नई दिल्ली, विवेक तिवारी। रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध में ड्रोन का जितना इस्तेमाल हो रहा है, उतना शायद ही पहले किसी युद्ध में हुआ हो। रूस ईरान में बने आत्मघाती ड्रोन 'शहीद-136' का इस्तेमाल कर रहा है, तो यूक्रेन तुर्की में बने 'बेरक्तार टीबी2' ड्रोन्स से रूस के सैन्य ठिकानों को तबाह कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में युद्ध में ड्रोन की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। संभव है कि ड्रोन ही युद्ध में निर्णायक साबित हों। भारत में नशे की खेप और आतंकियों को जरूरत का सामान पहुंचाने के लिए पाकिस्तान भी ड्रोन का प्रयोग कर रहा है।

हालांकि ड्रोन अच्छे कार्यों में भी इस्तेमाल किए जा रहे हैं। भारत में ड्रोन इंडस्ट्री तेजी से बढ़ रही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में ड्रोन इंडस्ट्री 2027 तक तीन गुना हो जाएगी, जो अभी 2.1 बिलियन डॉलर की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने 95वें मन की बात कार्यक्रम में कहा कि भारत ड्रोन के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। हाल ही हिमाचल प्रदेश के किन्नौर में ड्रोन से सेब को ट्रांसपोर्ट किया गया। सरकार का लक्ष्य 2030 तक वैश्विक ड्रोन हब बनने का है।

युद्ध में ड्रोन का इस्तेमाल

रूस और यूक्रेन के पास ऐसे ड्रोन हैं जो दुश्मन के ठिकानों को खोज कर नष्ट करने में सक्षम हैं। रूस ईरान में बने आत्मघाती ड्रोन 'शहीद-136' से यूक्रेन के संवेदनशील ठिकानों को तबाह कर रहा है। शहीद-136 एक फ्लाइंग बम है, जिसे रूस में 'गेरानियम-2' कहा जाता है। इसके अगले हिस्से में विस्फोटक लगा होता है। इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि जब तक उसे हमले के लिए कमांड न मिले, वो टारगेट पर मंडराता रहता है। टारगेट से टकराते ही विस्फोटक में धमाका होता है और ड्रोन खुद भी नष्ट हो जाता है। इस ड्रोन के पंख 2.5 मीटर लंबे होते हैं और रडार या किसी डिफेंस सिस्टम के लिए इन्हें पकड़ पाना मुश्किल होता है। दूसरी तरफ यूक्रेन की सेना के पास मुख्य रूप से तुर्की में बने 'बेरक्तार टीबी2' ड्रोन हैं। ये साइज़ में छोटे जहाज़ की तरह हैं और उनमें कैमरा भी लगा होता है। इसे लेज़र-गाइडेड बमों से भी लैस किया जा सकता है। ये ड्रोन रूसी सेना को काफी नुकसान पहुंचा रहे हैं।

लेफ्टिनेंट जनरल मोहन भंडारी कहते हैं कि आने वाले दिनों में किसी भी देश की जासूसी या युद्ध की स्थिति में ड्रोन की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। ये सभी तरह के रडार और एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा देकर अपने लक्ष्य पर हमला कर सकते हैं। इसमें किसी सैनिक की जान जाने का खतरा भी नहीं होता है। सभी देश बेहतर ड्रोन बनाने में जुटे हुए हैं। हालांकि आज भी ड्रोन बनाना काफी महंगा है। आधुनिक तकनीक के ड्रोन बनाने में काफी पैसा खर्च होता है। लेफ्टिनेंट कर्नल जेएस सोढ़ी कहते हैं कि रूस-यूक्रेन युद्ध से पहले 2020 में आर्मेनिया और अजरबैजान के युद्ध में ड्रोन का व्यापक इस्तेमाल देखने को मिला था।

भारत के विरुद्ध ड्रोन का इस्तेमाल

भारत के खिलाफ भी दुश्मन देशों की ओर से ड्रोन का इस्तेमाल बढ़ा है। नवम्बर के पहले हफ्ते में पंजाब के फिरोजपुर में भारत-पाक सीमा के करीब कई बार पाकिस्तान की ओर से ड्रोन देखे गए। बीएसएफ की फायरिंग में बड़ा ड्रोन खेत में गिर गया। अक्टूबर में अमृतसर के पास अजनाला में बीएसएफ के जवानों ने एक पाकिस्तानी ड्रोन को पकड़ा था, जो चाइना मेड था। वह 10 किग्रा. भार लेकर उड़ सकता है। माना जा रहा है कि इन ड्रोन का इस्तेमाल पाकिस्तान की ओर से भारत में नशे की खेप और आतंकियों को जरूरत का सामान पहुंचाने के लिए किया जा रहा है।

