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    महाकवि गोपालदास: भावुक 'इटावी' से नीरज बनने की कहानी..

    By Manish NegiEdited By:
    Updated: Fri, 20 Jul 2018 12:31 AM (IST)

    पुरावली (इटावा) में जन्में नीरज पढ़ाई और रोजी-रोटी के चक्कर में एक जगह से दूसरी जगह जाते रहे।

    महाकवि गोपालदास: भावुक 'इटावी' से नीरज बनने की कहानी..

    (प्रेम कुमार)। महाकवि गोपालदास नीरज अब इस दुनिया में नहीं रहे। कुछ समय से बीमार चल रहे गोपालदास नीरज को तबीयत बिगड़ने पर दिल्ली के एम्स में भर्ती कराया गया था। गोपालदास, खुद को तपभ्रष्ट योगी कहते हैं। तन के रोगी और मन के भोगी होने के बावजूद उनकी आत्मा योगी है। तरह-तरह के भोगों के चक्कर में मन उन्हें यहां-वहां भटकाता-घुमाता रहा लेकिन बिना फंसे वे अनथक अनवरत बुलंदियां छूते गए। पुरावली (इटावा) में जन्में नीरज पढ़ाई और रोजी-रोटी के चक्कर में एक जगह से दूसरी जगह जाते रहे। अलीगढ़ आने से पहले जीविकोपार्जन के लिए उन्होंने पान-बीड़ी-तंबाकू बेचा, अखबार बांटे, यमुना के पानी में से पैसे खोजे-निकाले, रिक्शा तक चलाया, ट्यूशन पढ़ाए, टाइपिंग की। बाद में लिट्रेरी असिस्टेंट, जिला सूचना अधिकारी और महाविद्यालयों में प्राध्यापक भी हुए-हटाए गए या कहें हटना पड़ा। तमाम जगह अटकते-भटकते, भागते-दौड़ते अंतत: अलीगढ़ में ठिकाना मिला-बना।

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    मिलीं सारी खुशियां
    61 वर्ष पहले धर्म समाज कॉलेज में नौकरी के सिलसिले में ही अलीगढ़ आना हुआ था। नौकरी मिली लेकिन छोड़नी पड़ी। मानो नौकरियां और नीरज एक-दूसरे को रास नहीं आए। अलीगढ़ आने से पहले वे कवि हो चुके थे, पहचाने जाने लगे थे लेकिन काव्य-जगत में बुलंदियां छूते जाने की शक्ति और सामर्थ्य उन्हें अलीगढ़ ने ही दी। यहां आ बसने के बाद सचमुच कविता उनका सर्वस्व-उनकी जिंदगी हो गई। वे कविता और कविता नीरज हो गई। माना कि 1941 से कविता का लिखना और 1944 से मंचों पर पढ़ना-छपना शुरू हो चुका था लेकिन किराएदार से बेहतरीन आलीशान भवन के मालिक बन सकने का गौरव और कवि के रूप में मिली सारी इज्जत, शोहरत और दौलत उन्हें इस शहर में आने के बाद मिली। ‘प्रेम का पुजारी’ और ‘रस का भिखारी’ बनने-कहलाने की सारी सहूलियतें और खुशियां भी इसी शहर ने दीं।

    कविता-ज्योतिष का संतुलन
    इन सबके बावजूद अलीगढ़ ने क्या दिया? के सवाल के जवाब में पहले तो झट से यही कहा जाएगा, ‘अलीगढ़ ने कुछ नहीं दिया। ’फिर फक्कड़ अंदाज में अपनी विरक्ति अनासक्ति के समर्थन में सव्याख्या अपनी काव्य-पंक्तियां सुनाना शुरू हो जाएगा, ‘हम तो मस्त फकीर, हमारा कोई नहीं ठिकाना रे... ऐसी गंध बसी है मन में सारा जग मधुवन लगता है... इस द्वार क्यों न जाऊं, उस द्वार क्यों न जाऊं, घर पा गया तुम्हारा, मैं घर बदल-बदल के-बोल फकीरे सिवा नशे के अपना कौन सगा रे, जो सबका सिरहाना रे, वह अपना पैताना रे... हर घाट जल पिया है, गागर बदल-बदल के।’ फिर अचानक ज्योतिष के सहारे अपने कहे को पुख्ता किया जाएगा,

