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    मुनीर नियाजी की पुण्यतिथि पर विशेष: शहर के रंगों का पेंटर एक फक्कड़ शायर

    By TaniskEdited By:
    Updated: Wed, 26 Dec 2018 05:00 AM (IST)

    शायरी में जब लोग क्लासिकी से अधिक प्रभावित थे तब मुनीर नियाज़ी ने अलग डिक्शन गढ़ा। शुरूआती कुछ ग़ज़लों को छोड़ दें तो उनका सारा कलाम उनकी अपनी नुमाइंदगी करता है।

    मुनीर नियाजी की पुण्यतिथि पर विशेष: शहर के रंगों का पेंटर एक फक्कड़ शायर

     नवनीत शर्मा,जेएनएन।

    आदत ही बना ली है तुमने तो मुनीर अपनी 

    जिस श्‍हर में भी रहना, उकताए हुए रहना 

    अब वो घर बाक़ी नहीं पर काश उस ता'मीर से 

    एक शहर-ए-आरज़ू आँखों के आगे जागता 

    वापस न जा वहाँ कि तेरे शहर में 'मुनीर'

    जो जिस जगह पे था वो वहाँ पर नहीं रहा

    जानता हूँ एक ऐसे शख्स को मैं भी 'मुनीर'

    गम से पत्थर हो गया लेकिन कभी रोया नहीं

    इस शहर-ए-संगदिल को जला देना चाहिए 

    फिर उस की खाक को भी उड़ा देना चाहिए 

    पंजाब का एक शहर है होशियारपुर....पूरे पंजाब में हरियाली होगी लेकिन इधर अधिक है। गुड़मंडी की मिठास है और रेलवे रोड पर जूस पीने का ज़ायका ही अलग। जालंधर की तरफ जाएं तो शाम चौरासी है जिसके नाम पर संगीत का घराना भी है। चंडीगढ़ की तरफ जाएं तो चब्बेवाल से अंदर को गंज-ए-शकर बाबा शेख फरीद साहब की मजार है। गन्ने, किन्नू, तरबूज क्या-क्या नहीं है। पंजाब सरकार का एक बोर्ड होशियारपुर को संतों का शहर भी बताता है। शायरी का एक संत उसी शहर की मुस्कान बांटता फिरा...

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    यह थे मुनीर नियाजी। मुनीर नियाजी यानी एक और शिकार..... वतन के बंट जाने का। हिजरत करनी पड़ी। और लहजे में इंतज़ार हुसैन तथा अंबाला वाले नासिर काज़मी की तरह दर्द बरकरार रहा। यहां तक कि प्रीतम, मीत, खोज, दीप....जैसे हिंदुस्तानी शब्द उनकी शायरी में आते ही हैं। यह खूबी परवीन शाकिर में भी है जिनके यहां 'मनोहर,' 'शाम मैं तेरी गइयां चराऊं' तक का असर है। परवीन शाकिर की जड़ें बिहार से जुड़ी थीं। बहरहाल, मुनीर नियाज़ी साहब ने मिंटगुमरी में दसवीं तक पढ़ाई की, श्रीनगर भी गए, दयाल सिंह कॉलेज लाहौर में भी पढ़ाई की और इस्लामिया कॉलेज जालंधर में भी रहे। कई किताबें। उर्दू, पंजाबी और अंग्रेजी....सब पर पूरा अधिकार। अपनी तरह की बिलकुल अलहदा शख्सियत।

    शायरी में भी और जीवन में भी। शायरी में जब लोग क्लासिकी से अधिक प्रभावित थे,  मुनीर नियाज़ी  ने अलग डिक्‍शन गढ़ा। शुरूआती कुछ ग़ज़लों को छोड़ दें तो उनका सारा कलाम उनकी अपनी नुमाइंदगी करता है। वे तो सबको पसंद आते थे लेकिन उन्‍हें कोई पसंद नहीं आता था। कई साक्षात्कारों में उन्होंने कहा कि मुझे कोई पसंद नहीं आता। उन्‍होंने य‍हां तक कहा कि पाकिस्तान बनने के बाद असली कोई बड़ा शायर पाकिस्तान में नहीं हुआ।

