नई दिल्‍ली जागरण स्‍पेशल। करीम लाला और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की जेल में मुलाकात के मुद्दे ने महाराष्‍ट्र ही नहीं राष्‍ट्रीय राजनीति गरमा कर रख दिया है। शिवसेना के मुखपत्र सामना में छपे इस दावे के बाद सियासी मैदान में बयानबाजी भी शुरू हो गई है। हालांकि सियासी पारा चढ़ने के बाद राउत ने अपना बयान वापस भी ले लिया। वहीं इस बयानबाजी के पीछे की कुछ टाइमिंग पर यदि नजर डाली जाए तो कुछ दिलचस्‍प चीजें निकलकर सामने आती हैं। इस खबर का इस वक्‍त सामने आना भी बेहद खास है। गौरतलब है कि 28 नवंबर 2019 को शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की थी। इसके बाद 30 दिसंबर को ठाकरे ने अपने केबिनेट का विस्‍तार किया था। इस विस्‍तार को लेकर कांग्रेस समेत शिवसेना के नेता ने खुले तौर पर अपनी नाराजगी जाहिर की थी। इसमें एक नाम संजय राउत के भाई सुनील राउत का भी है। 

सरकार में भाई को जगह न मिलने से नाराज है राउत 

आपको बता दें कि संज राउत मराठी सामना के एग्‍जीक्‍यूटिव एडिटर हैं। महाराष्‍ट्र की गठबंधन सरकार के गठन के बाद ही संजय के कई बयान सामने आए हैं। केबिनेट विस्‍तार को लेकर उन्‍होंने खुलेतौर पर तो अपनी नाराजगी व्‍यक्‍त नहीं की थी लेकिन उनके भाई के बयान के बाद उनकी इस मामले में नाराजगी की बात सामने जरूर आई थी। हाल ही में उन्‍होंने महाराष्‍ट्र सरकार में मंत्रिपद को लेकर मची रार के वक्‍त भी बयान दिया था कि मंत्रिमंडल में युवाओं को जगह दी जानी चाहिए थी। उनकी इस तरह की बयानबाजी को उनकी नाराजगी का ही परिणाम माना जा रहा है। आप को यहां पर ये भी बता दें कि राजनीति में आने से पहले राउत सामना के क्राइम रिपोर्टर रह चुके हैं। उन्‍होंने एक कार्यक्रम में यहां तक खुलासा किया था कि इस दौरान वह अंडरवर्ल्‍ड के डॉन दाऊद समेत कई दूसरे लोगों से मिल चुके थे। 

राउत के बयान ने बढ़ाया सियासी पारा 

बहरहाल, राउत ने हाल ही में जिस बयान से देश की राजनीति के ज्‍वार को बढ़ा दिया है उसमें दोनों ही नाम बेहद खास हैं। करीम लाला कभी मुंबई के अंडरवर्ल्‍ड में शीर्ष पर था। इतना ही नहीं कहा तो यहां तक जाता है कि उसने डी कंपनी के सर्वेसर्वा दाऊद इब्राहिम को लात और घूसों से पीटा था। यह हाजी मस्‍तान के अंडरवर्ल्‍ड डॉन बनने से भी पहले की कहानी है। करीम लाला का असली नाम अब्‍दुल करीम शेर खान था। करीब का जन्‍म अफगानिस्‍तान में हुआ था। मूल रूप से वह पश्‍तून था। बड़े होने पर जब उसको काम धंधे की दरकार हुई तो उसने भारत की राह पकड़ी थी। 1930 में वह पेशावर से होते हुए मुंबई पहुंचा था। यहां पर उसने शुरुआत में छोटे-मोटे काम किए थे। लेकिन जल्‍द से जल्‍द ज्‍यादा पैसा कमाने की चाहत ने उसको अपराध की दुनिया की तरफ धकेल दिया था। 

