नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) में स्कंदगुप्त विक्रमादित्य पर आयोजित दो दिन की गोष्ठी ने एक बार फिर लोगों को इतिहास के पन्ने पलटने पर मजबूर कर दिया है। विक्रमादित्य का नाम तो गाहे बगाहे लोगों के कानों में पड़ भी चुका है मगर स्कंद गुप्त का नाम कम ही लोगों ने सुना होगा। इतिहास के जानकार ही गुप्त वंश के इस शासक की वीरगाथा को जानते हैं, इसके अलावा अब न तो इन पर छोटे पर्दे पर कोई सीरियल बना ना ही कोई किसी अन्य तरह से इनके बारे में आम लोगों तक कोई जानकारी पहुंच पाई।

अब जब बीएचयू में दो दिन की गोष्ठी का आयोजन किया गया तो हर किसी को स्कंद गुप्त का नाम सुनने को मिला, इसी के बाद लोगों के मन में उत्सुकता जगी कि आखिर ये स्कंद गुप्त कौन थे जिनके जीवन पर दो दिन की गोष्ठी का आयोजन किया गया है। हम आपको बताते हैं कि जिन स्कंद गुप्त का गृहमंत्री अमित शाह ने मंच से नाम लिया वो कितने पराक्रमी और गुप्त राजवंश के कितने महान राजा थे। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि स्कंदगुप्त विक्रमादित्य के साथ इतिहास में बहुत अन्याय हुआ है। उन्हें इतनी प्रसिद्धि नहीं मिली, जिनके वह हकदार थे। बता दें, स्कंद गुप्त ने भारतीय संस्कृति, भारतीय कला, भारतीय भाषा और भारतीय शासन काल को बचाने का काम किया था।

भारत में स्कंद गुप्त का इतिहास 

प्राचीन भारत में स्कंद गुप्त तीसरी से पांचवीं सदी तक शासन करने वाले गुप्त राजवंश के 8 वें राजा बताए जाते हैं। उस समय इनके राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र हुआ करती थी जो आज के समय में पटना के रूप में बिहार की राजधानी है। स्कंदगुप्त विक्रमादित्य ने उस समय जितने भी साल तक शासन किया था, उतने ही साल तक युद्ध लड़ा था। स्कंद गुप्त ने ही मध्य एशिया के कबीलाई हुणों को युद्ध में हराकर पराजित किया था। हूण भारत पर आक्रमण कर कश्मीर और गुजरात पर विजय प्राप्त करते हुए पाटलिपुत्र तक पहुंच गए थे, लेकिन स्कंद गुप्त ने उन्हें अपने पराक्रम से न सिर्फ पराजित किया था बल्कि हुणों को देश से बाहर तक खदेड़ा भी था।

स्कंद गुप्त की शासन नीति 

यद्यपि स्कंद गुप्त का शासनकाल महान शासन का युग कहा जाता था। मगर उन्हें भी दीर्घकाल तक संकटों से जूझना पड़ा था। ये भी कहा जाता है कि स्कंद गुप्त के शासनकाल में न तो कोई विद्रोह हुआ ना ही कोई बेघर हुआ। वो बहुत ही संयमित तरीके से शासन चलाया करते थे।

विक्रमादित्य की उपाधि धारण की 

स्कंद गुप्त ने हुणों और पुष्यमित्रों को लड़ाई में पराजित किया। इन दोनों को अपने कुशल नेतृत्व व योग्यता की बदौलत ही वो हराने में कामयाब हुए। इसी के बाद उन्होंने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की। उन्होंने विष्णु स्तम्भ का निर्माण भी करवाया था।