    यह उनका आत्मकेंद्रित होना था या फिर एक शायर के तौर पर अपने आत्‍मसम्‍मान को बचा कर रखने का तरीका लेकिन वह औरों में ढलते नहीं थे। पाकिस्‍तानी विद्वान डॉ. मंजूर एजाज मुनीर नियाजी के समकालीन रहे हैं, लिहाजा उनके पास कई किस्‍से इस फक्‍कड़ शायर के हैं। एक बार किसी ने कहा कि हमें चल कर भुट्टो के साथ मिलना चाहिए। नियाजी साहब ने कहा कि मिलना तो चाहिए क्‍योंकि उसे लोगों ने चुना है... लेकिन तरीके से। किसी ने कहा कि चलेंगे तो उनके साथ स्कॉच पीएंगे।मुनीर नियाजी ने कहा, ' एक शायर हुक्मरान से बात करने जाए, यह तो ठीक है लेकिन स्‍कॉच पीने जाए, यह मामला जमा नहीं। स्‍कॉच घर में पड़ी है, यहीं पी लो।' 

    अजीब किस्से हैं उनके। लाहौर में उनके घर में एक पत्रकार गया तो उसने पाया कि उनके घर में खिड़कीनुमा चीज से होकर दाखिल होना पड़ता है। उसने जब पूछा तो मुनीर साहब ने कहा, ' औरतों ने कहा कि यहां दरवाजा नहीं बनाइए। इसे ऐसे ही रहने दीजिए। थ्रिल सा होता है जैसे चोर दरवाजे से एंटर कर रहे हों।' सबसे अलग मुनीर नियाज़ी... शायद इसीलिए ऐसा शेर हुआ  

    मुझ में ही कुछ कमी थी कि बेहतर मैं उन से था 

    मैं शहर में किसी के बराबर नहीं रहा

    मुंह पर कह देने की आदत थी कि यार यह ठीक नहीं है। फैज साहब का एक शेर उन्हें पसंद था, 

    ये दाग़ दाग़ उजाला ये शब-गज़ीदा सहर

    वो इंतिज़ार था जिस का ये वो सहर तो नहीं 

    और पाकिस्तान के बड़े शायर अहमद नदीम कासमी से तो उनकी कभी नहीं पटी। उनके किसी शागिर्द से पूछा कि अच्‍छा तुम ही बताओ कि उनका कौन सा शे'र सबसे अच्‍छा है। शागिर्द ने बहुत सोच समझ कर अहमद नदीम कासमी का शेर पढ़ा 

    कौन कहता है कि मौत आएगी तो मर जाऊंगा

    मैं तो दरिया हूं समंदर में उतर जाऊंगा

    अब इस पर जो मुनीर नियाजी साहब ने कहा वह यूं हैं, ' क्या तुम मौत के साथ कबड्डी खेल रहे हो?'

    किसी ज़माने में पंजाब की खूबी होती थी जुगतबाजी। जुगत मारना यानी टक्‍साली शब्‍दों में तंज करना। एक बार अपने ही किसी और दोस्‍त के बारे में कहा कि यार वह तो ऐसी भीगी हुई भेड़ है कि उससे कुछ नहीं होगा।     

    लेकिन वह जहां भी गया, खुशबू, रंग, बाग, हवा आदि ऐसे शब्द हैं जिनसे मुनीर नियाजी का कलाम भरपूर रहा। दूसरा एक लफ्ज़ है शहर....जो मुनीर की शायरी में बार बार आया है। संयोगवश 

    उस बेवफा का शहर है और हम हैं दोस्‍तो

    अश्‍क-ए-रवां की नहर है और हम हैं दोस्‍तो

    मुनीर हमेशा मुकम्‍मल की तलाश में रहे। उनका सफर कभी खत्‍म नहीं हुआ। उनके एक शहर से ऊबने और नए शहर की तलाश में रहने को निदा फाजली के शब्‍दों में ऐसे कहा जा सकता है 

    नक्शा उठा के कोई नया शहर ढूंढि़ए

    इस शहर में तो सबसे मुलाकात हो गई

     

    अब देखिए मुनीर की तबीयत का खालिस रंग :  

    चमन में रंगे बहार उतरा तो मैंने देखा 

    नज़र से दिल का गुबार उतरा तो मैंने देखा

     

    गली के बाहर तमाम मंजर बदल गए थे 

    जो साया-ए-कू-ए-यार उतरा तो मैंने देखा 

    इक और दरिया का सामना था मुनीर मुझको 

    मैं एक दरिया के पार उतरा तो मैंने देखा 

    यह ग़ज़ल फरीदा खानम ने गाई और हिट हो गई थीं। उनका कलाम हुसैन बख्‍श गुल्‍लू और गुलाम अली साहब ने भी गाया। नूरजहां के बारे में कहते थे कि उन्‍हें आलमी सतह पर अधिक ही मशहूरी दे दी गई जबकि वह लता मंगेशकर से कहीं बेहतर नहीं हैं।

