नई दिल्ली। झक सफेद धोती कुर्ता, न कोई दाग न सिलवट। यह पहनावे की बात है। लेकिन केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह का सबसे ज्यादा ध्यान इसपर होता है कि धोती कुर्ता की तरह उनके व्यक्तिगत और राजनीतिक जीवन पर भी विवादों का कोई धब्बा न पड़े। दरअसल विवादों से दामन बचाने की कला कोई केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से सीखे। उत्तर प्रदेश में संगठन के अध्यक्ष पद से ले कर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के उनके तीन कार्यकालों में ऐसा नहीं कि विवाद न उठे हों, लेकिन इन विवादों की खरोंच या दाग उन्होंने अपने दामन पर नहीं लगने दिया। पिछले लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने उन्हें अपना कप्तान माना था। संगठन छोड़ वह सरकार में आए तो नंबर-दो हैं। उनका मानना है कि लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष का एक स्थान होता है लेकिन विपक्ष अपनी गलत नीतियों के कारण ही धरातल में समाता जा रहा है। राजनाथ का स्वभाव शांत और संयत रहने का है। राजनाथ सिंह से जब पूछा गया कि सरकार के दो साल के काम-काज को वह कैसे आंकते हैं, तो उनका दो टूक जवाब था महज दो सालों में किसी भी सरकार से आप जो भी उम्मीदें रख सकते है, वह सरकार ने पूरी की हैं। ऐसा नहीं कि सारे वादे पूरे हो गए हों, अभी बहुत कुछ करना बाकी है।

दैनिक जागरण के वरिष्ठ कार्यकारी संपादक प्रशांत मिश्र और राष्ट्रीय उप ब्यूरो प्रमुख आशुतोष झा से उन्होंने सरकार के दो साल और देश की राजनीति पर लंबी चर्चा की। पेश हैं उसके कुछ अंश:

सरकार के दो साल पूरे हो गए हैं। उपलब्धियों की चर्चा की जा रही है। आप अपनी सरकार को कितने नंबर देंगे?

(थोड़ा रुक कर सोचने के बाद) स्वयं अपनी सरकार के बारे में मार्किग करना तो ठीक नहीं लेकिन आप जोर देंगे तो मैं पूरे 10 नंबर दूंगा। मैं आश्वस्त करता हूं कि यह मार्किग निराधार नहीं है। दो साल के अंदर भारत जैसे बड़े देश के विकास के लिए सब कुछ तो किया नहीं जा सकता है। लेकिन जैसा हम लोगों ने सोचा है उस दिशा में तेजी से बढ़ रहे हैं। बहुत कुछ किया है और जो कुछ बचा है वह पूरा कर देंगे।

लेकिन दस में दस नंबर कुछ ज्यादा नहीं है.?

नहीं, इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। जो हमारे प्रधानमंत्री की प्रतिबद्धता है उसमें यह नंबर ज्यादा नहीं हैं। मैं ने देखा है कि वह कल्पनाशील हैं और पूरा समय जनता के हितों की चिंता भी करते हैं। दो साल में उन्होंने ऐसे हालात पैदा किए हैं जिसमें पूरा विश्व भारत की धाक मानने लगा है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय आर्थिक माहौल बहुत उत्साहव‌र्द्धक नहीं है। भारत की विकास दर जो छह फीसद तक चली गई थी उसे दो वर्ष में 7.9 तक लाना क्या सामान्य बात है? जो दिशा हमने तय की है उसमें आश्चर्य नहीं कि अगले तीन चार वर्षो में भारत की आर्थिक वृद्धि दर दो अंकों में होगी। कांग्रेस काल का कुप्रबंधन खत्म हुआ है, प्राकृतिक संसाधनों की लूट पर रोक लगी है, फैसलों में तेजी आई है, व्यवस्था दुरुस्त हुई है, जनहित से जुड़े छोटे छोटे काम को भी प्राथमिकता के स्तर पर किया जा रहा है। समाज का कोई वर्ग अछूता नहीं रहा है। भविष्य सुनिश्चित करने का सार्थक प्रयास किया गया है। एक साथ कई मोर्चो पर कदम उठाए गए हैं और नतीजे दिखने लगे हैं। जब काम सर्वोत्कृष्ट हो तो नंबर भी वैसे ही मिलते हैं।

सरकार में आप नंबर दो की स्थिति में हैं तो कठोरता से समालोचना भी जरूरी है। क्या ऐसा कुछ भी नहीं है जहां कमी रह गई?