कौन थे हूण 

तीसरी से पांचवीं सदी के दौरान हुणों का आतंक था। हूण लड़ाई के मामले में बड़े योद्धा माने जाते थे। इन्होंने पूरी दुनिया में कब्जा करने का अभियान चलाया था। इन्होंने चौथी और पांचवी सदी में दुनिया पर अपना आधिपत्य फैलाया था। इतिहासकारों का कहना है कि हूण वास्तव में चीन के पास रहने वाली एक जाति थी, इन्हें चीनी लोग ह्यून-यू या हून-यू कहकर बुलाते थे। ये भी कहा जाता है कि चीन की विशाल दीवार का निर्माण इन हुणों के आक्रमण से बचाने के लिए ही किया गया था। इसी वजह से चीन इन हुणों के आक्रमण से बच गया था। इसके बाद हुणों ने भारत पर आक्रमण करने की रणनीति बनाई। हुणों के आक्रमण से भारत को बचाने का काम स्कंद गुप्त ने किया था।

विनाश का तांडव करते थे हूण 

हूण जिस भी देश पर आक्रमण करते थे वो उसे पूरी तरह से तबाह कर देते थे। वहां पर विनाश का तांडव खेला जाता था। हूण मासूम बच्चों को मार देते थे, महिलाओं को उठाकर ले जाते थे, सामूहिक नरसंहार कर देते थे, पुस्तकालय को जला देते थे, विश्वविद्यालय को नष्ट कर देते थे। हुणों की इस तरह के बर्बर आक्रमण की वजह से ही देशभर की अनेक संस्कृति तहस नहस हो गई थीं।

जब यूरोप कर दिया खत्म तो भारत की ओर बढ़े थे हूण 

हुणों से बचाने के लिए चीन की दीवार बनाई गई थी, जिसके कारण चीन तो बच गया लेकिन इससे पहले इनके हमले से रोम, यूरोप, इटली और फ्रांस इनके आक्रमण पूरी तरह से खत्म हो चुके थे। इसके बाद हुणों ने भारत की ओर रूख किया। उन्होंने यहां के राज्यों पर आक्रमण करना शुरू किया।

10 सालों तक लड़े फिर हुणों को किया भारत से बाहर 

जब हूण पाटलिपुत्र पहुंचे तो स्कंद गुप्त के पिता कुमार गुप्त बहुत परेशान थे, वो दुविधा में थे कि अब क्या होगा? हुणों की लड़ाई के बारे में उनको भी पता चल चुका था। वो ये सोच रहे थे कि जब हूण इतनी बुरी तरह से नरसंहार करते थे और इतने बर्बर है तो उनका सामना राज्य में आखिर कौन कर पाएगा? इसी के बाद स्कंद गुप्त सामने आए और उन्होंने अपने पिता जी से कहा कि मैं जाऊंगा और समस्त हुणों को देश के बाहर खदेड़ दूंगा। उसके बाद उन्होंने हुणों से लड़ने के लिए कमर कसी और खुद को तैयार किया था। उनकी हुणों से 10 साल तक लड़ाई चली। देश के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक लड़ाई हुई। जूनागढ़ से लेकर कश्मीर तक, कश्मीर से लेकर पाकिस्तान के कंधार तक उन्होंने हुणों का खात्मा किया। वो पहले ऐसे राजा थे जिन्होंने हुणों को हराया था।

सुदर्शन झील का निर्माण 

स्कंद गुप्त के शासन काल की सबसे महत्वपूर्ण घटना सुदर्शन झील के बांध को बनवाने की भी थी। इस झील का इतिहास बहुत पुराना है। सबसे पहले चन्द्र गुप्त ने एक नदी के जल को रोककर इस झील का निर्माण कराया। बाद में सम्राट अशोक ने सिंचाई के लिए उसमें से नहर निकाली। एक बार 150 वीं ईस्वी में बांध टूट गया तब इसका जीर्णोंद्धार करवाया गया था। 456 ईंस्वी में उस झील का बांध फिर टूट गया जिससे सौराष्ट्र के लोगों को काफी नुकसान हुआ। इसके बाद स्कंद गुप्त ने अपने कोष से इसे ठीक कराने में काफी पैसे खर्च किए और इसे ठीक कराया। इसके बाद इसी जगह पर विष्णु जी का एक मंदिर बनवाया गया।  

Posted By: Vinay Tiwari

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