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    ढोंगी बाबाओं ने फैलाया अंधविश्वास का जाल, किया भीड़ का आराजक इस्तेमाल

    By Digpal SinghEdited By:
    Updated: Sat, 26 Aug 2017 11:22 AM (IST)

    यह समझना मुश्किल है कि जब कभी कोई जानामाना बाबा किसी गैरकानूनी गतिविधि में संलिप्त पाया जाता है तो उसके अनुयायी कैसे सड़क पर उतर उत्पात मचाना शुरू कर देते हैं

    ढोंगी बाबाओं ने फैलाया अंधविश्वास का जाल, किया भीड़ का आराजक इस्तेमाल

    अभिषेक कुमार

    हमारे देश में धर्मभीरु जनता के अंधविश्वासों का फायदा उठाकर बाबागीरी का कारोबार किस तरीके से फूल-फल रहा है, इसका ताजा उदाहरण डेरा सच्चा सौदा प्रमुख बाबा राम रहीम प्रकरण में सामने आया है। यौन शोषण मामले में सीबीआइ अदालत ने जब उन्हें दोषी ठहराया तो पंजाब-हरियाणा के कई हिस्सों में आगजनी-हिंसा के समाचार मिलने लगे। बाबा समर्थकों ने दो रेलवे स्टेशनों में आग लगा दी और कुछ स्थानों पर हालात नियंत्रित करने के लिए कर्फ्यू लगाना पड़ा। खास यह है कि फैसला आने से कई दिन पहले से ही जिस तरह हथियार-पेट्रोल लेकर बाबा समर्थक शहरों में जमा होकर कानून-प्रशासन से टकराने और खून बहा देने की चेतावनी देने लगे थे, उससे यह चिंता पैदा हो गई थी कि कहीं बाबा के प्रभाव वाले उत्तर भारतीय इलाकों में अराजकता न फैल जाए।

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    यह चिंता अकारण नहीं है, क्योंकि अतीत में देश में ऐसी स्थितियां कई बार बन चुकी हैं। हरियाणा में ही 2014 में संत रामपाल के समर्थक ऐसा कर चुके हैं। पुलिस से संत रामपाल के समर्थक सीधे टकराए थे और हालात काबू पाना मुश्किल हो गया था। यही नहीं, मथुरा में बाबा रामवृक्ष के बेकाबू समर्थकों को नियंत्रित करने में पुलिसकर्मियों को भी जान गंवानी पड़ी थी। इससे पहले कथित संत आसाराम बापू के समर्थक ऐसी ही हिमाकत कर चुके हैं।

     

    सवाल है कि यह बाबाओं का प्रताप है या अंधविश्वासी जनता की नासमझी जो उनके पाखंड तक को सच मान लेती है। देश में बाबाओं के साम्राज्य और प्रभाव का ही असर है कि जब कभी कोई जानामाना बाबा किसी गैरकानूनी या असामाजिक गतिविधि में संलिप्त पाया जाता है और कानून अपने नियमों के तहत उस पर कार्रवाई करता है तो अनुयायी बड़े पैमाने पर जमा हो जाते हैं। वे संबंधित जगहों पर हजारों-लाखों की संख्या में एकत्र होकर न सिर्फ राशन-पानी का प्रबंध कर लेते हैं, बल्कि पुलिस से टकराने की नौबत पैदा होने पर उसका मुकाबला करने के लिए हथियारों को भी जुटा लेते हैं। बाबा कहते हैं कि वे अपने अनुयायियों को रोकने में समर्थ नहीं होते हैं, क्योंकि भावावेश में वे समर्थक अपने गुरु का आदेश मानने से भी इन्कार कर देते हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि ये भक्तगण अपने गुरु और उनके नजदीकी लोगों के इशारे पर ही ऐसी हरकतें करते हैं। पुलिस-प्रशासन से टकराने की उनकी कोशिशों का मकसद साफ तौर पर न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करना होता है। राम रहीम के समर्थक कहते रहे हैं कि यदि फैसला उनके गुरु के खिलाफ आया तो वे खून की नदियां बहाने से नहीं हिचकेंगे। उन्हीं की तरह अन्य बाबाओं के समर्थक भी अतीत में ऐसी ही धमकियां देते रहे हैं और कई बार उन्होंने ऐसा किया भी है। 2014 में हरियाणा में संत रामपाल के हथियारबंद समर्थकों ने पुलिस से लोहा लिया था।