मैं ऐसा नहीं कह रहा हूं। रोजगार की समस्या है जिसे लेकर हमें और ठोस कदम उठाने होंगे। हमने स्वरोजगार पर ज्यादा ध्यान दिया है। सरकार चाहती है कि हर किसी को उसकी योग्यता के अनुसार अवसर मिले। इस सोच के अनुरूप ही काम प्रारंभ किया है। सभी नौजवानों को सरकारी नौकरी नहीं दी जा सकती है। उसके हुनर को विकसित करने और विश्वास का भाव पैदा करना है। सरकार बनते ही प्रधानमंत्री जी ने स्किल डेवलपमेंट पर ध्यान दिया। मुद्रा बैंक के माध्यम से स्वरोजगार का रास्ता निकाला गया। आगे और तेजी लाएंगे।

कश्मीर में आतंकी घटनाएं कम हुई हैं लेकिन घाटी में उनको मिलने वाला समर्थन नहीं रुका और कश्मीरी पंडितों की घर वापसी अभी तक नहीं हुई है?

पंडितों को पुनर्वासित करने के लिए फंड तो आवंटित किया जा चुका है। जब मुफ्ती साहब वहां के मुख्यमंत्री थे तो उनसे मेरी बात हुई थी और जमीन उपलब्ध कराने पर उन्होंने आश्वासन भी दिया था। उनके निधन के कारण थोड़ा अवरोध हुआ। महबूबा मुफ्ती से फिर बात हुई है। जमीन उपलब्ध होते ही कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास का काम शुरू हो जाएगा। जहां तक आतंकियों को मिलने वाले समर्थन की बात है, मुझे नहीं लगता है कि सभी लोग आतंकियों का समर्थन करते हैं। फिर भी सरकार की कोशिश है कि ऐसे लोगों के अंदर भी जो आशंकाएं हैं उन्हें दूर किया जाए।

आप गृहमंत्री हैं। क्या चूक हुई कि पठानकोट जैसी घटनाएं हो गईं जिसे शायद रोका जा सकता था?

दो घटनाएं हुईं.पठानकोट और गुरदासपुर में। लेकिन दूसरा पहलू भी देखिए। हम सभी आतंकियों को मार गिराने में सफल रहे। पठानकोट में सुरक्षा जवान भी शहीद हुए लेकिन स्ट्रैटेजिक इंसटॉलमेंट को नष्ट नहीं होने दिया। आतंकवाद किसी एक देश की चुनौती नहीं रह गई है। यह वैश्विक चुनौती है और पूरे विश्व को एकजुट होना पड़ेगा। प्रधानमंत्री जहां भी जा रहे हैं वह उन देशों को भी इस लड़ाई में शामिल कर रहे हैं। पाकिस्तान भी इस अंतरराष्ट्रीय दबाव से नहीं बच पाएगा। पाकिस्तान को मैं इतना ही कहूंगा कि अगर वह स्वयं आतंकी गतिविधियों को रोकने में सक्षम नहीं है तो भारत मदद के लिए तैयार है।

पाकिस्तान भारत के अपराधियों की शरणस्थली बना हुआ है। 1993 के मुंबई हमले से लेकर पठानकोट तक के आरोपी को हम सजा दिलाने में अब तक सफल नहीं हुए हैं?

विश्व के कई देशों में इस प्रकार की स्थिति बनी है। दाउद जैसे लोग अंतरराष्ट्रीय अपराधी है और पाकिस्तान को उनके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी पाकिस्तान पर दबाव बनाना चाहिए।

छोटा राजन का प्रत्यर्पण तो आपकी सरकार ने कर लिया, लेकिन दाउद को लेकर कहां मजबूर हो जाते हैं?

हम हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठे हैं। प्रयास चल रहा है। दाउद के खिलाफ जितने सबूत थे हमलोगों ने पाकिस्तान को दिया है। पाकिस्तान या तो उसे हमारे सुपुर्द करे या फिर खुद कार्रवाई करे। जैसी हमारी अपेक्षा रही है पाकिस्तान की ओर से उतना समर्थन नहीं मिला है। हमारा प्रयास जारी है।

भाजपा आतंक के खिलाफ सख्ती की बात तो करती रही है लेकिन एक धर्म विशेष के आरोपियों के बचाने का भी आरोप लगता रहा है.?

