मुस्लिमों का चार फीसदी आरक्षण खत्म करने का कर्नाटक का फैसला प्रथम दृष्टया त्रुटिपूर्ण: सुप्रीम कोर्ट
याचिकाकर्ता के वकील दुष्यंत दवे के अलावा कपिल सिब्बल गोपाल शंकर भी पेश हुए और उन्होंने मुसलमानों का ओबीसी आरक्षण खत्म करने को गलत बताते हुए कहा कि सरकार ने बिना किसी अध्ययन और आंकड़ों के अचानक मुसलमानों का ओबीसी कोटा खत्म कर दिया।
नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक में मुसलमानों को ओबीसी श्रेणी में दिया जाने वाला चार प्रतिशत आरक्षण खत्म कर उसे वोक्कालिगा और लिंगायत में दो-दो प्रतिशत बांटने के कर्नाटक सरकार के आदेश (जीओ) पर टिप्पणी करते हुए गुरुवार को कहा कि इसे देखने से प्रथम दृष्टया निर्णय लेने की प्रक्रिया की नींव बहुत अस्थिर और त्रुटिपूर्ण प्रतीत होती है।
लगभग तीस साल से मुसलमानों को दिये जा रहे ओबीसी आरक्षण को अचानक अंतरिम रिपोर्ट के आधार पर समाप्त करने पर सवाल उठाते हुए कोर्ट जीओ पर अंतरिम रोक लगाने का इच्छुक दिखा, लेकिन कर्नाटक सरकार की ओर से जीओ के आधार पर 18 अप्रैल तक कोई भी प्रवेश या नियुक्ति न किये जाने का बयान देने के बाद कोर्ट ने कोई अंतरिम आदेश जारी नहीं किया और राज्य सरकार को मामले में जवाब दाखिल करने का समय देते हुए सुनवाई 18 अप्रैल तक के लिए टाल दी।
ये टिप्पणी न्यायमूर्ति केएम जोसेफ और बी.वी. नागरत्ना की पीठ ने कर्नाटक में ओबीसी श्रेणी से चार फीसद मुस्लिम कोटा खत्म किये जाने के राज्य सरकार के आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की।
वकीलों ने दी यह दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील दुष्यंत दवे के अलावा कपिल सिब्बल, गोपाल शंकर भी पेश हुए और उन्होंने मुसलमानों का ओबीसी आरक्षण खत्म करने को गलत बताते हुए कहा कि सरकार ने बिना किसी अध्ययन और आंकड़ों के अचानक मुसलमानों का ओबीसी कोटा खत्म कर दिया। ओबीसी आरक्षण की दो नई श्रेणी बनाकर वोक्कालिगा और लिंगायत में बांट दिया जबकि कई रिपोर्ट आयी हैं जिनमें कहा जा चुका है कि मुसलमान ज्यादा पिछड़े हैं।
सिब्बल ने कहा कि 1994 से 2023 तक मुसलमानों को ओबीसी आरक्षण मिलता रहा तीस साल तक वे पिछड़े थे और अब अचानक वे जनरल कैटेगरी में आ गए और उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) श्रेणी में डाल दिया गया।
''संविधान धार्मिक आधर पर आरक्षण की नहीं देता इजाजत''
कर्नाटक सरकार के वकील तुषार मेहता ने कहा कि संविधान धार्मिक आधार पर आरक्षण की इजाजत नहीं देता। ये मामला संविधान पीठ को तय करना चाहिए।
पीठ ने कहा कि लेकिन पहले तो दिया जा रहा था। इस पर मेहता ने कहा कि अगर वह धर्म के आधार पर था तो वह भूल थी। हमें जवाब दाखिल करने का मौका दिया जाए। वोक्कालिगा और लिंगायत की ओर से हस्तक्षेप अर्जी दाखिल की गई थी और उनकी ओर से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी पेश हुए।
आंध्र प्रदेश में मुस्लिम आरक्षण को हाई कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने रद कर दिया था और उसे संविधान के खिलाफ ठहराया था इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट में उसके खिलाफ राज्य सरकार आयी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई थी सिर्फ सीमित आदेश दिया था कि जिन लोगों को कानून का सहारा देकर प्रवेश मिल चुका है या नियुक्ति मिल चुकी है उन्हें न हटाया जाए।
''पूरे राज्य में पिछड़े नहीं हो सकते मुसलमान''
मेहता ने कहा कि जो मुस्लिम पिछड़े हैं जैसे पिंजारा, पिंजारी, लडक, दुधकुला, मंसूरी आदि को पहले से ओबीसी आरक्षण मिल रहा है और अभी भी जारी है। रोहतगी ने कहा कि पूरे राज्य के मुसलमान पिछड़े नहीं हो सकते। आरक्षण का आधार धार्मिक नहीं हो सकता।
पीठ ने अंतरिम रोक आदेश जारी करने की इच्छा जताते हुए कहा कि जीओ देखने से प्रथम दृष्टया निर्णय लेने की प्रक्रिया की नींव बहुत अस्थिर और त्रुटिपूर्ण प्रतीत होती है। कोर्ट ने कहा कि वह अंतरिम आदेश नहीं देंगे।
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