नई दिल्‍ली, पीटीआइ। इसरो के एक पूर्व वैज्ञानिक ने कहा है कि मंगलयान अभी एक साल और काम कर सकता है। हैरानी की बात यह है कि केवल छह महीने के लिए भेजा गया यह यान पिछले पांच साल से काम का रहा है और अभी द‍िलचस्‍प तस्‍वीरें भारतीय स्‍पेस एजेंसी को उपलब्‍ध करा रहा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के प्रमुख के. सिवन ने बताया कि भारत के पहले अंतर ग्रही मिशन मार्स ऑर्बिटर मिशन (Mars Orbiter Mission, MOM) ने इसरो को मंगल ग्रह की मानचित्रावली तैयार करने में काफी मदद की है।

लगातार भेज रहा तस्‍वीरें 

के. सिवन (ISRO chief K Sivan) ने कहा कि यान अभी भी सही तरीके से काम कर रहा है और लगातार तस्वीरें भेज रहा है। मंगलयान-2 के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि इस मिशन पर भी काम चल रहा है ले‍किन अभी तक कोई अंतिम फैसला नहीं किया गया है। मंगलयान के ऑर्बिटर ने हजारों तस्वीरें भेजी हैं। बता दें कि मिशन मंगलयान ने कल यानी 24 नवंबर को मंगल ग्रह की परिक्रमा करते हुए सफलता पूर्वक पांच साल पूरे कर लिए। चौंकाने वाली बात यह है कि इसकी उम्र केवल छह महीने थी लेकिन इसने अपेक्षा से काफी अधिक समय तक अपने काम को अंजाम दिया।

यह रही मिशन की महत्‍वपूर्ण उपलब्‍ध‍ि

वहीं इसरो के पूर्व प्रमुख एएस किरण कुमार ने कहा कि इस मिशन की महत्‍वपूर्ण खोज यह रही कि मंगल ग्रह पर धूल भरी आंधियां सैकड़ों किलोमीटर तक चल सकती हैं। उन्‍होंने यह भी खुलासा किया कि मार्स ऑर्बिटर अभी एक और साल तक काम कर सकता है। इसरो के लिए यह सफलता बेहद खास है। यह पहली बार है जब हम पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से आगे जा रहे थे। हमने बिना किसी गड़बड़ी के इस मिशन के सभी चरण पूरे किए और हम अतिरिक्त ईंधन का उपभोग किए बगैर मंगल ग्रह की कक्षा तक पहुंचने में कामयाब रहे।

इसलिए बढ़ पाई मार्स ऑर्बिटर की उम्र 

इसरो के पूर्व प्रमुख एएस किरण कुमार ने कहा कि चूंकि मिशन मंगलयान के सभी चरण बिना अतिरिक्‍त ईंधन खर्च किए पूरा किए गए थे इसलिए जिससे ईंधन बचाने में मदद मिली। चूंकि किसी भी अंतरिक्ष यान का जीवनकाल ग्रह की परिक्रमा करने के लिए जरूरी ईंधन की उपलब्धता पर निर्भर करता है और मॉम के पास कुछ रिजर्व प्रणोदक मौजूद है इसलिए अभी भी ऑर्बिटर एक साल और काम कर सकता है। इसरो के लिए यह उपलब्‍ध‍ि भी बेहद खास है। सनद रहे कि 24 सितंबर 2014 को मंगल पर पहुंचने के साथ ही भारत दुनिया में अपनी पहली ही कोशिश में सफल होने वाला पहला देश बन गया था। 

कार्टोसैट-1 ने भी मनवाया था लोहा 

मंगलयान हॉलीवुड की फिल्म 'ग्रेविटी' और नासा के मावेन ऑर्बिटर से भी कम लागत में मंगल पर भेजा गया था। इसके लिए इसरो की काफी तारीफ हुई थी। इस मिशन में प्रक्षेपण यान, अंतरिक्षयान और उसके सभी तत्वों की लागत महज 450 करोड़ रुपये आई थी। ऐसा नहीं कि यह भारत का पहला मिशन है जिसने अपने जीवनकाल से अधिक समय तक काम किया। इससे पहले भारत के पहले रिमोट सेंसिंग उपग्रह कार्टोसैट-1 को तीन साल की अवधि के लिए भेजा गया था लेकिन वह 10 साल तक काम करता रहा। इस उपग्रह का 2005 में प्रक्षेपण किया गया था।

Posted By: Krishna Bihari Singh

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