    दरअसल मुनीर शब्दों से पेटिंग नहीं बनाते बल्कि शब्द को ही पेंट कर देते हैं 

    इक तेज़ तीर था कि लगा और निकल गया 

    मारी जो चीख़ रेल ने जंगल दहल गया 

    सोया हुआ शहर था किसी सांप की तरह 

    मैं देखता ही रह गया और चांद ढल गया

    मुद्दत के बाद आज उसे देख कर मुनीर

    इक बार तो दिल धड़का मगर फिर संभल गया

    मुनीर नियाजी होना तब ही संभव है जब आदमी जिंदगी को उसके हर रंग में देखे...अपने परिवेश को समझे... राजनीतिक ढांचे को समझे....सामाजिक विसंगतियों और उसके तमाम रंगाें को देखे...अपूर्णता को रेखांकित करने की हिम्‍मत रखे...। देखिए ये रंग  

    फूल थे बादल भी थे और वो हसीं सूरत भी थी 

    दिल में लेकिन और ही इक शक्‍ल ही हसरत भी थी 

    जो हवा में घर बनाए काश कोई देखता 

    दश्‍त में रहते थे पर तामीर की हसरत भी थी 

    अजनबी शहरों में रहते उम्र सारी कट गई 

    गो ज़रा से फासले पर घर की हर राहत भी थी 

    दो शादियों के बाद भी वह बेऔलाद रहे। किसी पत्रकार ने पूछा कि दुख नहीं होता। उन्‍होंने जवाब दिया, ' मैं बहुत खुदापरस्‍त आदमी हूं, कोई दुख नहीं। इसमें भी कुछ अच्‍छा ही हुआ होगा।'  

    डॉ. मंजूर एजाज के माध्‍यम से पता चलता है कि मुनीर ने सारी उम्र सिर्फ शायरी की। उसके अलावा कुछ नहीं किया। इसलिए अपनी हर ग़ज़ल का मेहनताना वह जरूर हासिल करते थे। जब अपना पर्चा निकाला तो लोगों को रायल्‍टी भी खूब दी। बेगम ने कहा कि मुनीर, तुम्‍हें तो पैसे नहीं मिलते थे। तो पंजाबी में कहा, ' उस वक्‍त तराजू औरों के हाथ में था, अब मेरे हाथ में है तो मैं डंडी नहीं मार सकता।'

    हालांकि एक लंबा वक्‍त गरीबी में निकाला। शुरू का सिलसिला इसलिए चलता रहा क्‍योंक‍ि साहीवाल में नियाजियों का ट्रांसपोर्ट का बड़ा काम था। लेकिन बाद में गरीबी आई। फिर पाकिस्‍तान सरकार से सितारा-ए-इम्तियाज़ भी मिला। 

    पाकिस्‍तान के बड़े पत्रकार, स्‍तंभकार हसन निसार कहते हैं, 'वह सर से पैर तक पूरी तरह शायर थे। उन जैसा बड़ा शायर कोई नहीं। जैसे गा़लिब एक ही थे, मुनीर नियाजी भी एक ही हो सकता था।' 

    इधर भारत के नामवर शायर सरवत जमाल कहते हैं, मुनीर नियाजी के लिए दो ही शब्‍द काफी हैं। एक तो यह कि वह लीजेंड थे और दूसरा यह कि वह बेमिसाल थे। 

    उन्‍होंने लिस खूबसूरती के साथ ग़ज़लें कहीं, उतने ही धारदार तरीके से नज्‍में भी लिखीं। 9 अप्रैल, 1928 को जन्‍म हुआ था और आज के दिन यानी 26 दिसंबर, 2006 को वह पर्दा फ़रमा गए। गालिब की जयंती से एक दिन पहले। यह भी अजब तथ्‍य है कि 26 दिसंबर के दिन ही शायरा परवीन शाकिर की भी 1994 में एक हादसे में मौत हो गई थी।

    अंतत: उनकी एक नज्‍म जो भारत के युवाओं में बेहद लोकप्रिय है 

    हमेशा देर कर देता हूँ मैं  

     

    ज़रूरी बात कहनी हो  

    कोई वादा निभाना हो  

    उसे आवाज़ देनी हो  

    उसे वापस बुलाना हो  

    हमेशा देर कर देता हूँ मैं 

      

    मदद करनी हो उसकी  

    यार का ढाढस बंधाना हो  

    बहुत देरीना रास्तों पर  

    किसी से मिलने जाना हो  

    हमेशा देर कर देता हूँ मैं  

     

    बदलते मौसमों की सैर में  

    दिल को लगाना हो  

    किसी को याद रखना हो  

    किसी को भूल जाना हो  

    हमेशा देर कर देता हूँ मैं  

     

    किसी को मौत से पहले  

    किसी ग़म से बचाना हो  

    हक़ीक़त और थी कुछ  

    उस को जा के ये बताना हो  

    हमेशा देर कर देता हूँ मैं