नई दिल्ली, शकील शमसी। Mirza Ghalib Death Anniversary : उर्दू शायरी और मिर्जा गालिब का नाम एक दूसरे का पर्यायवाची बन चुके हैं। शायद ही कोई भारतीय ऐसा होगा जिसने गालिब का नाम न सुना हो, इसकी एक वजह तो यह है कि उनकी शायरी दिल में उतर जाने वाली है और दो शताब्दियों का समय गुजर जाने के बाद भी नई नई सी है। इतनी शोहरत के पीछे दो अन्य वजहें भी हैं, इनमें से पहली वजह है उनकी मोहब्बत भरी शायरी, उनका चंचल स्वभाव, लतीफे बाजी और कटाक्ष करने की आदत और उनके लोकप्रिय होने की दूसरी महत्वपूर्ण वजह है उनके द्वारा लिखे गए खत।

गालिब के जीवन में ही उनके पत्रों के दो संकलन छप गए थे

यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि मिर्जा गालिब द्वारा अपने शिष्यों और मित्रों को लिखे गए पत्र उर्दू साहित्य की बहुत बड़ी धरोहर का दर्जा हासिल कर चुके हैं। गालिब विश्व के एक ऐसे मात्र शायर हैं जिनके द्वारा लिखे गए खत इतने लोकप्रिय हुए कि उनके जीवन में ही उनके पत्रों के दो संकलन छप गए थे। उनके पत्रों के एक संकलन का नाम ऊद ए हिंदी (भारत की खुशबु) और दूसरे संकलन का नाम उर्दू ए मोअल्ला (उच्च उर्दू) है, गालिब को अपने पत्र लेखन के कार्य पर खुद भी बड़ा नाज था, वह कहते थे कि उन्होंने आलेख को संवाद बना दिया है। शायद इसका एक कारण यह भी था कि जब कोई पत्र आता था तो उनको लगता कि वह व्यक्ति खुद आया है।

शिष्य पंडित हर गोपाल तफ्ता को अपना बेटा कहने लगे थे

गालिब के पत्रों पर आधारित यह दोनों किताबें आज भी खूब बिकती हैं। असल में गालिब के इन्हीं पत्रों से उनके अंदर का छुपा इंसान बाहर आया है। इन्हीं पत्रों से मालूम पड़ा कि वह अपने एक शिष्य पंडित हर गोपाल तफ्ता से इतना प्यार करते थे कि उनको वह अपना बेटा कहने लगे थे। गालिब की अपनी कोई औलाद जीवित नहीं रही थी शायद इसलिए उन्होंने औलाद का प्रेम पंडित हर गोपाल तफ्ता के रूप में ढूंढा। पंडित हर गोपाल तफ्ता दिल्ली से कुछ दूर स्थित सिकंदराबाद में रहते थे और गालिब दिल्ली में थे। गालिब ने सबसे ज्यादा (164) खत भी तफ्ता के नाम ही लिखे और हर गोपाल तफ्ता को अपने परिवार का सदस्य बनाने के लिए उन्होंने उनको अपना नाम भी दिया और अपने पत्रों में व मुलाकातों में उनको ‘मर्जा तफ्ता’ कहकर संबोधित करते थे। तफ्ता से अपने प्रेम को उन्होंने बार-बार दोहराया। एक पत्र में लिखते हैं ‘आओ मिर्जा तफ्ता मेरे गले लग जाओ, बैठो और मेरी हकीकत सुनो’ एक और पत्र में लिखते हैं ‘मेरी जान क्या समझे हो सब मखलूकात (सारे प्राणी) तफ्ता और गालिब के जैसे क्यों बन जाएंगे।’

मेहमानों के खातिरदारी में गालिब एक बड़ा हिस्सा खर्च कर देते थे

एक पत्र में लिखा ‘छोटा गालिब है तू मेरी जान मेरे बाद क्या करोगे मैं तो चिरागे सुबह दम (बुझता हुआ दीपक) और आफताबे सरे कोह (पहाड़ के पीछे छुपता जा रहा सूरज) हूं। गालिब बहुत दोस्त नवाज इंसान थे मेहमानों के खातिरदारी में वह अपनी आमदनी का एक बड़ा हिस्सा खर्च कर देते थे। खासतौर पर शराब पीने वाले दोस्तों का वह बहुत ख्याल रखते थे। एक पत्र में अपने अकेलेपन की बात यूं लिखते हैं ‘क्यों साहिब मुझसे क्यों खफा हो आज महीना भर हो गया या दो चार दिन बाद हो जाएगा कि तुम्हारा खत नहीं आया इंसाफ करो कितना कसीर उल अहबाब (बहुसंख्यक मित्रों वाला)आदमी था मैं, कोई वक्त ऐसा न था जब मेरे पास दो चार दोस्त न होते हों। अब सिर्फ एक शिव राम ब्राह्मण और बालमुकुंद बाकी रह गए हैं जो गाह गाह (समय समय पर) आते हैं।’

गालिब से हर गोपाल भी बहुत मोहब्बत करते थे

गालिब की किताबें छपवाने में हर गोपाल का बहुत बड़ा हाथ रहता था और वह उनकी आर्थिक मदद भी करते थे। गालिब से हर गोपाल भी बहुत मोहब्बत करते थे। हालांकि दोनों के बीच उम्र का ज्यादा फर्क नहीं था फिर भी हर गोपाल तफ्ता गालिब के साथ पिता जैसे पेश आया करते थे। दोनों के बीच हास्य व्यंग्य भी खूब चलता था। तफ्ता भी एक बेटे की तरह गालिब के पांव दाबने पर गर्व करते थे। एक बार उनके पांव दाबने के बाद हर गोपाल तफ्ता ने कहा पैर दाबने की उजरत (प्रश्रमिक) तो दीजिए। गालिब ने हंसकर कहां तुमने मेरे पांव दाबे मैंने तुम्हारे पैसे दाब लिए हिसाब बराबर। यह गालिब की तफ्ता से मोहब्बत का ही नतीजा है कि पंडित हर गोपाल तफ्ता उर्दू साहित्य में एक ऐसा नाम बन गए हैं कि जिनको जाने बिना उर्दू का कोई विद्यार्थी आगे नहीं बढ़ सकता।

अगर गालिब अपने पत्रों में इतनी शिद्द्त से तफ्ता का जिक्र न करते तो शायद हर गोपाल तफ्ता का नाम साहित्य की किसी अलमारी में एक धूल भरी किताब से ज्यादा अहमियत न रखता मगर गालिब का बेटा बनकर उन्होंने जो नाम कमाया वह अब कभी मिट नहीं सकता। मुझे लगा कि मिर्जा गालिब की 151 वीं बरसी के मौके पर उनकी शायरी, उनके साहित्य और आदर्शों पर बात करने के बजाय उनके जीवन के उस पहलू पर रौशनी डालूं जिस में गंगा जमुनी तहजीब के रंग भरे हैं। आशा है पाठकों को मेरा यह प्रयास पसंद आया होगा।

[संपादक इन्किलाब]

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Posted By: Sanjay Pokhriyal

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