    ‘मैं सब कुछ दूंगा, मुझे कुछ नहीं मिलेगा। तीसरे घर में बृहस्पति हो तो सब मिलेगा- पैसा-यश पर आपको कुछ नहीं मिलेगा। मेरे साथ यही हुआ, ‘जब मुझको हंसना था, तब तो मैं रोया, थोड़ा कुछ पाने को बहुत कुछ खोया।’ और फिर कुछ मिलने को स्वीकार करने की जगह अपना किया-दिया गिनाना शुरू हो जाएगा,
    ‘बहुत कुछ मिला है मुझसे अलीगढ़ को। मेरे नाम से जाना जाता है यह शहर। यहां मेरे रहने से अलीगढ़वासी खुश होते हैं, गर्व करते हैं। पत्नी के नाम से मैंने यहां ‘सावित्री टायनी टॉट स्कूल’ खोला था।’ मालवीय पुस्तकालय और लाल बहादुर कन्या महाविद्यालय को दिया दान और सहयोग बताया जाएगा। अपने घर की सड़क का नाम नीरज के नाम पर होने की बात होगी। यहां की नुमाइश में देने वाले नीरज पुरस्कार और नीरज-शहरयार पार्क का
    उल्लेख किया जाएगा। बताते-बताते आगरा के अपने परिवार, गाजियाबाद एवं भौगांव के भाइयों के परिवारों के बरसों-बरस से चलाने की अपनी जिम्मेदारी का ध्यान हो आएगा।

    जब भावुक इटावी बने नीरज 
    संभव यह भी है कि यह सुनने को मिल जाए, ‘अब बस, थक गया हूं।’ इतना कहने के साथ वे पास बिछे पलंग पर लेट भी जाएंगे। यदि उनकी थकान को अनदेखा और कराहट को अनसुना कर अलीगढ़ से मिलने के बारे में पूछने की फिर से शुरुआत करेंगे, तो चिरपरिचित कराहट के साथ वे उठ बैठेंगे। फिर याद कर-करके नया कुछ बताते भी जाएंगे। मसलन 1942 में दिल्ली के कवि सम्मेलन में भावुक ‘इटावी’ के नाम से पढ़ी कविता ने उन्हें अखिल भारतीय बना दिया था। इटावा के दोस्तों को यह नाम नहीं जमा तो नीरज तय हुआ। नीरज नाम न्यूमरोलॉजी और कुंडली के हिसाब से भी सही रहा और इतना रास आया कि उन्हें गीतों का राजकुमार, गीत सम्राट, गीत ऋषि कहा-माना जाने लगा। 1955 में ‘कारवां गुजर गया’ गीत के पहली बार रेडियो से प्रसारित होते ही रातों-रात विश्व प्रसिद्ध हो गए। लोगों को शायद ही मालूम हो नीरज ने यह गीत द्वारकापुरी में किराए के मकान में लिखा था।

    शुरू हुआ शोहरत का सफर
    फिल्मी गीतों के लिखने के दौर का श्रेय अलीगढ़ को देने से नीरज इंकार करते हैं। वे कहते हैं कि लगभग 125-130 गीतों में से अधिकांश उन्होंने मुंबई जाकर लिखे। यह भी बहुत दिलचस्प है कि 1960 में हुई शुरुआत के बाद उन्हें 1973 में मुंबई से वापस आना पड़ा। अलीगढ़ ने वापस बुला ही लिया। नीरज के गीतकार के जिस रूप और हिस्से ने उनके कवि और जीवन को प्रसिद्धि के एवरेस्ट तक पहुंचा दिया, गीतों की उस दुनिया में नीरज का पहली बार पदार्पण अलीगढ़ में रहते 8 फरवरी 1960 में ‘नई उमर की नई फसल’ से होता है। फिल्मों के सिलसिले से मुंबई जाते रहने का यह दौर 1973 तक चला।

