बेहतर शहर की दौड़ इंदौर ने जीत ली है। वहीं कानपुर से मंज़िल अभी कोसों दूर है। 'माय सिटी माय प्राइड' अभियान की इस सिटी लिवेबिलिटी रिपोर्ट-2018 के अनुसार, इंदौर इन 10 शहरों में रहने के लिए सबसे बेहतर है। इस सूची में लखनऊ दूसरा सबसे बेहतर शहर रहा। देहरादून तीसरे स्थान पर, वाराणसी चौथे व रायपुर पांचवें स्थान पर रहा। रांची छठवां, मेरठ सातवां, लुधियाना आठवां और पटना को इस सूची में नौवां स्थान मिला।

सिटी लिवेबिलिटी स्कोर जानने के लिए हमने 41 सवालों के माध्यम से इन 10 शहरों की स्वास्थ्य, शिक्षा,अर्थव्यवस्था, बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षा व्यवस्था के बारे में नागरिकों से राय मांगी थी। 02 जुलाई से अब तक मिलीं प्रतिक्रियाओं के आधार पर तैयार की गई यह रिपोर्ट अब आपके सामने है।

मध्य प्रदेश के सबसे बड़े शहर इंदौर को पढ़ाई, सेहत, रोजगार और इन्फ्रास्ट्रक्चर की सुविधाओं में सबसे बेहतर स्कोर मिले। आईआईटी और आईआईएम जैसी प्रतिष्ठित संस्थानों वाले इस शहर का लिवेबिलिटी स्कोर 5 में से 3.69 रहा। उप्र की राजधानी लखनऊ को रहने योग्य दूसरा सबसे बेहतर शहर माना गया। तहजीब और नज़ाकत पसंद इस शहर का स्कोर 3.37 रहा।

'माय सिटी माय प्राइड' लिवेबिलिटी रिपोर्ट में तीसरे स्थान पर उत्तराखंड की राजधानी देहरादून को जगह मिली, जिसे पांच में से 3.31 अंक मिले। वहीं, 3.23 स्कोर के साथ देश की सांस्कृतिक नगरी कहे जाने वाली वाराणसी चौथे स्थान पर रही। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर को 3.20 स्कोर के साथ पांचवें नंबर पर जगह मिली, जबकि 3.18 स्कोर के साथ झारखंड राज्य की राजधानी रांची छठवें स्थान पर रही।

 

खेलकूद के सामान के लिए मशहूर मेरठ शहर का लिवेबिलिटी स्कोर 3.13 रहा और इसे सातवें पायदान पर जगह मिली। पंजाब का कारोबारी शहर लुधियाना 3.12 के स्कोर के साथ आठवें नंबर पर रहा, जबकि बिहार की राजधानी पटना का स्कोर 3.07 रहा और इस सूची में 9वें पायदान पर रहा। इस रिपोर्ट में अंतिम स्थान उप्र के औद्योगिक शहर कानपुर को मिला।10वें स्थान पर रहे कानपुर का लिवेबिलिटी स्कोर सबसे कम 2.94 रहा।

शिक्षा,सेहत, सुरक्षा,कारोबार व जरुरी सुविधाओं पर एक नज़र:

शिक्षा
इन शहरों में शिक्षा की स्थिति बेहतर नजर आई। यहाँ स्कूलों की संख्या को लेकर लोग संतुष्ट दिखे। हालांकि, शिक्षण संस्थानों में खेल सुविधाओं और सफाई-शौचालयों की कमी से लोग परेशान हैं।

सुरक्षा

सुरक्षा व्यवस्था में देहरादून की स्थिति दूसरे नौ शहरों के मुकाबले बेहतर रही,लेकिन इसमें भी कानपुर अंतिम पायदान पर रहा। सभी शहरों में स्ट्रीट क्राइम, जैसे चेन स्नैचिंग, पॉकेटमारी और चोरी सुरक्षा आम समस्या है। सीसीटीवी कवरेज के मामले में भी सभी शहरों की स्थिति कमजोर है।

इन्फ्रास्ट्रक्चर
बुनियादी सुविधाओं (इन्फ्रास्ट्रक्चर) के मामले में इंदौर सबसे बेहतर शहर के तौर पर उभरकर सामने आया, लेकिन औद्यौगिक शहर होने के बाद भी कानपुर का सबसे निचले पायदान पर रहना चौंकाता है। इन शहरों में बिजली की आपूर्ति संतोषप्रद है। लेकिन अतिक्रमण और ख़राब फुटपाथ की शिकायत हर शहर में है। लोगों ने माना कि अतिक्रमण बेहतरी की राह में बड़ी बाधा है।

