारण यह अधूरा रह गया। 'गबन', 'कर्मभूमि' और 'गोदान' जैसे उपन्यासों पर विश्व के किसी भी कृतिकार को गर्व हो सकता है। प्रेमचंद की उपन्यास-कला का यह स्वर्णिम युग था।
जब भारत का स्वाधीनता आंदोलन चल रहा था उस समय उन्होंने कथा साहित्य द्वारा हिंदी व उर्दू दोनों भाषाओं को जो अभिव्यक्ति दी उसने सियासी सरगर्मी को, जोश को और आंदोलन, सभी को उभारा और उसे ताक़तवर बनाया। इससे उनकी लेखनी भी ताकतवर होती गई। प्रेमचंद इस अर्थ में निश्चित रूप से हिंदी के पहले प्रगतिशील लेखक कहे जा सकते हैं।
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