जैसे..

हाल में साध्वी प्रज्ञा बरी हो गईं, कांग्रेस ने इस बड़ा मुद्दा बनाया है।

एनआइए एक स्वायत्तशासी जांच एजेंसी है। हम उन्हें पूरी स्वतंत्रता देने के पक्षधर हैं। साध्वी प्रज्ञा के बाबत एनआइए ने जो कुछ पाया है उसी के आधार पर रिपोर्ट है। सरकार ने किसी स्तर पर कोई हस्तक्षेप नहीं किया है। हमलोगों ने एनआइए को इतना स्वायत्त बनाया है कि अब उसे कानूनी राय लेने के लिए कोई फाइल गृहमंत्रालय भेजने की जरूरत नहीं है। पहले ऐसा हुआ करता था। अब वह सीधे कानून मंत्रालय से राय ले सकता है।

नक्सलवाद के आंकडे़ तो उत्साहव‌र्द्धक हैं लेकिन गढ़चिड़ौली में घटनाओं पर लगाम नहीं लगी। क्या कारण है?

ऐसे नहीं है। पिछले दस पंद्रह वर्षो का रिकार्ड उठाकर देख लीजिए, माओवाद और नक्सलवाद अपने निम्नतम स्तर पर है। उत्तर पूर्व में भी अब मामूली असर है।

आइएसआइएस का प्रभाव भारत में बढ़ रहा है। पिछले दिनों में कुछ वीडियो भी आए हैं। आप कितने चिंतित हैं?

मैं पहले भी बोलता रहा हूं कि भारत में उनका प्रभाव नहीं बढ़ा है। चिंता की बात है। इक्के दुक्के नौजवान गिरफ्तार भी हुए हैं, कुछ लोगों पर नजर रखी गई है, लेकिन यह कह सकता हूं कि यहां का मुस्लिम किसी भी सूरत में आइएसआइएस के प्रभाव का स्वीकार नहीं करेगा। वह पैर जमाने का अवसर नहीं पाएगा।

आप तो भाजपा के स्टार कैंपेनर हैं। अब आपके गृहराज्य उत्तर प्रदेश में चुनाव है। क्या विश्वास है कि भाजपा का वनवास खत्म होगा?

हां विश्वास है। हम असम में जीते हैं, उससे पहले हरियाणा, महाराष्ट्र में जीते, तमिलनाडु और केरल में हमारा वोट फीसद बढ़ा है। हम काम कर रहे हैं और लोग पसंद कर रहे हैं तो विश्वास क्यों न हो?

इन सारी जीत के बावजूद यह भी तो सच है कि पड़ोसी राज्य बिहार में भाजपा की शिकस्त हुई थी। बिहार और उत्तर प्रदेश पड़ोसी भी है और मिजाज भी एक जैसे हैैं?

बिहार और दिल्ली में हमें अपेक्षित नतीजा नहीं मिला था और उसकी समीक्षा कर हमने कमियों को सुधारा है। जहां तक उत्तर प्रदेश का सवाल है, हमें स्पष्ट बहुमत मिलेगा।

क्या कमी थी जिसको सुधारा गया है?

वह हमारी अंदरूनी समीक्षा का विषय है।

उत्तर प्रदेश में भाजपा की लड़ाई किसके साथ होगी?

अलग अलग स्थानों पर अलग अलग दलों के साथ लड़ाई होगी। कहीं सपा सामने होगी कहीं बसपा। कांग्रेस की तो प्रासंगिकता नहीं है। मैं यह जरूर कहूंगा कि हर दल की लड़ाई भाजपा से होगी। और लोग जाति, धर्म, पंथ की सीमाएं तोड़कर उसे ही समर्थन देंगे जो अच्छी सरकार दे सके। भाजपा ने खुद को साबित किया है। भाजपा शासित किसी भी राज्य का रिकार्ड यह बताता है। हमारी सरकार की संवेदनशीलता का अहसास लोगों को है।

वनवास खत्म करने की अपील तो करते हैं लेकिन राम को भूल गए हैं। हर नेता यह जोर देकर कह रहा है कि राम मंदिर हमारा मुद्दा नहीं है?

