नई दिल्ली [यशा माथुर]। आज हर कोई अपनी जिंदगी अपने मन के मुताबिक जीना चाहता है। फिर समाज के वरिष्ठ सदस्य उन बेडिय़ों में क्यों बंधे रहें कि उम्र होने पर उन्हें सिर्फ अपने बच्चों के बच्चे पालने हैं। समय बदला है और अब ये खूब घूमते हैं। नए लोगों से मिलते हैं। खुशियां ढूंढ़ते हैं। इनके लिए दिल की खुशी मायने रखती है, उम्र तो सिर्फ एक नंबर है...

मुझे याद आती हैं अपनी देश-विदेश की वे यात्राएं जहां मैंने उम्र के 35 साल पूरे कर चुके लोगों को देश-दुनिया की नायाब जगहों के बारे में उत्सुकता से जाते देखा। चाहे उत्तर सिक्किम की 17800 फीट ऊंचाई पर स्थित गुरुडोंगमार झील हो या इटली का हेरीटेज डेस्टिनेशन पोम्पेई, हर जगह इनका उत्साह कम नहीं था। जिन जगहों पर सांस लेने में, चढने में, ट्रैकिंग करने में मुश्किल होती है, वहां भी इनका जज्बा और जिंदगी जी लेने की मस्ती देखने लायक थी। इसके लिए वे बस की सवारी कर रहे थे या ट्रेन में चढ़ कर भी जा रहे थे। यहां तक कि समुद्र के किनारे से फेरी पकड़ने या नाव में घूमने के लिए वे पानी पर हिलते-डुलते, हिचकोले खाते प्लेटफॉर्म पर पैर जमा रहे थे। असफल होने का कोई डर नहीं, बस संसार देखने की चाहत दिखती थी इनके मन में।

घूमने फिरने की उम्र आई है...

एक समय था जब 40 के पार होते ही लोग कहने लगते कि अब हम कहां घूमने जाएंगे। हमारी तो घूमने फिरने की उम्र निकल चुकी। अब तो 60 और 70 के पार के लोग भी दुनिया घूम रहे हैं। उम्र के इस मोड़ पर वे लगभग हर जिम्मेदारी को निभा चुके होते हैं। अपने मन का करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र। यह लोग अब रिटायरमेंट के बाद की उम्र दुनिया देखने में बिता रहे हैं। संस्कृति स्कूल, नोएडा से रिटायर हुईं नंदिता आहुजा 65 वर्ष की हो चुकी हैं। रिटायरमेंट के बाद उनकी यात्राओं में काफी इजाफा हो गया है।

वे कहती हैं, 'पिछले पांच साल से बहुत ट्रैवल कर रही हूं। मैं ओमान, लंदन, कीनिया, जॉर्डन सहित देश की कई सारी जगहों पर जा चुकी हूं। अधिकतर अकेले ही जाती हूं। मेरे बच्चे मेरा पूरा ट्रैवल प्लान बना देते हैं। दरअसल मेरे पति की सात साल पहले मृत्यु हो गई थी। उनके साथ साल में एक नेशनल और एक इंटरनेशनल ट्रिप पर जाती थी। उनके जाने के बाद बेटियों ने मुझे घूमते रहने के लिए प्रोत्साहित किया। उनके बाद मेरी पहली यात्रा स्वीडन की थी। मैं बहुत डर रही थी। पहली बार झिझक थी, लेकिन अब बहुत मजा आता है। मुझे लगता है कि कम समय में कितनी चीजों को देख लूं।'

सैर कर दुनिया की गाफिल जिंदगानी फिर कहां?

उर्दू के मशहूर शायर ख्वाजा मीर ने चंद लाइनें लिखीं थीं कि 'सैर कर दुनिया की गाफिल जिंदगानी फिर कहां, जिंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहां।' वे जवानी रहते दुनिया देख लेने की बात करते हैं, लेकिन अब उम्र को सिर्फ एक नंबर मानते हुए लोग अपने दम पर दुनिया देखने निकल पड़े हैं। वरिष्ठ नागरिकों की यात्राओं का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है। और तो और 'फुर्र' जैसे कई टूर ग्रुप्स 45 या 50 साल की उम्र से बड़े लोगों के लिए ही ट्रैवल का बंदोबस्त कर रहे हैं।

