नई दिल्‍ली। Morarji Desai Death anniversary: क्या आपको पता है कि देश में एक प्रधानमंत्री ऐसे भी हुए हैं जिनको भारत और पाकिस्तान के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा गया था। हम आपको बताते हैं उनका नाम क्या था। उनके बाद अब तक ये पुरस्कार किसी दूसरे प्रधानमंत्री को नहीं दिया गया है। उनका नाम मोरारजी देसाई था। मोरारजी देसाई की राजनीतिक लोकप्रियता और लोकतंत्र में उनकी सहभागिता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उन्‍हें जहां भारत ने अपना सर्वोच्‍च नागरिक सम्‍मान भारत रत्‍न से नवाजा वहीं पाकिस्‍तान ने भी अपना सर्वोच्‍च सम्‍मान निशान ए पाकिस्‍तान से उन्‍हें नवाजा।

इस पुरस्कार के अलावा मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्री बनने की एक और खासियत थी कि वो देश के पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री भी थे। वो भारत के छठे प्रधानमंत्री थे। उनका कार्यकाल 1977 से 1979 तक रहा। यूं तो कांग्रेस में रहते हुए भी उनका नाम इस पद के उम्‍मीद्वार के तौर पर सामने आता था, लेकिन वह इस दौड़ में हमेशा पिछड़ते ही रहे। प्रधानमंत्री का पद उन्हें कांग्रेस से अलग होने के बाद 1977 में इंदिरा गांधी की सरकार गिरने पर ही नसीब हो पाया था।

गुजरात में हुआ था जन्‍म

मोरारजी देसाई का जन्म 29 फरवरी 1896 को गुजरात के भदेली नामक स्थान पर एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वहीं 10 अप्रैल 1995 को 99 साल की उम्र में उनका निधन हो गया था। उनके पिता रणछोड़जी देसाई भावनगर (सौराष्ट्र) में एक स्कूल अध्यापक थे। लेकिन डिप्रेशन (अवसाद) में आकर उन्‍होंने आत्‍महत्‍या कर ली थी। पिता की मृत्यु के तीसरे दिन मोरारजी देसाई की शादी हुई थी। देसाई ने उस समय के बंबई से अपनी पढ़ाई की। कॉलेज में पढ़ते समय उन्‍होंने महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक और अन्य कांग्रेसी नेताओं के भाषणों को सुना था।

राजनीति में जाने से पहले वह सिविल सर्विस में जाना चाहते थे। इसके लिए उन्‍होंने जुलाई 1917 में यूनिवर्सिटी ट्रेनिंग कोर्स में प्रविष्टि भी पाई। यहां रहते हुए मोरारजी अफसर बने और मई 1918 में अहमदाबाद के उप जिलाधीश भी बने। लेकिन यह जीवन उन्‍हें ज्‍यादा रास नहीं आया और उन्‍होंने 1930 में ब्रिटिश सरकार की नौकरी छोड़ दी और स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। 

राजनीतिक करियर

1931 में वह गुजरात प्रदेश की कांग्रेस कमेटी के सचिव बन गए। सरदार पटेल के निर्देश पर उन्होंने अखिल भारतीय युवा कांग्रेस की शाखा स्थापित की और उसके अध्यक्ष भी बने। मोरारजी 1937 तक गुजरात प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव रहे। इसके बाद वह बंबई कांग्रेस मंत्रिमंडल में शामिल हुए। इस आंदोलन के चलते वह कई वर्षों तक जेल में रहे। उस दौर में वह बड़ा नाम हुआ करते थे। 1952 में वह बंबई के मुख्यमंत्री बने। 1967 में इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने पर मोरारजी को उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री बनाया गया।

यूं बने पीएम लेकिन नहीं कर सके कार्यकाल पूरा

इसके बाद तो वह कांग्रेस के घोर विरोधियों की सूची में शामिल नाम में से एक नाम बन गए थे। इतना ही नहीं 1975 में आपातकाल के खिलाफ जब जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में आंदोलन का बिगुल फूंका गया तो उसमें मोरारजी देसाई भी शामिल थे। इस आंदोलन की आग ने लगभग पूरे देश को अपने आगोश में जकड़ लिया था। नतीजा ये हुआ कि 1977 के आम चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई। इसके साथ ही मोरारजी देसाई का पीएम बनने का भी सपना पूरा हुआ। उन्‍होंने देश के जिन नौ राज्यों में कांग्रेस का शासन था, वहां की सरकारों को भंग कर दिया और राज्यों में दोबारा चुनाव कराये जाने की घोषणा भी कर दी। चौधरी चरण सिंह से मतभेदों के चलते उन्हें प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा। 

नाराजगी की वजह

दरअसल, पार्टी के वरिष्ठतम नेता होने के बावजूद उन्हें पंडित नेहरू के निधन के बाद प्रधानमंत्री नहीं बनाया गया। इतना ही नहीं ताशकंद में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के आकस्मिक निधन के बाद भी उनको इस पद के लिए वरीयता नहीं दी गई और देश की कमान इंदिरा गांधी के हाथों में सौंप दी गई। यह बात देसाई को काफी नागवार गुजरी। हालांकि, उनकी इस नाराजगी को देखते हुए उन्‍हें उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री का पद दिया गया। लेकिन, वह अपनी नाराजगी और फिर कांग्रेस से मनमुटाव को लंबे समय तक झेल नहीं सके और 1969 में पार्टी से अलग हो गए।

निशान ए पाकिस्‍तान से नवाजे गए

देसाई की राजनीतिक लोकप्रियता और लोकतंत्र में उनकी सहभागिता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उन्‍हें जहां भारत ने अपना सर्वोच्‍च नागरिक सम्‍मान भारत रत्‍न से नवाजा वहीं पाकिस्‍तान ने भी अपना सर्वोच्‍च सम्‍मान निशान ए पाकिस्‍तान से उन्‍हें नवाजा। वह भारत के एकमात्र प्रधानमंत्री हैं जिन्‍हें दोनों देशों से ऐसा सम्‍मान मिला है। 

स्‍वतंत्रता संग्राम की बात करें तो वह महात्मा गांधी के साथ कई अहम भूमिकाओं में दिखाई दिए। 1930 से 1940 के बीच उन्होंने करीब 10 साल ब्रिटेन की जेल में बिताए। 1980 के आम चुनाव में भी वह जनता पार्टी की तरफ से चुनाव प्रचार में शामिल हुए, लेकिन वह खुद चुनावी दौड़ में शामिल नहीं हुए। राजनीति से सन्‍यास लेने के बाद उन्‍होंने मुंबई को अपना घर बनाया, यहीं पर उनका निधन भी हुआ था।  

Posted By: Vinay Tiwari

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