राम को कोई कैसे भूल सकता है। वह तो हमारी आस्था के केंद्र हैं। और इललिए हम उन्हें चुनावी मुद्दा नहीं मानते हैं। मामला सबज्यूडिस है। हम इंतजार कर रहे हैं। हमारा चुनावी मुद्दा विकास है।

आप तीन बार पार्टी के अध्यक्ष रह चुके हैं। आपको क्या लगता है चुनाव में मुख्यमंत्री चेहरा के साथ जाना फायदेमंद होता है या बिना चेहरे के?

(हंसते हुए) यह राज्य की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। किसी राज्य मे हम प्रोजेक्ट करते हैं.हरियाणा और महाराष्ट्र में हमने प्रोजेक्ट नहीं किया फिर भी जीते। असम में हमने प्रोजेक्ट किया। यह रणनीति का हिस्सा होता है।

उत्तर प्रदेश के तो आप चप्पे चप्पे से और हर मिजाज से वाकिफ हैं। वहां क्या फायदेमंद होगा?

(रहस्यमयी मुस्कान के साथ) 1991 में हमलोगों ने कोई चेहरा प्रोजेक्ट नहीं किया लेकिन स्पष्ट बहुमत मिला। प्रोजेक्ट करके भी चुनाव लड़े। उसके भी अलग अलग परिणाम आए।

क्या अखिलेश यादव और मायावती के मुकाबले एक राय से कोई चेहरा पार्टी में नहीं है?

ऐसा नहीं है। हमारे पास बहुत से योग्य चेहरे हैं। लेकिन मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करना है या नहीं और किसे, यह तो संसदीय बोर्ड फैसला करेगा। अब तक कोई चर्चा नहीं हुई है। इतना जरूर कहूंगा कि अगर बोर्ड ने चेहरा प्रोजेक्ट करने का फैसला लिया तो हम ऐसे व्यक्ति को उतारेंगे जो जनता में स्वीकार्य हो और अच्छा शासन देने की क्षमता रखता हो।

भाजपा नेतृत्व पर यह आरोप लगता है कि कहीं भी दूसरी पंक्ति के नेतृत्व को बढ़ावा नहीं दिया गया। बढ़ने का पूरा अवसर नहीं दिया। आप कैसे देखते हैं?

(काफी देर तक हंसते हैं)ऐसा नहीं होता है। अखिल भारतीय स्तर पर देखिए तो अटल जी आडवाणी जी थे लेकिन मोदी जी उभर कर आए। कोई किसी की ग्रूमिंग को रोकता नही हैं और राजनीति में ग्रूमिंग करने जैसी बात नहीं होती है। हम लोग भी आगे बढ़कर आए तो कैसे आए। अगर आप उत्तर प्रदेश की बात कर रहे हैं तो वहां नेताओं की कमी नहीं है। ऐसे कई लोग हैं जिन्हें मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में प्रोजेक्ट किया जा सकता है।

संघीय ढांचे को लेकर वर्तमान सरकार खूब दावे करती रही है लेकिन पिछले पांच छह महीनों मंें ही अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में जिस तरह की राजनीतिक घटनाएं हुई उससे तो आप पर यह आरोप लगा कि संघीय ढांचे कमजोर हो रहे हैं?

उत्तराखंड हो या अरुणाचल, भाजपा ने तो वहां कोई संकट पैदा नहीं किया। राजनीतिक विरोधी बोलते रहेंगे। लेकिन सच्चाई तो यह है कि दोनों की मामलों में कांग्रेस नेतृत्व अपने अंदरूनी संकट से नहीं उबर पाया। कांग्रेस के ही लोगों ने पार्टी के खिलाफ विद्रोह कर दिया। इसमें भाजपा कहां आती है। अरुणाचल प्रदेश में दो तिहाई विधायक अलग हो गए और चूंकि वह सबसे बड़ी पार्टी बन गए थे इसीलिए भाजपा ने उनकी सरकार को समर्थन दिया ताकि राजनीतिक संकट न पैदा हो। हम पर गलत आरोप लगाया जाता है। प्रधानमंत्री जी की हमेशा कोशिश रही है कि संघ और राज्य के रिश्ते मजबूत हों ताकि विकास को गति मिले। हमारी सरकार ने ही इसी मंशा से राज्यों को ज्यादा ह्सि्सा भी दिया। अब हमीं पर उंगली उठाई जा रही है।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की ओर से लगाए गए राष्ट्रपति शासन को कुछ देर के हटाकर विधानसभा में मतदान कराया। क्या उससे केंद्र सरकार के फैसले पर सवाल खड़ा नहीं हुआ?