मां की शिकायतों से आया आइडिया

'फुर्र' ट्रैवल के फाउंडर गौरव कुमार की मां जब रिटायरमेंट के बाद घूमने जातीं और पैकेज टूर में आने वाली मुश्किलों की बात करतीं तो गौरव ने सोचा मैं क्यों न 45 से बड़ी उम्र के लोगों को सैर करवाऊं और उन्हें हर सुख-सुविधा के साथ यात्रा का मजा दूं। गौरव कहते हैं, 'हमारा ग्रुप वही ज्वाइन कर सकता है जिसकी उम्र 45 या उससे ज्यादा हो। हम बीस लोगों का छोटा ग्रुप रखते हैं, ताकि सभी को आपस में बातचीत करने का मौका मिले। बड़े ग्रुप में छोटे-छोटे ग्रुप बन जाते हैं। पूरे भारत से लोग मेरे साथ आते हैं, जो अलग भाषा और संस्कृति के होते हैं। इससे सभी को एक नई संस्कृति को जानने का मौका मिलता है। जो नए भी होते हैं वे भी एक-दो टूर के बाद आत्मविश्वास हासिल कर लेते हैं। सात दिन के टूर में हम इन्हें नई जगह लेकर जाते हैं।'

घुमंतु हो गए सीनियर सिटींजस

यूरोप यात्रा के दौरान हमारे साथ 70 साल के ऊपर की दो महिलाएं एन और फ्रेन ने यात्रा की। उन्होंने न किसी का सहारा लिया और न ही किसी का हाथ पकड़ की ऊपर चढ़ीं। घूमने में भी पीछे नहीं। इन दिनों सीनियर सिटीजंस का घुमंतु होना उन्हें जिंदगी का मजा दे रहा है। चेन्नई की रहने वाली सुधा महालिंगम 68 साल की उम्र में 6 पासपोर्ट के साथ 65 देशों की यात्रा कर चुकीं। वह मानती हैं कि यात्राएं आत्मविश्वास और साहस पैदा करती हैं। ये आपको सिखाती हैं कि मुश्किल की घड़ी में अकेले कैसे निपटना है। कोलकाता की इती घोष ने 48 साल की उम्र तक कभी कोई यात्रा नहीं की थी मगर 79 साल की उम्र आने तक उन्होंने न सिर्फ भारत का हर कोना घूम लिया, बल्कि विश्व के 25 देश घूम चुकीं। एक सूटकेस, कुछ साडिय़ां, बिंदी और पैरों में चप्पल, यही उनकी हर यात्रा के साथी हैं। मैंगलोर के जया कुमार भी 78 साल के हैं। डिफेंस में काम करने के कारण घूमने का शौक हमेशा से रहा। कभी अकेले, कभी दोस्तों के साथ तो कभी ग्रुप में ट्रैवल करते हैं। पत्नी के साथ दिल्ली, हैदराबाद, चैन्नई, पुणे जैसे हर शहर में घूम चुके हैं।

जिंदगी एंजॉय करने की है चाहत

71 साल की उम्र में लेह-लद्दाख कोई नहीं जाता लेकिन बंगलुरु के रंगन्ना शंकर वहां एंजॉय करके आए हैं। शंकर दोस्तों या ट्रैवल ग्रुप के साथ घूमने जाना पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें अलग-अलग लोगों से मिलना और बातचीत करना बहुत अच्छा लगता है। वे बताते हैं, 'मैं परिवार के लोगों के साथ नहीं जाता हूं क्योंकि उनके साथ जाने पर वही परिवार की राजनीति और मसलों पर बात होती है। ग्रुप में जब हम अनजान लोगों से मिलते हैं तो न हम धर्म की बात करते हैं न जाति की, सिर्फ यह सोचते हैं दस दिन तक कैसे खुश रहा जा सकता है।' शंकर खूब घूमते हैं और फिट भी हैं। वे मानते हैं कि अपनी जिंदगी को फुल एंजॉय करने की चाहत और ट्रैवल के लिए सहूलियतों के बहुत बढ़ जाने के कारण सीनियर्स के ज्यादा यात्राएं करने का ट्रेंड बढ़ा है।

