यशा माथुर। मिथिला की शान हैं गोदावरी दत्त। 90 साल की उम्र है लेकिन जोश और समर्पण बरकरार है। मधुबनी कला को घर की दीवारों से निकाल कर अंतरराष्ट्रीय पटल पर लेकर आने में उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। पांच दशक से इस कला को समेटती, संवारती और समृद्ध करतीं गोदावरी को अब जब पद्मश्री मिला है तो वे कह रही हैं कि मेरी तपस्या को मिला है फल...

तपस्या का फल है पद्म श्री
प्रशासन और मेरे प्रशंसक चाहते थे कि मुझे पद्मश्री मिले लेकिन काफी देर से मिला। लगता नहीं था कि मुझे मिलेगा लेकिन मेरे परिश्रम और तपस्या का फल है यह। मुझे लगता है कि हमारी कला पर मिथिला की महारानी सीता जी का वरदान है। महिलाओं की जिंदगी बदल गई है इस कला से। यह हमारी संस्कृति है, हर घर में होती है लेकिन घर में ही सिमट कर रह जाती थी। 1965 के बाद से यह बाहर आई है। 1970 के बाद ललित नारायण मिश्रा ने मधुबनी में हैंडीक्राफ्ट का ऑफिस खुलवाया और हम कलाकारों की मदद की। इसके बाद मैं देश-विदेश में अपने काम का प्रदर्शन कर मिथिला कला को आगे लेकर गई।

मेरी कला गुरु मेरी मां
मेरी मां सुभद्रा देवी बहुत बड़ी कलाकार थीं। जब मैं बहुत छोटी थी, पांच-छह साल की थी तो जब मां पेंटिंग करतीं तो मैं उसमें अपना हाथ चला देती थी। मां का डर लगता लेकिन मां कहतीं कि तुम हाथ चलाओ। कुछ बिगड़ेगा तो हम ठीक करेंगे। वे मुझे प्रोत्साहित करती रहीं। मेरी कला गुरु मेरी मां रही हैं। हमारे यहां ब्याह-शादी में यह कला अनिवार्य है। हर परिवार में लड़के-लड़की की शादी में इस कला का बहुत काम होता है। कागज पर इसे उकेरा जाता है। कोहबर, मंडप में बनाया जाता है। जरूरी है कि सबको इसका ज्ञान हो। बांस के डाला पर कागज लगाकर उस पर मिथिला पेंटिंग की जाती है और शादी का सामान रख कर दिया जाता है। मिट्टी की दीवारों पर इसे बनाया जाता है।

मिथिला आर्ट बिहार की संस्कृति
मिथिला आर्ट बिहार की संस्कृति है। बचपन में ही हर मां घर के काम के साथ-साथ अपने बच्चों को यह कला सिखाती थीं। हर गांव में गुरुजी सब बच्चों को दालान में पढ़ाते थे। मैं भी पढ़ती और मां से कला सीखती थी। मैंने ब्याह-शादी से लेकर, राम-सीता, राधा-कृष्ण तक काफी चित्र बनाए हैं। इसके अलावा मोर, सुआ बनाना शादी में शुभ माना जाता है। जब मैं इस कला में आगे बढऩे लगी तो कोई भी जो बनाने को कहता तो मैं बना देती थी। मैंने बहुत सारे चित्र बनाए हैं। चाहे कितनी ही देर लगे लेकिन मैं अच्छे और साफ-सुथरे चित्र बनाती हूं।

जापान में बना म्यूजियम
जापान में म्यूजियम के लिए मिथिला पेंटिंग बनाने मैं सात बार जापान गई। मैं सोच भी नहीं सकती थी कि एक अकेली औरत जापान जाकर अपरिचित परिवार के साथ घुलमिल कर रह सकती है, मिथिला पेंटिंग्स बना सकती है। छह महीना वहां रहती और छह महीना यहां। हमारा एंबेसी से संबंध रहता था। उस म्यूजियम के डायरेक्टर टोकियो हासेगावा ने मुझे कहा कि आप यहां अपना काम करने आए हैं। आप जो बनाएंगे उसे हम मिथिला म्यूजियम में रखेंगे। हमने वहां लकड़ी के बोर्ड पर सीमेंट डालने के बाद बनी सरफेस पर काम किया। वे कहते कि यह मिथिला की वॉल पेंटिंग है। वहां मैंने अद्र्धनारीश्वर बनाए जिनके एक हाथ में डमरू था और एक हाथ में त्रिशूल। उसे बनाने के बाद डायरेक्टर ने डमरू बनाने की रिक्वेस्ट की। आठ फीट लंबे और सात फीट चौड़ाई के डमरू का डिजाइन मैंने बनाया। फिर त्रिशूल बनाया। वे मेरे डिजाइन को काफी पसंद करते।