लेफ्टिनेंट कर्नल जेएस सोढ़ी के अनुसार जरूरत को ध्यान में रख भारत ने भी इजराइल से हेरॉन ड्रोन के लिए समझौता किया है। इसे दुनिया के बेहतरीन ड्रोन में से एक माना जाता है। दरअसल आज ड्रोन हर वो काम कर रहे हैं जिसके लिए पहले सैनिकों को जान जोखिम में डालना पड़ता था। आज ड्रोन से बम बरसाए जा सकते हैं, गोलियां चलाई जा सकती हैं, यहां तक कि दुश्मन कि इलाके से घायल सैनिक को निकालने में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।

लेफ्टिनेंट कर्नल सोढ़ी के मुताबिक सभी देश अपने एयर डिफेंस सिस्टम को अपडेट करने में लगे हैं क्योंकि ड्रोन काफी नीचे उड़ता है और उसे एयर डिफेंस सिस्टम के जरिए पकड़ पाना मुश्किल है। आने वाले समय में जिस भी देश के पास बेहतरीन ड्रोन होंगे निश्चित तौर पर युद्ध में उसकी मजबूत स्थिति होगी।

भारत की ड्रोन इंडस्ट्री का आकार 2027 तक तीन गुना हो जाएगी

भारत में ड्रोन इंडस्ट्री अभी अपनी प्रारंभिक अवस्था में है, लेकिन ये इंडस्ट्री काफी तेजी से बढ़ रही है। MarketsandMarkets की एक रिपोर्ट के अनुसार, फिलहाल ड्रोन एनालिटिक्स मार्केट 2.1 बिलियन डॉलर का है, 2027 तक इसके 6.5 बिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। भारत में कृषि, खनन, तेल, गैस और रियल एस्टेट जैसे उद्योगों में ड्रोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। पिछले कुछ समय में भारत में कई ड्रोन कंपनियां उभरी हैं। ड्रोन में एआई तकनीक, जीपीएस और ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ा है। कुछ कंपनियां ड्रोन के जरिए परिवहन सुविधा तैयार करने में भी जुटी हैं।

Vinata AeroMobility के सीईओ योगेश रामनाथन कहते हैं कि ड्रोन इंडस्ट्री में रोज नई तकनीक आ रही है। दुनिया के कई देशों में यात्रा के लिए ड्रोन के इस्तेमाल की संभावनाओं पर काम किया जा रहा है। भारत में भी सरकार ड्रोन इंडस्ट्री को काफी प्रोत्साहित कर रही है। जरूरत है कि भारत में इस इंडस्ट्री में फाइनेंस या आर्थिक मदद के लिए एक इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाए।

उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने हाल ही एक कार्यक्रम में कहा कि 12 केंद्रीय मंत्रालय ड्रोन सेवाओं की घरेलू मांग को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं। भारत को आने वाले वर्षों में लगभग एक लाख ड्रोन पायलटों की आवश्यकता होगी। ऐसे में आने वाले समय में ड्रोन इंडस्ट्री में बड़े पैमाने पर युवाओं को रोजगार मिल सकेगा।

देश में बन रहे वर्टीपोर्ट

गुजरात सरकार अहमदाबाद के हंसोल में वर्टीपोर्ट बना रही है। इसका इस्तेमाल एयर टैक्सी चलाने के लिए किया जाएगा। वहीं मेडिकल इमरजेंसी में मानव अंगों या अन्य मेडिकल इक्यूपमेंट्स को कुछ ही मिनटों में एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने के लिए इस वर्टीपोर्ट का इस्तेमाल किया जाएगा।

इस वर्टीपोर्ट से वर्टिकल लैंडिंग और टेकऑफ हो सकेंगे। मतलब यहां रनवे नहीं बनाया जाएगा। यहां खड़े ड्रोन और छोटे हेलिकॉप्टर अपनी जगह से ही उड़ान भरेंगे।

वर्टीपोर्ट पर कई चार्जिंग बे बने होंगे जहां खड़े ड्रोन को चार्ज किया जा सकेगा। यहां ड्रोन के लिए कई हैंगर भी होंगे। वर्टीपोर्ट के साथ ही शहर में आने वाले समय में कई जगहों पर वर्टीस्पॉर्ट बनाए जाएंगे जहां ये ड्रोन उतरेंगे। इन्हें बिल्डिंगों की छत पर और खुली जगहों सहित एयरपोर्ट पर बनाया जाएगा। वर्टीपोर्ट पर ड्रोन में सामान के तेजी से लोडिंग और अनलोडिंग की सुविधा भी होगी।