नहीं, सुप्रीम कोर्ट का पूरा फैसला अभी आने वाला है। और फिर केंद्र सरकार तो राज्यपाल की सिफारिशों के आधार पर काम करती है। वहां से कुछ बाते हमारे सामने रखी गई और हमने राज्य की भलाई में एक निर्णय लिया। हर पहलू को ध्यान में रखकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या आता है वह देखेंगे।

सरकार पर सामाजिक असहिष्णुता और राजनीतिक असहिष्णुता दोनों का आरोप लगता है?

सरासर गलत आरोप है। राजनीतिक असहिष्णुता के आरोप का तो मैंने जवाब दे दिया है। रही बात सामाजिक की तो यह भाजपा के खिलाफ ऐसी साजिश लंबे वक्त से चलती रही है। मैं चुनौती देता हूं कि कोई भी एक भी ऐसा उदाहरण साबित करे कि भाजपा सरकार समाज में नफरत फैलाने का काम करती है। यह किसी के बूते की बात नहीं है। जो ध्रुवीकरण की राजनीति पर केवल सरकार बनाना चाहते हैं वही ऐसा करते हैं। इसीलिए आपने देखा होगा कि जब कभी चुनाव का वक्त आता है तो कुछ दल एकजुट होकर भाजपा के खिलाफ ऐसे आरोप लगाते हैं। फिर धीरे धीरे ऐसी आवाजें आनी बंद हो जाती है। यह राजनीतिक दलों और उनसे प्रभावित कुछ लोगों का षड़यंत्र है। समाज में भाजपा के खिलाफ ऐसी कोई भावना नहीं है और दावे के साथ कह सकता हूं कि जमीन पर हर वर्ग और संप्रदाय का व्यक्ति भाजपा को उसकी विकास की राजनीति के लिए वोट देता है। हम जनता को धर्म की सीमाओं में बांधकर नहीं देखते हैं लेकिन आपने सवाल पूछ लिया है तो असम में देख आइए कि मुस्लिम भाईयों ने कितना बढ़ चढ़कर वोट दिया। असम में भी भाजपा को इस कठघरे में खड़ा करने की कोशिश हुई थी लेकिन जनता ने ही आरोप अस्वीकार कर दिया।

आरएसएस के अनुषांगिक संगठन खुलेआम हथियारों की ट्रेनिंग दे रहे हैं, क्या यह ठीक है?

यह राज्य सरकार का प्रश्न है। हमने किसी राज्य सरकार को रोका है कि कोई हिंसा फैलाने की कोशिश करे, हथियारों का प्रदर्शन करे तो कार्रवाई न करे। कोई भी राज्य सरकार सामने आकर बताए। कुछ गलत हो रहा है तो राज्य सरकार कार्रवाई करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।

लेकिन आपकी पार्टी के अंदर भी तो कुछ नेता है। कुछ मंत्री भी हैं जिनके बयान से सनसनी फैलती रही है?

देखिए, ऐसे कुछ लोग हर दल में हैं। लेकिन बतौर गृहमंत्री मैं ने ही सार्वजनिक बयान दिया था कि हर कोई ऐसे बयानों से बचें। खुद प्रधानमंत्री भी इस बात से सहमत थे।

किसी भी लोकतंत्र के लिए मजबूत विपक्ष की जरूरत होती है। जिस हिसाब से कांग्रेस सिकुड़ रही है उसे कितना शुभ या अशुभ मानते हैं?

(थोड़ा सोचते हुए) मैं तो इतना आश्वस्त कर सकता हूं कि जबतक भाजपा की सरकार रहेगी जनता के शासक के रूप में नहीं बल्कि सेवक के रूप मे हम अपनी भूमिका निभाएंगे। स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष होना चाहिए, लेकिन विपक्ष यदि स्वयं ही सिकुड़ता जा रहा है तो विपक्ष को ताकत देने का काम तो करेंगे नहीं। दरअसल, सरकार जनहित से जुडे इतने अच्छे काम कर रही है कि विपक्ष उसमें अवरोध पैदा करने की कोशिश करता है तो और ज्यादा सीमित हो जाता है। वह लगातार कमजोर पड़ता जा रहा है उसके लिए उनकी राजनीतिक ही जिम्मेदार है। हम अच्छा काम कर रहे हैं यह अपराध तो हैं नहीं।

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Edited By: Atul Gupta