हैंडपेंटिंग देख चौंक गए लोग
जापान के उस म्यूजियम के डायरेक्टर ने बताया था कि पहले मैं मिथिला से पेंटिंग लाकर बेचता था लेकिन जब मैंने प्रदर्शनी में लोगों को बताया कि इसे हाथ से बनाए गए रंगों द्वारा कलाकारों ने बनाया है तो उन्होंने विश्वास नहीं किया और कहा कि यह तो प्रिंट जैसा लगता है। तब कला के कद्रदानों ने कहा कि आप कलाकारों को लाकर हमें डेमो दिखाएं तब हम मानेंगे। इसलिए वे हमें जापान लेकर गए। जब सातवीं बार के बाद मैं वापस आने लगी तो उन्होंने डाइनिंग टेबल पर कहा कि हम भारत सरकार को बताएंगे कि आपके देश के मिथिला क्षेत्र से कलाकारों को लाकर जापान जैसे देश में मैंने मिथिला म्यूजियम खड़ा किया है आपके देश में एक भी म्यूजियम नहीं है जिसमें इन कलाकारों की पेंटिंग रखी गई हो। आने वाली पीढ़ी इनकी कला देखने के लिए जापान आएगी।

बिहार म्यूजियम में कोहबर की पेंटिंग
वहां से आने के बाद मैंने दिल्ली, कोलकाता, मुंबई और मिथिला में सरकार के अधिकारियों से प्रार्थना की कि आप एक म्यूजियम बनाइए। काफी प्रयासों के बाद यह कामना पूरी हुई। हमारा सौभाग्य है कि बिहार म्यूजियम बना है। इसमें सब आर्ट रखे हैं। मेरी भी बारह बाई अठारह फीट साइज के कैनवास पर लाल रंग से कोहबर की पेंटिंग लगाई गई है, जिसे काफी पसंद किया गया है। अब तो सरकार मिथिला आर्ट पर काफी काम कर रही है। सरकार ने मधुबनी, दरभंगा और पटना जैसे स्टेशनों पर पेंटिंग लगाई हैं।

नई पीढ़ी है तैयार
मैंने अपना पूरा जीवन इस कला को समर्पित कर दिया। एक बेटा है मेरा, चार पोतियां और एक पोता है। चारों पोतियों को भी मैंने मिथिला कला में निपुण कर दिया है। वे घर से ही कपड़े पर काम करती हैं जिससे उनको आय भी होती है। जब मुझे शिल्प गुरु सम्मान मिला तो गिनती की गई कि मैंने कितने बच्चों को ट्रेनिंग दी है। तो पता चला कि 49 हजार बच्चों को मैंने कला सिखाई है। गांव की महिलाओं को लोन देकर व्यवसाय में लगाया है। वे कुशल कारीगर बन गई हैं।

इस धरोहर को जिंदा जरूर रखें
12 देशों में अपनी कला की प्रदर्शनी लगा चुकी हूं। जर्मनी भी गई। तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने राष्ट्रीय पुरस्कार दिया। कई बार भारत सरकार की तरफ से ट्रेंनिंग दी। सीसीआरटी ने कई बार मुझे बुलाया। अभी भी बुलाते हैं लेकिन पैरों से चल नहीं सकती। हड्डी और नसें कमजोर हो गई हैं। उम्र बहुत हो गई है। 1930 का जन्म है मेरा। हमने अपने घर पर भी पेंटिंग बनाई है। हम कागज और दीवार पर लाइन पेंटिंग बनाते हैं। मैं हमेशा से महिलाओं को बोलती आई हूं कि आप इस कला से जुड़ें, किसी को देरी से भी समझ में आएगा लेकिन साहस न छोड़ें, एक दिन आप जरूर सफल होंगी। घर से किसी भी समय काम कर सकती हैं। बहुत व्यवसाय चल रहे हैं। मैं चाहती हूं कि लोग इस धरोहर को जिंदा जरूर रखें। 

Posted By: Sanjay Pokhriyal