परमादेश को बेहतर रूप में समझने के लिए उसके भिन्न स्वरूपों पर दृष्टि डालना आवश्यक
भारत में वैसे तो संसदीय प्रणाली अपनाई गई है जो विधायिका और कार्यपालिका के बीच शक्तियों के संलयन पर आधारित है लेकिन इस ढांचे की विशेषता यह है कि इसे परिसंघीय स्वरूप भी प्रदान किया गया है जहां शक्तियों का बंटवारा अनिवार्य होता है।

नई दिल्ली, जेएनएन। परमादेश एक आदेशात्मक न्यायिक उपचार है। किसी भी सरकार, अधीनस्थ न्यायालय, निगम या सार्वजनिक प्राधिकरण को कुछ विशिष्ट कार्य करने के लिए (या करने से मना करना), जिसके लिए वह कानून के तहत बाध्य है और जो सार्वजनिक कर्तव्य की प्रकृति वाला है, उसके विरुद्ध जारी किया जाता है। लेकिन यह किसी प्राधिकरण को वैधानिक प्रविधान के विरुद्ध कुछ करने के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से जारी नहीं किया जा सकता है।
भारत में, परमादेश के लिए अनिवार्य शर्त यह है कि वह निकाय लोक कर्तव्य का पालन करने के लिए उत्तरदायी हो। साथ ही, याचिकाकर्ता को इस तरह के सार्वजनिक कर्तव्य के प्रवर्तन का दावा करने का अधिकार देने वाले समान रूप से सह-अस्तित्व में होना चाहिए। ये दो पूर्व शर्तें परमादेश के मुद्दे की नींव बनाती हैं। परमादेश का प्राथमिक दायरा और कार्य ‘पूछताछ’ व ‘निर्णय’ के बजाय ‘आदेश’ और ‘निष्पादित’ करना है। यह किसी निकाय के निर्णय को बदलने के लिए जारी नहीं किया जा सकता है। दायित्व जो वैधानिक प्रकृति के नहीं हैं, उन्हें परमादेश द्वारा लागू नहीं किया जा सकता है। परमादेश को और बेहतर रूप में समझने के लिए उसके भिन्न स्वरूपों पर दृष्टि डालना आवश्यक है।
वैकल्पिक परमादेश राहत के लिए पहले आवेदन पर जारी किया गया एक आदेश है जो प्रतिवादी को या तो मांगे गए कार्य को करने या इसे न करने का कारण दिखाने के लिए एक निर्दिष्ट समय पर न्यायालय के समक्ष पेश होने का आदेश देता है। इसके अतिरिक्त, सतत परमादेश सामान्य जनहित में एक निचले प्राधिकारी को जारी किया गया एक आदेश है जो अधिकारी या प्राधिकरण को न्याय के उल्लंघन को रोकने के लिए समय की एक निश्चित अवधि के लिए अपने कार्यों को तेजी से करने के लिए कहता है। न्यायिक उपचार के लिए जारी किए जाने वाले आदेश के बारे में उच्चतम न्यायालय ने भारत संघ बनाम एस. बी. वोहरा 2004 मामले में ऐसे निर्देश जारी किए हैं।
ध्यातव्य हो कि यह रिट राष्ट्रपति, राज्यपाल या विधयिका के विरुद्ध जारी नहीं किया जा सकता। इन तीनों ही प्राधिकारियों पर बारी-बारी से दृष्टि डालें तो स्थिति पूर्णतः स्पष्ट हो जाएगी। राष्ट्रपति भारत का संवैधानिक राष्ट्राध्यक्ष है और अनुच्छेद 77 (1) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि भारत सरकार की समस्त कार्यवाहियां राष्ट्रपति के नाम से की हुई कही जाएंगी।
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