पेटलावद, झाबुआ (वीरेंद्र भट्ट)। ठीक तीन साल पहले 12 सितंबर 2015 की सुबह पेटलावद में हुए भयानक विस्फोट में 78 लोगों की जान चली गई थी और 150 से ज्यादा घायल हुए थे। पति को खो चुकी महिलाओं में से कई ने खुद को साबित किया और दुख-तकलीफों को पीछे छोड़कर पैरों पर खड़ी हो गईं। वे अब बच्चों की परवरिश कर रही हैं। कुछ को नौकरी मिली तो उनकी शिकायतें भी हैं, लेकिन इन सबके बीच एक परिवार ने अपने भाई को श्रद्धांजलि देने पर्यावरण प्रेम का रास्ता अपनाया।

घटनास्थल के पास ही सेठिया रेस्टोरेंट के संचालक मुकेश सेठिया की मौत हो गई थी। भाई की मौत का दुख राजेंद्र सेठिया, संजय सेठिया और दीपक सेठिया को हुआ, लेकिन उन्होंने भाई की याद में अपनी दुकान के सामने डिवाइडर पर 25 पौधे लगाए। इनमें गुलमोहर, नीम, अशोक और कनेर के पौधे थे। तीन साल से भाई की याद में ये तीनों लगातार इन पौधों की सेवा करते रहे। साल के आठ महीने हर तीसरे दिन टैंकर बुलवाकर पौधों को पानी दिया। नतीजा ये हुआ कि तीन साल में ये पौधे अब पेड़ बन चुके हैं। राजेंद्र सेठिया का कहना है, इस तरह हमारे भाई की याद हमेशा हमारी आंखों के सामने रहेगी। इन्हें देख सुकून मिलता है कि भाई की आत्मा को शांति मिलती होगी।

सबको लगाना चाहिए पौधे
राजेंद्र, संजय और दीपक सेठिया का कहना है कि हर किसी को जन्मदिन, शादी की सालगिरह और अपने मृत परिजनों की याद में पौधे लगाने चाहिए। इस तरह न वो इन तारीखों को अमर बनाएंगे, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी बड़ा योगदान देंगे। हमें अपने लगाए पौधे की जिम्मेदारी भी लेना चाहिए। हम तीनों भाइयों ने ऐसा किया और नतीजा सामने है। 11जेएचए 13 पेटलावद में सेठिया बंधुओं ने ब्लास्ट में मृत भाई की याद में लगाए थे पौधे, जो अब पेड़ बन चुके हैं।

घाव भरते नजर आ रहे, कहीं मदद का इंतजार
पेटलावद में तीन वर्ष पूर्व हुए ब्लास्ट के घाव अब भरते नजर आ रहे हैं। कहीं शासन-प्रशासन की मदद, तो कहीं लोगों ने अपनी जीवटता से इन घावों से पार पाया है। ब्लास्ट स्थल पर भी अब चहल-पहल नजर आने लगी है। यहां जो डर का वातावरण बन गया था, धीरे-धीरे वो खत्म हो रहा है। एक साल पहले तक लोग इस जगह के पास जाने से डरते थे। घटनास्थल के ठीक सामने अब चाय की गुमटी लग चुकी है। पास की सेठिया रेस्टोरेंट होटल का भवन भी दुरुस्त किया जा रहा है तो पटवा अभिकरण पर तीन मंजिला इमारत बन गई।

बदला-बदला नजारा
जिस भवन में ब्लास्ट हुआ था, वहां एक दीवार बनाकर छोड़ दिया गया है। राठौड़ परिवार में दो मुखिया गंगाराम राठौड़ और मुकेश राठौड़ की इस हादसे में मौत हो गई थी। अब उनके परिवार में बुजुर्ग दादी और दो पोते हैं, जिन्हें अभी सहारे की जरूरत है। इसलिए अभी तक वह अपनी भूमि पर कोई निर्माण नहीं कर पाए हैं, लेकिन आसपास के दो मकान जो बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हुए थे, वहां का नजारा अब बदलता जा रहा है। जो दीवारें टूटी थीं, उन्हें एक बार फिर सही कर लिया गया है। वहीं पास का शोरूम तो दो वर्ष से ही बनकर तैयार हो चुका है। वहां ऊपरी मंजिल पर अब दो मंजिलों का निर्माण हो चुका है। मुख्य ब्लास्ट स्थल की जगह पर एक चाय की दुकान चल रही है। जहां बाहर से आने वाले ग्रामीण और नगरीय क्षेत्र के लोग बेखौफ होकर चाय की चुस्कियों का आनंद ले रहे हैं।