अर्थव्यवस्था
आश्चर्यजनक रूप से स्थानीय अर्थव्यवस्था के मामले में सभी दस शहरों ने अपनी-अपनी पीठ थपथपाई है। इंदौर यहां भी शीर्ष पर रहा, वहीं देहरादून सबसे नीचे नजर आया। सभी शहरों में रोजगार के मौकों की कमी ही लोगों की सबसे बड़ी चिंता है।

स्वास्थ्य सेवा
स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर भी इन शहरों की स्थिति संतोषप्रद नजर आई। हालांकि, इलाज के खर्चे पर ज्यादातर लोगों ने चिंता जताई।

'माय सिटी, माय प्राइड' अभियान
हिंदी भाषी राज्यों के 10 बड़े शहरों को सहभागिता से बेहतर बनाने की कोशिश है। इनमें लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, मेरठ, देहरादून, पटना, रांची, रायपुर, इंदौर और लुधियाना शहर शामिल है।

क्या है यह अभियान:
इसके पहले चरण में शहर की समस्याओं के प्रति नागरिकों में जागरूकता पैदा करना। दूसरे चरण में, समस्याओं के समाधान जानना और फिर उसे पूरा करने के लिए जिम्मेदार लोगों को आगे लाना। वहीं, तीसरे चरण में योजनाओं को लागू करने के लिए सहभागिता से प्रशासन, निजी क्षेत्र और जन समुदायों को प्रेरित करना है।

क्यों चाहिए यह अभियान:
दुनिया के श्रेष्ठ 10 शहरों में एक भी अमेरिकी नहीं है। सपनों की तरह रचे गए ये अमेरिकी शहर ग्लोबल लिवेबिलिटी इंडेक्स के मानकों को पूरा नहीं करते। भारत में बेहतर शहरों की सूची में पुणे, मुंबई को छोड़ दें तो देश की राजधानी नईदिल्ली समेत कोलकाता, चेन्नई,बेंगलुरु, हैदराबाद, लखनऊ,पटना या जयपुर जैसे बड़े शहर पहले 10 स्थान पर नहीं हैं। यानी, देश या प्रदेश की राजधानियों में भी बुनियादी सुविधाएँ जरूरी अनुपात में नहीं हैं।

सवाल है, क्या शहरों के बारे में सिर्फ सरकार को सोचना चाहिए या आम शहरी को भी सहयोग करना चाहिए? जवाब है- शहर नागरिकों का है, उनके लिए है। इसलिए अगर बेहतर शहर चाहिए तो सरकार के साथ आम शहरी को जिम्मेदार बनना पड़ेगा। 'माय सिटी माय प्राइड' उद्देश्य यही है।

कैसे हुआ सर्वे?
इन 10 शहरों में 2 जुलाई से अभी तक के आंकड़े जुटाए गए। हर मुद्दे पर पर राय जताने के लिए 1-5 के बीच अंक दिए जा सकते थे। इस अभियान में अब तक 08 लाख से ज्यादा लोग जुड़ चुके हैं। 700 से अधिक विशेषज्ञ और समाजसेवी इसका हिस्सा बन चुके हैं। 50 बैठकें की जा चुकी हैं। इस मुहिम के 445 खास लेख प्रिंट और ऑनलाइन में पब्लिश हो चुके हैं। साथ ही इन शहरों की बेहतरी के लिए 350 मुद्दों की पहचान भी हो चुकी है।

'माय सिटी, माय प्राइड' में अब आगे क्या:
अगले चरण में विशेषज्ञों, स्थानीय 'हीरो' और नागरिकों से मिले सुझावों पर बात होगी। शहर की कुछ बड़ी समस्याएं पहचानी जाएंगी और उनके समाधान का उपाय होगा।चुने हुए मुद्दों को फोरम में रखा जाएगा। विचार-विमर्श के बाद फाइनल रिपोर्ट शहरवासियों को सौंपी जाएगी। जिससे सहभागिता के साथ एनजीओ, निजी क्षेत्र और सरकारी विभागों के जरिए समाधान के प्रयास किये जा सकें और फिर नागरिक कह सकें- 'माय सिटी माय प्राइड '।

(माय सिटी माय प्राइड लिवेबिलिटी सर्वे - 2018 के लिए KPMG (रजिस्टर्ड) ने सलाहकार और जांचकर्ता के रूप में सेवाएं प्रदान कीं, जबकि इस रिपोर्ट के प्रारूप को तैयार करने में इंटरनेशनल सेंटर फॉर जर्नलिस्टस - ICFJ ने मदद की। Facebook इसका प्रस्तोता है। रेडियो सिटी और नईदुनिया इस मुहिम के मीडिया सहयोगी हैं।)

By Nandlal Sharma