जेएनएन, हरीश बड़थ्वाल। संगीत मानवीय समुदाय के सांस्कृतिक, धार्मिक तानेबाने का अभिन्न अंग रहा है। संगीत किसी भी भाव को जागृत कर सकता है या उसका शमन कर सकता है। मनुष्य की भांति संगीत का मूल स्वरूप दैविक है। इसीलिए देवी-देवताओं को कोई वाद्ययंत्र हाथ में लिए चित्रित किया जाता है- कृष्ण भगवान के पास बांसुरी, शिव के साथ डमरू, सरस्वती के हाथों में वीणा आदि। युगों से माताएं बच्चों को अपनी लोरियों से सुलाती रही हैं। बैंड आदि वाद्ययंत्रों की धुनों से उत्साहित सीमा पर तैनात सिपाही भरपूर सामर्थ्‍य के प्रयोग से शत्रु को शिकस्त देते हैं। भले ही कोई भूपेन हजारिका की ‘दिल झूम-झूम करे..’ का अर्थ न समझे, किंतु ये स्वर श्रोता को किन्हीं रूहानी वादियों में पहुंचा देते हैं। संगीत की तरंगें ईश्वर की सांसें हैं।

संगीत ने कोरोना काल में अनेक व्यक्तियों को मन एवं दिल से टूटने से बचाया है। गुजरे जमाने के फिल्मी एवं अन्य गानों तथा संगीतमय प्रस्तुतियों के आदान-प्रदान से सर्वत्र पसर गई उकताहट से राहत मिली है। संगीत को हम अपनी मांसपेशियों के माध्यम से सुनते हैं। तभी तो अनायास ही श्रोताओं के हाथ पांव थिरकने लगते हैं और दिलोदिमाग में सिरहन उठती है। कह सकते हैं संगीत से जिसके पांव और उंगलियां न थिरकें, वह संवेदनशून्य है।

संगीत को जीन पॉल ने जीवन के अंधेरों में चांदनी के रूप में परिभाषित किया। प्रश्न है, जब संगीत का जादू खूंकार जीवों को वश में कर सकता है, चट्टान को पिघला देता है, भारी भरकम बरगद को मोड़ सकता है तो इसका प्रयोग जनहित में क्यों नहीं किया जा सकता? आज जनहित में उन व्यवहार्य तकनीकों को खोजने की सख्त जरूरत है जो विश्व में शांति, सुखचैन और ठहराव में सहयोगी हों।

संगीत से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले अनेक फायदों की पुष्टि वैज्ञानिक परीक्षणों में हुई है। संगीत एंडोफाइन में बढ़त करते हुए मानसिक अवस्था को सकारात्मक मोड में लाता है और नैराश्य, थकान, क्रोध, संशय जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों पर अंकुश रखता है। इन दिनों तेजी से बढ़ रहे ऑटिज्म, सिजोफ्रेनिया, डिप्रेशन, एंग्जाइटी एवं अन्य मानसिक व्याधियों और इम्युनिटी बढ़ाने में संगीत के लाभ निर्विवाद हैं। आपसी वैमनस्य, अंतर्कलह, और मतभेदों को मिटा कर सामुदायिक भावना बढ़ाने में संगीत कारगर साधन है।

प्रतिवर्ष 21 जून का दिन विश्व संगीत दिवस के तौर पर भी मनाया जाता है। इस दिन 120 देशों के सैकड़ों शहरों में खुले में, पार्कों-सभागारों में संगीत संध्याएं प्राय: नि:शुल्क आयोजित होती हैं। अपनी सोच को हम जितना संगीतमय बनाएंगे, दैनिक कार्यकलापों में संगीत का जितना समावेश करेंगे, उतनी ही एकरसता टूटेगी और जीवन स्वस्थ और संयत रहेगा।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Edited By: Tilakraj