    आध्यात्मिकता से गहरा जुड़ाव
    अरविंद, ओशो, आनंदमयी मां, मेहरबाबा, प्रबोधानंद, स्वामी श्याम, मुक्तानंद आदि आध्यात्मिक संतों का सान्निध्यनैकट्य यहीं रहकर प्राप्त होने की बात नीरज सहर्ष मान लेते हैं। यह बताना भी नहीं भूलते कि उन्होंने ‘शांतिलोक’ नाम से ‘कामायनी’ की तरह का एक महाकाव्य लिखने की शुरुआत भी अलीगढ़ में की थी, मगर अपेक्षित चैन और शांति न मिल पाने के चलते वह पूरा नहीं हो पाया। अलीगढ़ में रहते हुए बने प्रेम संबंधों तथा दूसरे दांपत्य की बात पर कोई विरोध नहीं, तुरंत बेहिचक स्वीकारते हैं। दोस्तों की बाबत पूछो तो कहा जाएगा,
    ‘दोस्ती करने-निभाने की फुर्सत नहीं मिली। लोकप्रियता ने ऐसी दुश्मनी निभाई कि ईष्र्या का शिकार होते रहे।’ ज्यादा कुरेदने पर कृतज्ञ भाव से दो नामों का उल्लेख करते हैं, एक कॉलेज के तत्कालीन प्राचार्य ए.जी. झिंगरन, दूसरे डॉ. जी.के. गहराना। जो धर्म समाज कॉलेज में हुई नियुक्ति में सहायक बने थे।

    अलीगढ़ की अनमोल देन
    नीरज की अलीगढ़ में हुई एक और महत्वपूर्ण व अनमोल प्राप्ति के बारे में कम लोगों को ही पता है। वह प्राप्ति है सिंगसिंग का उनके घर आना। वो खुद से नीरज के पास नहीं आया था, पत्नी की मृत्यु के बाद नीरज उसे लाए थे। 2000 की बात है, तब सोलह-सत्रह साल का बेहद परिश्रमी, विनीत, खूबसूरत किशोर था सिंगसिंग। यहां आते ही पूरी जिम्मेदारी संभाल ली। नीरज को नहलाना-धुलाना, खान-पान, घर की सफाई, रंगाई, नल-बिजली आदि का जिम्मा उसने ले लिया। घर के मामलों में कई बार तो नीरज पर भी उसका हुक्म चलने लगा। उसके रहते नीरज को बाहर जाने-रहने के दिनों में घर की चिंता से मुक्ति मिल गई। बेहतरीन रसोइया वह था ही, धीरे-धीरे उनका ए.डी. सी., मैनेजर, सलाहकार और ड्राइवर भी बन गया। नीरज को एक पिता की तरह उसकी शादी की चिंता हुई तो नीरज उसके लिए पत्नी ले आए। रघुवीर सहाय इंटर कॉलेज में उसकी नौकरी लगवा दी। सिंगसिंग दो बच्चों का पिता है। बच्चे नीरज का खेल-खिलौना और नीरज बच्चों के बाबा हैं। सिंगसिंग भी उन्हें बाबा ही कहता है। नीरज की इतनी उम्र और ऐसी हालत में अच्छे पितृभक्तों से ज्यादा प्रसन्न मन, भक्ति-भाव से सेवा में रहता है।
    अलीगढ़ में रहते हुए नीरज को जो मिला, उस सबके बावजूद यदि सिंगसिंग न मिला होता, तो तय है कि उनके जीवन के पिछले सत्रह साल अकेलेपन, लाचारी के बोध से नितांत मुक्त और इतनी आश्वस्ति और निश्चिंतता के साथ तो नहीं बीते होते।
    कृष्णाधाम कॉलोनी, आगरा रोड अलीगढ़ (उ.प्र.)