काशी-मथुरा, संभल शाही और अजमेर शरीफ... मंदिर-मस्जिद विवाद पर क्या कहता है कानून?
काशी-मथुरा और अजमेर शरीफ जैसे विवादित धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों को समझने के लिए कानूनी पहलुओं को समझना जरूरी है। देश में पूजा स्थल अधिनियम 1991 क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट के फैसले और वर्तमान में अदालतों में चल रहे मंदिर-मस्जिद विवादों कौन-कौन-से है? ऐसे में यह पड़ताल का मुद्दा है कि क्या संसद कानून बना कर भारत की सांस्कृतिक धरोहरों पर...

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अगर किसी देश को नष्ट करना है तो उसकी सांस्कृतिक पहचान को खत्म कर दो। देश अपने आप नष्ट हो जाएगा। भारत पर हमला करने वाले विदेशी आक्रांताओं ने यही किया। इस्लामी आक्रांताओं ने न सिर्फ धन-संपदा लूटी बल्कि भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को खत्म करने के लिए बड़े पैमाने पर मंदिरों और धार्मिक स्थलों को तोड़ कर मस्जिदें बना दीं।
अंग्रेजों का लक्ष्य भी भारत को कमजोर बनाकर यहां के संसाधनों का दोहन करना था। इसलिए उन्होंने भी भारत की सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करने के लिए हर संभव प्रयास किए। आक्रांताओं द्वारा नष्ट किए गए धार्मिक स्थल सिर्फ धार्मिक प्रतीक नहीं हैं। एक प्राचीन सभ्यता के तौर पर इनके बिना भारत की पहचान पूर्ण नहीं होती है। अयोध्या, काशी और मथुरा इसके कुछ उदाहरण हैं।
सैकड़ों वर्षों की गुलामी के बाद आज सनातन संस्कृति का पुनरुद्धार हो रहा है। काशी, मथुरा,संभल और अजमेर दरगाह मामले में साक्ष्यों और दस्तावेजों के आधार पर भारत की सांस्कृतिक पहचान के प्रतीकों को हासिल करने का प्रयास हो रहा है।
पूजा स्थल अधिनियम,1991 देश में आजादी से पहले से मौजूद धार्मिक स्थलों के स्वरूप को बदलने की अनुमति नहीं देता है। ऐसे में यह पड़ताल का मुद्दा है कि क्या संसद कानून बना कर भारत की सांस्कृतिक धरोहरों पर आक्रांताओं के प्रभुत्व को वैधता दे सकती है?
मंदिर-मस्जिद विवाद पर क्या कहता है कानून?
साल 1991 में कानून बनाकर यह सुनिश्चित किया गया कि देश में धार्मिक स्थलों का जो स्वरूप 15 अगस्त, 1947 को था, उसे बदला नहीं जा सकेगा। लेकिन धार्मिक स्थलों को लेकर जन आकांक्षाओं को इससे दबाया नहीं जा सका था।
2023 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से इस बात की गुंजाइश बनी कि यह पता किया जा सकता था कि किसी धार्मिक स्थल का वास्तविक स्वरूप क्या और क्या बाद में इसे बदला गया है।
इसके बाद धार्मिक स्थलों के पुराने स्वरूप को बहाल करने को लेकर अदालतों में कई दावे पेश किए गए और अदालतों ने इस पर सर्वे के आदेश भी दिए। आइये जानते हैं कि पूजा स्थल अधिनियम, 1991 और अदालतों में चल रहे मंदिर मस्जिद विवाद के बारे में।
पूजा स्थल अधिनियम, 1991
साल 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहा राव की अगुआई वाली कांग्रेस सरकार ने धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों को लेकर भविष्य में होने वाले संघर्ष को रोकने के लिए पूजा स्थल अधिनियम, 1991 में पेश किया। संसद ने इस अधिनियम को पारित किया। यह अधिनियम कहता है कि किसी भी जगह का धार्मिक चरित्र, उसी रूप में संरक्षित किया जाना चाहिए, जैसा वह 15 अगस्त, 1947 को था।
विवादित ढांचे पर फैसला
2019 में उच्चतम न्यायालय ने राम जन्म भूमि मामले में अपना फैसला सुनाते हुए पूजा स्थल अधिनियम का समर्थन किया था। न्यायालय ने कहा था कि अधिनियम राजनीतिक व्यवस्था के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बचाने के लिए बनाया गया है।
न्यायालय ने अपने 1994 के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि अधिनियम का मकसद यह सुनिश्चित करना था कि ‘ इतिहास और उसकी गलतियां वर्तमान और भविष्य को दबाने के लिए उपकरण के तौर पर इस्तेमाल न की जाएं।’
फैसले में यह भी कहा गया कि अदालतें हिंदुओं के पूजा स्थलों के खिलाफ मुगल शासकों द्वारा उठाए गए कदमों से पैदा होने वाले दावों को सुनवाई के लिए स्वीकार नहीं कर सकतीं।
ज्ञानवापी पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
2023 में उच्चतम न्यायालय ने ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में वैज्ञानिक सर्वे की अनुमति दी। इससे दूसरे विवादित पूजा स्थलों पर दावे के लिए कई समूह आगे आए। ज्ञानवापी मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने मई, 2022 में कहा था कि पूजा स्थल अधिनियम किसी धार्मिक स्थल के धार्मिक चरित्र का पता लगाने से नहीं रोकता है।
अदालतों में चल रहे मंदिर- मस्जिद विवाद
- संभल शाही जामा मस्जिद- हरिहर मंदिर: उच्चतम न्यालय ने शुक्रवार को मस्जिद प्रबंधन से कहा है कि वे ट्रायल कोर्ट के आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दें।
- भोजशाला-कमाल-मौला मस्जिद: मध्य प्रदेश के धार जिले में एक ढांचे को लेकर विवाद भी उच्चतम न्यायालय पहुंच चुका है। सर्वोच्च न्यायालय ने 1 अप्रैल को भोजशाला का वैज्ञानिक सर्वे कराने के आदेश पर रोक लगाने से इन्कार कर दिया है।
काशी विश्वनाथ मंदिर-ज्ञानवापी मस्जिद
1991 में वाराणसी में अदालत में एक याचिका दाखिल करके ज्ञानवापी की जमीन काशी विश्वनाथ मंदिर को देने की मांग की गई। हिंदू पक्ष का दावा है कि जहां ज्ञानवापी मस्जिद हैं वहां पहले मंदिर था। 17 वीं सदी में मुगल बादशाह औरंगजेब ने मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। हालांकि मुस्लिम पक्ष इस बात से इनकार करता है।
कृष्ण जन्म भूमि, मथुरा
14 दिसंबर, 2023 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि मंदिर से सटी शाही ईदगाह मस्जिद का अदालत की निगरानी में सर्वे कराने की अनुमति दी। हालांकि 16 जनवरी कोे सर्वे पर रोक लगा दी गई।
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