महिलाओं की हिम्मत को सलाम
ब्लास्ट के बाद कई परिवारों के मुखियाओं के चले जाने से परिवारों पर संकट के गहरे बादल छा गए थे, लेकिन उन परिवारों की महिलाओं ने जज्बा दिखाते हुए लगातार संघर्ष कर अपने परिवार को उन मुसीबतों से निकालकर आज फिर जीवन की गाड़ी को पटरी पर ले आई हैं। ऐसी एक या दो महिलाएं नहीं, नगर में लगभग दर्जनों महिलाएं ब्लास्ट के बाद उदाहरण बनकर उभरी हैं, जिन्होंने अपने पति, भाई या पिता की असमय मौत के बाद अपने परिवार को सहारा देकर जीवनशैली बदलकर उनके लिए कुछ कर गुजरने का साहस दिखाया है। इसमें वे सफल भी हुई हैं और अपने परिवार को एक बार पुनः आगे बढ़ा रही हैं। इन महिलाओं ने बताया कि जो चला गया, उसका दुख तो मन में हमेशा रहेगा, लेकिन हमारी परिवार के प्रति जो जिम्मेदारी है, उसे बखूबी निभाकर हमारे उन परिजनों का ही सपना पूरा करना उद्देश्य बन चुका है।

श्रद्धांजलि चौक वैसा ही रहा
नया बस स्टैंड पर बना श्रद्धांजलि चौक आज भी जस का तस है। यहां लोग आज भी आकर मृतकों को श्रद्धांजलि देते हैं। यहां तक कि कई आदिवासी तो इस स्थान पर आकर धूप-ध्यान भी कर जाते हैं। वार-त्योहार अपनों की याद में कई तरह के आयोजन इस चौक पर हो रहे हैं।

कई जख्म अब भी नहीं भर पाए
ब्लास्ट के कई जख्म ऐसे हैं, जो अब भी नहीं भरे हैं। इन्हें भरने के लिए प्रशासन ने अपने स्तर से, तो ग्रामीणों और नागरिकों ने अपने स्तर से प्रयास भी किए हैं। वे आज भी दिखाई दे रहे हैं। इनमें कुछ घायल ऐसे हैं, जो न चाहते हुए भी ब्लास्ट के जख्म के रूप में दिखाई देते हैं। इनमें झौंसर का युवक सोहन खराड़ी भी है, जो अपने भाई को रामदेवरा से लौटने पर लेने आया था। ब्लास्ट के धमाके में उसकी आंखों में बारूद घुसा तो रोशनी ही चली गई। सोहन ने प्रशासन से प्राप्त मदद और अपने स्वयं के खर्च पर भी बहुत इलाज करवाया, लेकिन आज भी उसे जो धुंधला दिखता है, उसमें भी ब्लास्ट की याद आ जाती है। इसी प्रकार मानसिंह सुरसिंह भाबर के पेट में घाव होने से लगभग 1 किलोग्राम मटेरियल निकला था। मानसिंह का कहना है कि बादल होने पर पूरा शरीर असहनीय दर्द करता है। इसका कोई इलाज नहीं हो पा रहा है।

रामदेवरा से पैदल आ रहा था
ग्राम झौसर के 15 वर्षीय युवक मानसिंह रामचंद्र भाबर रामदेवरा से पैदल आ रहा था। वह सेठिया रेस्टोरेंट पर चाय पीने के लिए रुका था, लेकिन इस बीच ब्लास्ट हो गया और इसमें वह चल बसा। शासन-प्रशासन ने मानसिंह की मां से वादा किया था कि तुम्हें या तुम्हारे दूसरे पुत्र को नौकरी देंगे। आज तक इस दिशा में कोई पहल नहीं हुई है। मानसिंह का भाई नौकरी का आवेदन लेकर दफ्तरों के आज भी चक्कर काट रहा है।

11पीईटी-01ए- पेटलावद ब्लास्ट स्थल के आसपास के भवनों में भी सुधार हुआ।

11पीईटी-02बी- भाई की याद में लगाए गए पौधे अब पेड़ का रूप ले चुके हैं।

11पीईटी-03सी- नगर में ब्लास्ट की बरसी पर श्रद्धांजलि के पोस्टर लगने लगे।

11पीईटी-04डी- तीन वर्ष बाद भी सोहन पूरी तरह साफ नहीं देख पाता।

11 पीईटी-05ई- भाई मांगू की मौत के तीन वर्ष बाद भी नौकरी का इंतजार है इस युवक को।

Posted By: Nancy Bajpai