     

    हिसार के सतलोक आश्रम में खुद को कबीरपंथी बताने का ढोंग करने वाले हत्या के आरोपी संत रामपाल ने कानून की पकड़ से बचने के लिए भक्तों और हथियारबंद समर्थकों को ढाल बना लिया था। हालांकि भक्तों की आंखें जब तक खुलीं, तब उन्हें रामपाल के हथियारबंद गुंडों ने बंधक बना लिया था और आश्रम से निकलने ही नहीं दिया। चौदह दिन तक चले रामपाल की गिरफ्तारी के इस हाई- वोल्टेज ड्रामा में कई रामपाल भक्तों की आंखों पर चढ़ा अंधभक्ति का चश्मा तब उतर गया, जब उन्होंने अपने स्वामी का यह कुरूप और ढोंगी चेहरा नजदीक से देखा। इसी तरह पिछले ही साल मथुरा में बाबा रामवृक्ष के समर्थक हिंसक विरोध पर उतर आए थे, जिसमें दो पुलिस अधिकारियों समेत दो दर्जन लोग मारे गए थे। किस्सा वही था कि बाबा रामवृक्ष ने गैरजमानती वारंट के बावजूद अदालत में पेश होने से इन्कार कर दिया था और तब पुलिस को उनके और उनके समर्थकों के खिलाफ एक्शन लेना पड़ा था। बाबा राम रहीम की तरह ही यौन शोषण के आरोप में गिरफ्तार होने से पहले आसाराम बापू के भक्तों ने इसी तरह का हंगामा मचाया था।

     

     

    ऐसे कथित संतों-बाबाओं के कारनामों पर सवाल उठाने से पहले यह भी देखना होगा कि आखिर ये लोग इतनी ताकत कहां से पाते हैं। शुरुआत इन्हें किसी आश्रम या महंत की गद्दी मिलने से होती है, जिससे जुड़े भक्तगण-अनुयायी आंख मूंदकर उनकी सेवा करते हैं। ये शिष्य अपने गुरु को भगवान और देश से ऊपर का दर्जा देते हैं। यही नहीं, कुछ कथित राजनेता भी वोटबैंक के लालच में इनके चरणों में लोट लगाते रहे हैं, जिससे कथित संतों-बाबाओं का कारोबार दिन-दूना, रात-चौगुना बढ़ता जाता है। बाबा राम रहीम की जो ताकत आज दिख रही है, उसमें सिर्फ जनता की भूमिका नहीं है बल्कि कुछ राजनीतिक दलों का भी है, जिन्होंने विधानसभा चुनावों में उनके लाखों अनुयायियों का समर्थन पाने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। यही वजह है कि कोई कानूनी मसला होने पर ये बाबा और उनके अनुयायी राजनीतिक संरक्षण की उम्मीद करते हैं और हर किसी को धौंस दिखाते हैं कि सत्ता में बैठे लोगों की वजह से कोई उनका बाल भी बांका नहीं कर सकता।

     

    बाबा राम रहीम के ताजा वाकये के बाद यह सवाल देश और जनता को लंबे समय तक मथ सकता है कि देश में ऐसे स्वार्थी और ढोंगी बाबाओं पर कैसे अंकुश लगाया जाए, जो कथित संतई के बल पर एक बड़ा साम्राज्य खड़ा कर लेते हैं और अपने अंधभक्त अनुयायियों में बड़ी सफलता से यह भ्रम रोप देते हैं कि वे एक समानांतर सत्ता या सरकार चला रहे हैं। तमाम तरह के अपराध करने के बाद बाबा-संत बने और बाबा बनकर गद्दी संभालने के बाद कई अपराध करने वाले इस किस्म के बाबाओं का अभ्युदय यह सोचने को मजबूर करता है कि आखिर हमारी जनता इतनी धर्मभीरू और अंधविश्वासी क्यों है कि वह इनकी काली करतूतों को जानते-बूझते हुए भी परदा डालने की कोशिश करती है। इसमें कुछ दोष तो शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक अनुशासनों का है। आज की शिक्षा लोगों को इस बारे में सचेत नहीं करती है कि दुनिया में सुख-समृद्धि फैलाने का दावा करने वाले कथित संतों-बाबाओं का कारोबार असल में अंधविश्वासों के बल पर चल रहा है।

     

    (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)