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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jan 13, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Farmers Protest: महंगाई भड़काएगी MSP की गारंटी, खजाने पर बोझ के साथ आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ेगा भारी

By Arun kumar SinghEdited By:
Published: Wed, 13 Jan 2021 08:38 PM (IST)Updated: Wed, 13 Jan 2021 09:01 PM (IST)

किसानों के लिए कहने को तो यह न्यूनतम समर्थन मूल्य है लेकिन बाजार में यही अधिकतम मूल्य बनकर महंगाई का ...और पढ़ें

किसान संगठनों की मांग में विपक्षी राजनीतिक दल भी घी डालने का काम कर रहे हैं
किसान संगठनों की मांग में विपक्षी राजनीतिक दल भी घी डालने का काम कर रहे हैं

 नई दिल्ली, सुरेंद्र प्रसाद सिंह। एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी को लेकर बहस चल रही है। किसान संगठनों की मांग में विपक्षी राजनीतिक दल भी घी डालने का काम कर रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि यह मांग कुछ किसानों के लिए भले ही लाभ का सौदा बन जाए, देश के लिए भारी बोझ बन जाएगी। एमएसपी की गारंटी से सरकारी खजाने पर पड़ने वाला भारी वित्तीय बोझ आम उपभोक्ताओं की जेब तक पहुंचेगा। कृषि उपज में महंगाई की आग भड़केगी, जिससे रसोईघर की लागत बढ़ जाएगी। 

किसानों के लिए कहने को तो यह न्यूनतम समर्थन मूल्य है, लेकिन बाजार में यही अधिकतम मूल्य बनकर महंगाई का दंश देता है। इससे मुट्ठीभर किसानों को हित भले ही सध जाएं पर बाकी उपभोक्ताओं के लिए मुश्किलों का सबब बन जाएगा। सामान्यतौर पर एमएसपी पर होने वाली सरकारी खरीद में अनाज की गुणवत्ता भी सवालों के घेरे में होती है। इससे सरकारी खरीद एजेंसी भारतीय खाद्य निगम (एफसीआइ) को सालाना कई हजार करोड़ रुपये की चपत लगती है। 

कम गुणवत्ता वाला अनाज ही राशन में बांटने की बन जाएगी मजबूरी

एमएसपी की गारंटी पर खाद्यान्न की खरीद बढ़ने के साथ कम गुणवत्ता वाले अनाज की खरीद भी अधिक करनी पड़ेगी। लिहाजा सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत गरीब उपभोक्ताओं को घटिया अनाज प्राप्त करना उनकी नियति बन जाएगी। आमतौर पर मुफ्त अनाज मिलने की वजह से उनका मुखर विरोध कहीं सुनाई नहीं पड़ता है। लिहाजा इसका पूरा खामियाजा सरकारी खजाने के साथ गरीबों और आम उपभोक्ताओं को भुगतना पड़ेगा। इन्हीं गंभीर चुनौतियों के मद्देनजर पूर्ववर्ती सरकारें भी एमएसपी की गारंटी देने से बचती रही हैं। प्रशासनिक आदेश के तौर पर यह जारी है और जारी रहेगा। सरकार लगातार इसका भरोसा भी देने को तैयार है। उसे पीडीएस के लिए तो सालाना छह करोड़ टन से अधिक अनाज की जरूरत को पूरा करने के लिए सरकारी खरीद करना आवश्यक होगा। हालांकि आने वाले सालों में एमएसपी पर होने वाली खरीद के लिए अनाज की गुणवत्ता को लेकर एक मानक बनाना ही होगा। 

पीडीएस में जाता है 90 फीसद अनाज 

सरकारी एजेंसियां सालाना 3.5 करोड़ टन से लेकर 3.90 करोड़ टन तक गेहूं और 5.19 करोड़ टन तक चावल की खरीद करती हैं। गेहूं व चावल की ही सर्वाधिक खरीद होती है जो कुल पैदावार का लगभग 30 फीसद होता है। सरकारी खरीद का 90 फीसद हिस्सा पीडीएस में वितरित किया जाता है। जबकि 10 फीसद हिस्सा स्ट्रेटजिक बफर स्टॉक के तौर पर रखा जाता है। एमएसपी पर होने वाली खरीद केवल छह फीसद किसानों की ही होती है। 

एमएसपी को लेकर ज्यादातर किसान अनभिज्ञ

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) के मुताबिक देश के मुश्किलन 10 फीसद किसानों को ही एमएसपी अथवा समर्थन मूल्य के बारे में जानकारी है। एमएसपी पर होने वाली सरकारी खरीद का कोई निश्चित क्वालिटी मानक न होने से जैसा भी अनाज बिकने को आता है, सरकारी एजेंसियों पर उन्हें खरीदने का दबाव होता है। यही वजह है कि एफसीआइ हर साल कई लाख टन अनाज डैमेज क्वालिटी के नाम पर कौडि़यों के भाव नीलाम करती है। 

बढ़ रहा है खाद्य सब्सिडी का बोझ

एमएसपी में लगातार होने वाली वृद्धि और पीडीएस पर अति रियायती दरों पर खाद्यान्न के वितरण से खाद्य सब्सिडी का बोझ बढ़ता जा रहा है। पिछले 20 सालों में खाद्य सब्सिडी 18 हजार करोड़ रुपये से बढ़कर 1.50 लाख करोड़ रुपये हो गई है। समर्थन मूल्य की गारंटी के साथ सरकारी खरीद कई गुना तक बढ़ सकती है जिसके लिए लाखों करोड़ की जरूरत होगी। इतने अधिक अनाज को रखने और उसकी खपत कहां होगी? इसका बंदोबस्त करना संभव नहीं होगा। स्वाभाविक खुले बाजार में अनाज की कमी का सीधा असर कीमतों पर पड़ेगा, जो महंगाई को सातवें आसमान पर पहुंचा देगा।