किराए के मकान से शुरू किया अपराध का सफर 

मुंबई में उसकी शुरुआत ग्रांट रोड स्टेशन के पास लिए गए एक किराए के मकान से हुई थी। यहां से ही उसने अपराध की सीढि़यां चढ़नी शुरू की थीं। करीम को इस बात की जानकारी थी कि इस शहर में जुआरियों की कोई कमी नहीं है। ये लोग अपना शौक पूरा करने के लिए कहीं तक भी जा सकते हैं। यही वजह थी कि करीम ने इस घर में उसने जुए का अड्डा खोला था। कुछ ही समय में उसका खोला ये जुआ घर आस-पास के इलाकों में भी पहचान पाने लगा था। कम समय में ही उसका ये जुआघर पूरी मुंबई की एक पहचान बन चुका था। समय गुजरने के साथ इसका ये घर क्‍लब में बदला और यहां पर नामी-गिरामी लोग आने लगे थे। 

तस्‍करी के धंधे में आजमाया हाथ 

इसमें कामयाब होने के बाद उसने अपना हाथ तस्‍करी के धंधे में आजमाया। मुंबई यूं भी पहले से ही तस्‍करी का बड़ा अड्डा था। यहां पर समुद्र के रास्‍ते काफी मात्रा में सोना तस्‍कर किया जाता था। ये वो दौर था जहां देश में आजादी को लेकर मुहिम चल रही थी, वहीं करीम अपराध की दुनिया में लगातार धंसता जा रहा था और बड़ा नाम बनता जा रहा था। तस्‍करी के धंधे में भी उसको काफी फायदा हुआ था। आजादी के बाद करीम लाला मुंबई का बड़ा नाम बन चुका था। इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि अपना काम निकलवाने के लिए लोग सुबह से ही उसके पास आना शुरू कर देते थे। करीम लाला के साथ ही वरदाराजन और हाजी मस्‍तान भी अंडरवर्ल्‍ड में अपना राज कायम करने की तरफ आगे बढ़ रहे थे। 

दाऊद-करीम में गैंगवार

एक समय वो भी आया जब इन तीनों ने आपस में धंधों को बंटवारा कर लिया। इसकी एक वजह गैंगवार को खत्‍म करना था। इतना ही नहीं इन तीनों ने अपने-अपने इलाके भी बांट लिए थे। इस दौर में दाऊद इब्राहिम ने भी अपराध की दुनिया में कदम रखा था। दाऊद ने इसकी शुरुआत हाजी मस्‍तान के साथ मिलकर की थी। दाऊद के सपने करीम से भी ज्‍यादा ऊंचे थे। यही वजह थी कि समझौते के बाद भी उसने करीम के इलाके में तस्‍करी समेत अन्‍य धंधों में हाथ आजमाना शुरू कर दिया। इस तरह की लगातार होती घटनाओं ने करीम को गुस्‍से में ला दिया था। एक बार दाऊद करीम के हत्‍थे चढ़ गया और उसने उसकी जबरदस्‍त पिटाई लगाई थी। दाऊद ने किसी तरह से बचकर अपनी जान बचाई थी। हालांकि इसके बाद भी वह नहीं रुका था। इसके बाद इन दोनों के बीच कई बार गैंगवार हुआ। इसका नतीजा था कि 80 के दशम में करीम ने जहां दाऊद के भाई शब्‍बीर की हत्‍या करवाई वहीं दाऊद ने करीम के भाई रहीम को ठिकाने लगा दिया था।

अपने भतीजे को सौंपी थी गैंग की कमान  

80 के दशक की शुरुआत में करीम ने सेहत में आई गिरावट के चलते अपने गैंग की कमान अपने भतीजे समद खान को सौंपनी शुरू कर दी थी। वह करीम का होटल और ट्रांसपोर्ट का बिजनेस संभालता था। करीम की पार्टियां एक समय में मुंबई में सबसे अधिक प्रचलित हुआ करती थीं। उस वक्‍त करीम की पार्टी में बॉलीवुड से जुड़ी बड़ी हस्तियां तक शामिल होते थे। बॉलीवुड की फिल्‍म जंजीर में बना शेर खान का किरदार जिसको प्राण ने जीवंत किया था, करीम से ही मिलता जुलता था।  2002 में करीम की मौत 90 वर्ष की आयु में 19 फरवरी को मुंबई में हुई थी। 

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Posted By: Kamal Verma

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