बच्चों की तरह करते हैं मस्ती

'फुर्र' के संस्थापक गौरव कुमार कहते हैं 'एक बच्चे से ज्यादा जोश होता है इनमें। एक ही उम्र के होते हैं। कोई किसी को जानता नहीं। कोई क्या कहेगा, इसकी कोई चिंता नहीं रहती। यह बचपन की तरह जिंदगी को एंजॉय करते हैं। एक बार हम मेघालय गए। वहां डबल डेकर रूट ब्रिज है जिसके लिए आपको करीब 3000 सीढिय़ां उतर कर 2500 फीट नीचे जाना पड़ता है और इन्हें चढ़ कर वापस भी आना पड़ता है। हमारे साथ 70 की उम्र के भी लोग थे। वहां के लोकल ऑपरेटर ने बोला यह लोग नहीं कर पाऐंगे। लेकिन बीस में से बारह लोगों ने वह ट्रैक पूरा किया। मैं इन लोगों को ट्रैवल पर ले जाना एंजॉय करता हूं। जिस दिन से मैंने नौकरी छोड कर यह काम शुरू किया है उस दिन से लेकर आज तक मुझे एक दिन भी पछतावा नहीं हुआ है कि मैं यह क्या कर रहा हूं? मुझे बहुत मजा आ रहा है और मैं हमेशा यही करूंगा।

उम्र सिर्फ दिमाग की उपज है

नंदिता आहुजा (65), पूर्व अध्यापिका ने बताया, 'लद्दाख के लिए लोग बोलते थे कि वहां बहुत तबियत खराब हो जाती है। मैं वहां जाने से घबरा रही थी लेकिन फेसबुक पर ग्रुप में जाने का विज्ञापन देखा तो मैं उनके साथ चली गई। इतना अच्छा ट्रिप रहा कि मैं भूल नहीं सकती। हम सबने खूब हंसी मजाक किया। उम्र सिर्फ दिमाग की उपज है। यह सिर्फ एक नंबर है। मुझे हर जगह बहुत अच्छे लोग मिले। अनजान देशों में भी मदद मिली। मैं कहूंगी कि जो ट्रैवल का शौक रखते हैं वे उम्र की परवाह किए बिना अपना घूमना जारी रखें। हमारे देश में रिटायर लोगों को बेकार समझ लिया जाता है। जबकि मैंने लंदन में देखा कि झुर्रियां वाली महिलाएं भी शौक से घूमती हैं। बस अपनी दवाइयां रख लें और खाने-पीने का ध्यान रखें।'

एक साल में छह टूर

रंगन्ना शंकर (71) ने कहा, 'आजकल हर कोई अपनी जिंदगी जीना चाहता है क्योंकि कल का कोई भरोसा नहीं है। सीनियर्स पहले परिवार तक ही सीमित रहते थे लेकिन अब वह जमाना चला गया। अब वे अपनी इकलौती जिंदगी को मस्ती से जीना चाहते हैं। खुद को खुश रखने के लिए घूमना पसंद करते हैं। मैं बहुत ट्रैवल करता हूं। एक साल में छह टूर कर लेता हूं। मेरी फिटनेस युवाओं से भी अच्छी है। चेरापूंजी में जिस ट्रैक पर जाकर आने में युवाओं को आठ घंटे लगे उसे मैंने साढ़े तीन घंटे में पूरा किया। मैं जंक फूड को अवॉइड करता हूं। जब मैं ग्रुप में टूर पर जाता हूं तो हम सब सीनियर सिटीजंस एक-दूसरे से बहुत घुल-मिल जाते हैं। एक परिवार की तरह हम रहते हैं। इससे इतनी खुशी मिलती है कि कभी- कभी परिवार में भी नहीं मिलती। मैं 1991 में रिटायर हो गया था। तब से काफी घूम चुका हूं। ट्रैवलिंग इतनी खुशी देता है कि आपकी उम्र बढ़ जाती है।'

कभी नहीं सोचा कि उम्र हो गई

रिटायर्ड डिफेंस पर्सन जया कुमार (78) ने बताया, 'मैं तो खुद ही ड्राइव करता हूं और कई जगहों पर ड्राइव करके जाता हूं। बहुत मजा आता है हमें ट्रैवल में। कभी नहीं सोचा कि उम्र हो गई है। पांच बजे निकल जाते हैं और साढ़े सात बजे तक होटल में आ जाते हैं।'

Posted By: Amit Singh

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