वर्टीपोर्ट की डिजाइनिंग और ऑपरेशन के लिए गुजरात स्टेट एविएशन इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी लिमिटेड (GUJSAIL) ने पूरा प्लान तैयार किया है। GUJSAIL के सीईओ कैप्टन अजय चौहान ने बताया कि वर्टीपोर्ट एविएशन का फ्यूचर है। इसी को ध्यान में रखते हुए गुजरात सरकार ने देश का पहला वर्टीपोर्ट गुजरात के अहमदाबाद में बनाने की योजना तैयार की है। इसके लिए कंसल्टेंट भी हायर कर लिया गया है। काम शुरू हो चुका, लेकिन इसे पूरी तरह ऑप्रेशनल होने में कुछ साल लगेंगे।

दुनिया का पहला इलेक्ट्रिक वर्टीपोर्ट यूके में शुरू किया गया है। यूके की कंपनी अर्बन-एयर पोर्ट ने ये वर्टीपोर्ट शुरू किया है। ये वर्टीपोर्ट भविष्य में यूके के लोगों की स्वचलित ड्रोन और एयर टैक्सी जैसी जरूरतों को पूरा करने के लिए पूरी तरह से तैयार है। यूके में जिस जगह पर ये वर्टीपोर्ट बनाया गया है वहां से देश के किसी भी हिस्से में अधिकतम 4 घंटे में पहुंचा जा सकता है। अर्बन-एयर पोर्ट 2024 से फ्लाइंग टैक्सी की सुविधा शुरू करने का भी प्रयास कर रही है। कंपनी की योजना अगले पांच सालों में दुनिया भर में इस तरह के 200 वर्टीपोर्ट बनाने की है।

पहली बार ड्रोन से दवा की हुई डिलीवरी  

मेघालय देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है जहां ड्रोन के जरिए दवाओं की डिलीवरी शुरू हुई है। पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू हुई इस योजना के कामयाब रहने के बाद अब देश के दूसरे हिस्सों में भी इसे लागू करने पर विचार किया जा रहा है। मेघालय के पश्चिमी खासी हिल्स जिले में पहली बार एक ड्रोन ने 25 मिनट में 25 किलोमीटर की दूरी तय कर नोंगस्टोइन से मावेत स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक जीवनरक्षक दवाओं की सफलतापूर्वक डिलीवरी कर इतिहास रच दिया। 

भारत बनेगा वैश्विक ड्रोन हब

केंद्र सरकार के मुताबिक भारत में 2030 तक वैश्विक ड्रोन हब बनने की क्षमता है। आधुनिक तकनीक, बेहतर इंजीनियरिंग, इनोवेशन और सरकार की ओर से दिए जा रहे आर्थिक प्रोत्साहन से ये संभव हो सकेगा। ड्रोन अर्थव्यवस्था के लगभग सभी क्षेत्रों में जबरदस्त फायदा पहुंचा सकता है। इनमें कृषि, खनन, बुनियादी ढांचा, निगरानी, डिजास्टर मैनेजमेंट, परिवहन, मैपिंग और रक्षा क्षेत्र शामिल हैं। ड्रोन अपनी पहुंच, बहुमुखी इस्तेमाल और उपयोग में आसानी के कारण विशेष रूप से भारत के दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों में रोजगार और आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

सरकार ने बनाई ड्रोन नीति

केंद्र सरकार ड्रोन उद्योग को बढ़ावा देने के लिए कई प्रयास कर रही है। इसके लिए पॉलिसी भी बनाई गई है, जिसके मुख्य बिंदु हैं-

1. कई तरह के लाइसेंस और सर्टिफिकेट में राहत दी गई है जिनमें यूनीक ऑथोराइजेशन नंबर, यूनिक प्रोटोटाइप आइडेंटिफिकेशन नंबर, सहमति प्रमाण पत्र, रखरखाव का प्रमाण पत्र, ऑपरेटर परमिट, अनुसंधान और विकास संस्थान की मंजूरी, ट्रेनी के लिए रिमोट पायलट लाइसेंस, रिमोट पायलट प्रशिक्षण की मंजूरी, ड्रोन के पुर्जों के आयात की मंजूरी शामिल हैं।

2. नई ड्रोन पॉलिसी के तहत 500 किलो तक भार उठा सकने वाले ड्रोन इस्तेमाल करने की मंजूरी दी गई है। इसके जरिए ड्रोन टैक्सी को बढ़ावा देने का लक्ष्य।

3. ड्रोन के लिए फॉर्म/मंजूरियों की संख्या 25 से घटाकर 5 की गई। किसी ड्रोन का रजिस्ट्रेशन कराने या लाइसेंस हासिल करने के लिए अब सुरक्षा एजेंसियों की मंजूरी की जरूरत नहीं। मंजूरी के लिए फीस भी सिर्फ नाममात्र की है।

4. ड्रोन पॉलिसी 2021 के तहत कोई नियम तोड़ने पर अधिकतम जुर्माना 1 लाख रुपए तक रखा गया है।

