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    असम सरकार से समझौता करने वाले एनडीएफबी का रहा है लंबा खूनी इतिहास

    By Kamal VermaEdited By:
    Updated: Fri, 31 Jan 2020 07:06 AM (IST)

    असम सरकार से समझौता करने वाले एनडीएफबी का लंबा खूनी इतिहास रहा है। इसने कई बड़े हमलों को अंजाम दिया है।

    असम सरकार से समझौता करने वाले एनडीएफबी का रहा है लंबा खूनी इतिहास

    नई दिल्ली [जागरण स्‍पेशल]। असम के खतरनाक उग्रवादी संगठनों में से एक नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (National Democratic Front of Bodoland- NDFB) के 1600 से अधिक उग्रवादियों द्वारा किए गए आत्‍मसमर्पण ने इतिहास रच दिया है। 27 जनवरी को एनडीएफबी समूह और असम सरकार में जो समझौता हुआ उसके मुताबिक बोडोलैंड की मांग हमेशा के लिए खत्‍म हो गई है। एनडीएफबी उन उग्रवादी संगठनों में से एक है जिसने कई बड़े हमलों को अंजाम दिया है। इनके निशाने पर हमेशा से ही भारतीय जवान रहे हैं। इसका जाल भारत, बांग्लादेश, भूटान और म्यांमार में फैला हुआ है। इसको भारत सरकार द्वारा प्रतिबंधित संगठनों की सूची में काफी पहले ही डाल दिया गया था। 

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    एनडीएफबी का गठन 1986 में हुआ था तब इसको बोडो सिक्‍योरिटी फोर्स के नाम से जाना जाता था। इसको मौजूदा नाम 1994 में दिया गया था। इसका हैडक्‍वार्टर म्‍यांमार में है। एनडीएफबी में दो गुट हैं, पहला आईके सांग्बिजित के नेतृत्व में एनडीएफबी(एस) तो दूसरा गुट एनडीएफबी(आर-बी) के नाम से जाना  जाता है। इसका नेतृत्‍व डायमरी करते हैं। यह गुट जहां संघर्ष में विश्‍वास रखता है वहीं एनडीएफबी(एस) हमेशा से ही वार्ता का समर्थन करता आया है। पहले ये दोनों गुट एक ही थे, लेकिन साल 2012 के बाद से दोनों अलग हो गए। ज्यादातर हमलों के लिए एनडीएफबी(आर-बी) ग्रुप ही जिम्मेदार है। इसके निशाने पर भारतीय सेना के अलावा गैर बोडो समुदायभी रहा है। एनडीएफबी (आर-बी) को अपुष्‍टतौर पर चीन की नेशनल लिबरेशन आर्मी से मदद मिलती रही है। ये मदद म्यांमार के रास्ते इन तक पहुंचती है। इससे अलावा इसके युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा), कामतापुर लिबरेशन ऑर्गनाईजेशन(केएलए), अचिक नेशनल वालंटियर्स काउंसिल(एएनवीसी) से भी  संबंध रहे हैं।

    1996 में असम विधानसभा चुनाव के दौरान बोडो आदिवासियों पर हुए हमले के लिए यही संगठन जिम्‍मेदार था।दिसंबर 2014 में असम के तीन जिलों में हमला कर 68 लोगों को मार दिया था। एनडीएफबी ने इन हमलों में आदिवासियों को निशाना बनाया। 2003 में बोडो टाइगर फोर्स के उग्रवादियों द्वारा सरेंडर करने के बाद एनडीएफबी का इससे भी मनमुटाव हो गया था। अगस्‍त 2016 में कोकराझार में हुए हमले में इस संगठन ने 16 लोगों की हत्‍या कर दी थी। 1998 से ही इस संगठन का खूनी इतिहास जारी रहा है। 1998 में कोकराझार में इस संगठन ने 98 लोगों की हत्‍या कर दी थी। जबकि 2001 में ट्रेन धमाके के जरिए 100 लोगों की जान ले ली थी। 

    इसकी गतिविधियां ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तर और उत्तर पश्चिम से संचालित होती रही हैं। ये गुट असम के बोंगाईगांव, कोकराझार, दर्रांग, बरपेटा, ढुबरी, नलबरी और सोनितपुर जिलों के अलावा मेघालय की गारो पहाड़ियों में भी सक्रिय रहा है। इसके अलावा ये गुट छिपने के लिए भूटान की पहाडि़यों का भी इस्तेमाल करता है। भारत के कहने पर भूटानी सेना इस संगठन के खिलाफ सैन्‍य कार्रवाई की थी। सेना द्वारा चलाए ऑपरेशन ऑल क्‍लीयर एनडीएफबी के कई लड़ाके गिरफ्तार हुए, तो कई मार गिराए गए। 2006 में एनडीएफबी और भारत सरकार के बीच संघर्ष विराम का समझौता भी हुआ था, लेकिन ये छह महीने बाद ही उन्‍होंने इसको तोड़ दिया था। एनडीएफबी के हमलों में अब तक 167 भारतीय जवान शहीद हो चुके हैं। 

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