5. सरकार ड्रोन की उड़ान का रास्ता तय करने के लिए 'डिजिटल स्काई प्लेटफॉर्म' बनाया जा रहा है। इसमें ग्रीन, येलो और रेड जोन के बारे में बताया जाएगा। सभी ड्रोन का इस पर ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन अनिवार्य।

6. पॉलिसी के तहत येलो जोन को पहले एयरपोर्ट से 45 किमी की दूरी तक तय किया गया था, इसे घटाकर एयरपोर्ट से 12 किमी तक किया गया है। एयरपोर्ट से इस दायरे में ज्यादा ऊंचाई पर ड्रोन उड़ाने के लिए मंजूरी की जरूरत बरकरार। हालांकि, एयरपोर्ट के 8 से 12 किमी दायरे में 200 फीट तक ड्रोन उड़ाने के लिए भी नहीं लेनी होगी इजाजत। ग्रीन जोन में ड्रोन उड़ाने के लिए किसी तरह की मंजूरी की जरूरत नहीं।

7. ड्रोन के लेन-देन और डिरजिस्ट्रेशन के लिए आसान प्रक्रिया। मौजूदा ड्रोन के नियमितीकरण के लिए आसान मौके। साथ ही गैर-वाणिज्यिक इस्तेमाल में लाए गए नैनो ड्रोन और माइक्रो ड्रोन (छोटे ड्रोन) के लिए किसी पायलट लाइसेंस की जरूरत नहीं।

8. ड्रोन उड़ाने की ट्रेनिंग और एग्जाम के लिए ड्रोन स्कूल की मंजूरी जरूरी दी गई है। इसके लिए DGCA की तरफ से मदद दी जाएगी और ड्रोन स्कूलों पर नजर रखने के साथ पायलट लाइसेंस भी ऑनलाइन देने की सुविधा होगी। 

9. डीजीएफटी, ड्रोन आयात के नियम बनाएगी। कार्गो डिलीवरी के लिए ड्रोन के कॉरिडोर तैयार किए जाएंगे।

10. नो परमिशन-नो टेक ऑफ (एनपीएनटी), रियल टाइम ट्रैकिंग, जियो फेंसिंग, जैसी सुरक्षा खूबियों पर आगे जारी होंगे नियम। इनके पालन के लिए दिया जाएगा कम से कम छह महीने का समय।

सरकार ने किए कुछ अन्य सुधार

- ड्रोन एयरस्पेस मैप 24 सितंबर, 2021 को प्रकाशित किया गया, जिसमें 400 फीट तक उड़ने वाले ड्रोन के लिए लगभग 90 प्रतिशत भारतीय हवाई क्षेत्र को ग्रीन जोन के रूप में खोल दिया गया है।

- ड्रोन के लिए प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) योजना 30 सितंबर, 2021 को अधिसूचित की गई है

- यूएएस ट्रैफिक मैनेजमेंट (यूटीएम) पॉलिसी फ्रेमवर्क 24 अक्टूबर, 2021 को प्रकाशित किया गया है

- 22 जनवरी, 2022 को केंद्रीय कृषि मंत्रालय द्वारा कृषि ड्रोन की खरीद के लिए अनुदान दिए जाने की घोषणा की गई

- ड्रोन पॉलिसी  2021 के तहत सभी पांच आवेदन फॉर्म डिजिटल स्काई प्लेटफॉर्म पर 26 जनवरी, 2022 को ऑनलाइन किए गए हैं

- ड्रोन प्रमाणन योजना को 26 जनवरी, 2022 को अधिसूचित किया गया, जिससे ड्रोन निर्माताओं द्वारा टाइप प्रमाणपत्र प्राप्त करना आसान हो गया है।

- 1 फरवरी, 2022 को केंद्रीय बजट के हिस्से के रूप में ड्रोन स्टार्टअप्स को समर्थन देने और ड्रोन-ए-ए-सर्विस को बढ़ावा देने के लिए मिशन 'ड्रोन शक्ति' की घोषणा की गई है।

- विदेशी ड्रोन के आयात पर प्रतिबंध और ड्रोन घटकों के आयात को मुक्त करने के लिए 9 फरवरी, 2022 को ड्रोन आयात नीति अधिसूचित की गई है।

- ड्रोन पायलट लाइसेंस की आवश्यकता को समाप्त करते हुए, 11 फरवरी, 2022 को ड्रोन (संशोधन) नियम, 2022 को अधिसूचित किया गया है।

- 10-31 मार्च, 2022 के दौरान ड्रोन और ड्रोन घटकों के लिए पीएलआई योजना के लिए निर्माताओं से आवेदन आमंत्रित किए गए थे। लाभार्थियों की पहली अनंतिम सूची 20 अप्रैल, 2022 को जारी की गई थी।

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